किरन बेदी और दिल्ली बीजेपी की दो निगाहें

By: | Last Updated: Monday, 19 January 2015 7:24 AM
Abhay Kumar Dubey Blog on Kiran Bedi leadership in Delhi Election

नई दिल्ली: किरन बेदी ने अपनी ज़िंदगी की पहली राजनीतिक पारी की शुरुआत कुछ इस अंदाज़ में की है जैसे वे नरेंद्र मोदी का दिल्ली संस्करण हों. मोदी की ही तरह वे ‘5P’ या ‘5S’ की भाषा बोल रही हैं. ठीक उसी शैली में बीजेपी की पूरी की पूरी दिल्ली इकाई का स्थापित नेतृत्व उनकी मातहती में चला गया है जैसे बीजेपी का मोदी-पूर्व राष्ट्रीय नेतृत्व आज नरेंद्रभाई की ताबेदारी में है. मोदी की ही भाँति वे बीजेपी कार्यकर्ताओं को एकतऱफा सम्बोधित कर रही हैं.

 

जिस तरह मोदीकृत हो चुकी बीजेपी ने चुनाव मुहिम के दौरान प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन उम्मीदवार की बात सुनी थी, उसी तरह से दिल्ली की बीजेपी बेदी की बात सुन रही है. वे बार-बार मोदी का हवाला देती हैं कि वे प्रधानमंत्री से मिल कर आ रही हैं या उन्होंने नरेंद्र भाई से अमुक-अमुक बात कही या उन्होंने उनसे यह या वह सहमति ले ली है. इस तरह वे दिल्ली बीजेपी की निगाह में ख़ुद का उत्तरोत्तर सबलीकरण करती जा रही हैं. मोदी और बेदी में ये समानताएँ इसी मुकाम पर आ कर समाप्त हो जाती हैं.

 

दरअसल, एक मामले में वे मोदी से भी क़दम भर आगे हैं. मोदी का आश्वासन था कि वे केंद्र की सत्ता चुनाव जीतने के बाद पार्टी को प्लेट पर रख कर देंगे. कांग्रेस की कमज़ोरी और पराजित मानसिकता के कारण प्रेक्षकगण मानने लगे थे कि मोदी के अलावा कोई जीत नहीं सकता. लेकिन बेदी तो ख़ुद मान कर चल रही हैं कि दिल्ली की सत्ता उनके हाथ में ही है. चुनाव लड़ना और परिणामों की घोषणा होना तो केवल औपचरिकता भर है. वे अपने मन में मुख्यमंत्री बन चुकी हैं. उनका लहज़ा यही कहता है.

 

दिल्ली की बीजेपी नरेंद्र मोदी के दिल्ली संस्करण को दो निगाहों से देख रही है. एक निगाह उनके रुतबे के सामने झुकते हुए प्रकटत: वफ़ादारी का संदेश देती है. ऐसा ज़ाहिर है क्योंकि पार्टी पूरी तरह से मोदी-शाह की गिऱफ्त में है. लेकिन, दूसरी निगाह थोड़ी चुप और आश्चर्यचकित है. यह दूसरी निगाह जानती है कि दिल्ली के हालात वे नहीं हैं जो लोकसभा चुनाव की मुहिम के थे. दिल्ली में बीजेपी के सामने कठिन चुनौती है. आम आदमी पार्टी के साथ होड़ करती हुई बीजेपी थोड़ी सी आगे ज़रूर है, लेकिन अक्टूबर के बाद से ही होने वाले सभी सर्वेक्षण यह बताते हैं कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाला संगठन यह अंतराल घटाता जा रहा है.

 

बीजेपी ने अभी अपनी चुनावी मुहिम शुरू भी नहीं की है, पर केजरीवाल का संगठन तीन महीने का सघन अभियान चला चुका है. उसके सभी उम्मीदवार अरसे पहले घोषित हो चुके हैं. अगर मान लिया जाये कि एक इलाके में सौ राजनीतिक कार्यकर्ता चुनाव प्रचार कर रहे हैं तो यह कहा जा सकता है कि उनमें दस-बारह कांग्रेस के होंगे, बीस-पच्चीस बीजेपी के होंगे और बाक़ी सब आम आदमी पार्टी के निकलेंगे. वे एक-एक दरवाज़े पर तीन-तीन बार दस्तक दे चुके हैं. बीजेपी बड़ी पार्टी है और मीडिया अभी तक उसकी पराजय की कल्पना भी नहीं कर पा रहा है, लेकिन मुहिम के धरातल पर इस पार्टी को एक बड़ी छलाँग भर कर केजरीवाल से आगे निकलना शेष है. यह सब बीजेपी की दूसरी निगाह को दिखाई दे रहा है.

 

दिल्ली बीजेपी का एक इतिहास भी है. सोलह साल पहले साहिब सिंह वर्मा को अपदस्थ करके केंद्रीय नेतृत्व ने सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया था. इसका नतीजा यह निकला था कि एक-दूसरे की शक्ल भी न देखने वाले वर्मा और मदन लाल खुराना में गठजोड़ हो गया था. अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली भर में मुहिम करते रह गये थे और बीजेपी को हार नसीब हुई थी. उसके बाद से यह पार्टी आज तक सत्ता से बाहर है. बीजेपी की यह दूसरी निगाह इस तरह के अंदेशों को भी देख रही है.

 

किरण बेदी की पीठ पर प्रधानमंत्री का हाथ ज़रूर है, पर वे चाहतीं तो अपनी इस ता़कत का लाभ उठा कर नरम लहज़े और आजिज़ी का इस्तेमाल करते हुए सबको अपने स्नेह-पाश में बाँध कर कार्यकर्ताओं का दिल जीत सकती थीं. लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया, और अगर उनकी बात न मानी गयी तो सबको ठीक कर देने वाला रवैया दिखाया. दबे हुए कार्यकर्ता और नेता पलट कर मुँह पर जवाब नहीं देते. उनका जवाब कहीं और से आता है और किसी और जगह पर हमला करता है.

 

यह सही है कि आज दिल्ली की बीजेपी के पास खुराना और वर्मा के स्तर के नेता नहीं हैं, और वे अपने कलपते मन के बावजूद शायद वैसा न कर पाएँ जो उन दोनों ने कर दिखाया था. लेकिन, राजनीति तो राजनीति है. उसके घाव गहरे होते हैं, और उन घावों के बदले किया गया प्रतिघात एक ही बार में सारा हिसाब चुकता कर देता है.

 

दिल्ली बीजेपी की दूसरी निगाह ने वह भी सुना है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सरसंघचालक ने कहा है. मध्य प्रदेश में मोहन भागवत ने किरन बेदी के बीजेपी में आने का स्वागत किया, पर साथ ही उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बताये जाने पर सवाल भी उठाया. बेदी न संघ की क़तारों से हैं, और न ही बीजेपी के ग़ैर-संघी हिस्से से ताल्लुक रखती हैं. बीजेपी का अतीत उनका नहीं है. भविष्य उनका केवल तभी होगा जब वे मुख्यमंत्री बनेंगीं. अगर किसी वजह से न बन पायीं, नरेंद्र मोदी से उन्हें मिली तथाकथित प्रेरणा एक पल में ख़त्म हो जायेगी.

 

किरने बेदी ने कहा है कि अगर वे हार गयीं तो घर लौट जाएंगी और अपना काम करेंगी. यह किसी नेता का वक्तव्य नहीं है. यह उस अस्थायी सेनापति का वक्तव्य है जिसे युद्ध जिताने के लिये पैराशूट से उतारा गया है और जो युद्ध न जीत पाने की सूरत में विपक्ष के नेता के रूप में संघर्ष करने के लिये तैयार नहीं है. दिल्ली बीजेपी की दूसरी निगाह ने बेदी का यह बयान ध्यान से सुना है. फ़िलहाल वह वक़्त का इंतज़ार करते हुए इसका मतलब निकालने की कोशिश कर रही है.

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