गधे पर टिकी है जालंधर की आस!

By: | Last Updated: Wednesday, 22 July 2015 10:22 AM
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जालंधर: यह बात आपको हैरान कर सकती है लेकिन भूमंडलीकरण और महामशीनों के इस युग में भी शहरी क्षेत्र में कई ऐसे लोग हैं जो अपनी रोजी-रोटी के लिए गधों पर ही निर्भर हैं. दरअसल इनकी आजीविका प्रमुख रूप से गधों पर ही टिकी है. यह आम धारणा है कि गधों का इस्तेमाल आम तौर पर धोबी और कुम्हार जाति के लोग अपने-अपने व्यवसायों के लिए करते हैं लेकिन जालंधर में कई दूसरे लोग भी हैं जो अपनी आजीविका के लिए गधों का इस्तेमाल करते हैं. कामकाज में गधों के सहयोग से ही ये लोग अपना जीवन चला रहे हैं.’’

 

भारत के प्राचीनतम शहरों में शुमार किये जाने वाले पंजाब के जालंधर शहर के विभिन्न इलाकों में सड़कें और गलियां इतनी संकरी हैं कि उन रास्तों पर ठेले या रिक्शों को भी जाने में काफी दिक्कत होती है. कई गलियों में तो ठेले और रिक्शे लेकर जाया ही नहीं जा सकता. ऐसे में लोग किसी भी प्रकार के सामान की ढुलाई के लिए गधों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर करते हैं.

 

घरेलू सामग्री हो या घर बनाने वाली सामग्री, सबकी ढुलाई इन संकरी गलियों में गधों पर लादकर होती है. इस काम के लिए लोग बड़ी संख्या में गधों का इस्तेमाल करते हैं, हालांकि, लेकिन गधे पालने वाले लोगों की परेशानी यह है कि इनसे वे जितनी कमाई करते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा पशु का पेट भरने में ही खर्च हो जाता है.

 

जालंधर निवासी सुरजीत और बंटी दोनों ही इस काम के लिए अपने-अपने गधे किराये पर देते हैं. उन्हें इस बात की चिंता सताती है किसी दिन उनकी दिहाड़ी नहीं हुई तो उनका पेट पालने वाले इस पालतू पशु का पेट कैसे भरा जाएगा. जालंधर के चौगिट्टी इलाके के निवासी सुरजीत सिंह और बंटी ने इस बारे में कहा, ‘‘हमारी जिंदगी की रोटी इन्हीं पालतू पशुओं के सहारे चलती है . जिस दिन दिहाड़ी मिली उस दिन तो ठीक है लेकिन सबसे अधिक चिंता इस बात की रहती है कि जिस दिन काम नहीं मिलता, उस दिन इन जानवरों को कहां से खिलायेंग? शहरों में सबसे अधिक समस्या पशुओं के चारे की होती है .’’

 

सुरजीत ने कहा, ‘‘हमें काम खास तौर से निर्माण कार्य के दौरान मिलता है. संकरी गलियों और सड़कों पर जब गाड़ियां नहीं जा पातीं, तो वहां ये गधे जाते हैं . बालू, मिट्टी और मकान निर्माण में काम आने वाली सभी सामग्रियों की ढुलाई गधे पर होती है .’’ उन्होंने कहा, ‘‘एक ट्रैक्टर बालू को निर्माण स्थल तक पहुंचाने के लिए तकरीबन साढ़े चार सौ रुपये मिलते हैं . इसमें चार पांच घंटे तक चार-चार गधों को जोतना पड़ता है . दिहाड़ी से मिलने वाली राशि का अधिकांश हिस्सा गधों पर ही खर्च करना पड़ता है .’’ इस मौके पर एक अन्य बंटी ने कहा, ‘‘सरकार का ध्यान गरीबों पर नहीं है . हमारे लिए सरकार कोई काम नहीं कर रही.’’ मूल्य वर्धित कर से अनभिज्ञ बंटी को यह डर सताता है कि गधे से की जाने वाली ढुलाई के बारे में सरकार को भनक लगी तो कहीं गधे पर भी न वैट लग जाए .

 

चौगिट्टी निवासी इन दोनों श्रमिकों के पास आठ-आठ गधे हैं . उनका कहना है कि सरकारी काम में भी उन्हंे बुलाया जाता है . शहर के चौगिट्टी के अलावा प्रताप बाग इलाके में भी ऐसे लोग रहते हैं जो गधे के सहारे अपना जीवन यापन करते हैं . इन सबके सामने पशुओं को खिलाने की समस्या सबसे बड़ी है .

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