पोर्न के बाजार से लड़ने की तैयारी में एक मां

By: | Last Updated: Saturday, 1 August 2015 6:34 AM
Rita Templeton

नई दिल्ली: पश्चिम की लेखिका और चार नन्हे-मुन्ने बेटों की मां रीटा टेम्पटलन की ये सोच आपको चौंका सकती है. पिछले साल सितंबर में हफिंगटन पोस्ट में अपने ब्लॉग में उन्होंने लिखा था. वो अपने चारों बच्चों के सामने न्यूड रहना चाहती हैं.

 

पहली बार में एक झटके में आप उनकी इस सोच को खारिज कर सकते हैं. इसमें कोई शक नहीं. लेकिन जिस वजह और आशंका ने उन्हें इस हद तक सोचने के लिए मजबूर कर दिया है…उसे लेकर आज दुनिया का हर मां-बाप घुला जा रहा है.

 

इंटरनेट और तेज रफ्तार तकनीक के इस दौर में पोर्न जिस तरह चेहरे बदल-बदल कर हमारे दिलो-दिमाग पर कब्जे की कोशिश में जुटा है…ये लड़ाई उसकी है और रीटा को इस सोच से बेहतर हथियार कुछ और नजर नहीं आ रहा है. रीटा को मालूम है कि बच्चे थोड़े बड़े होंगे…तो उनके हाथों में मोबाइल देना होगा.

 

इसके अलावा भी कई और मौके ऐसे होंगे जब इंटरनेट उनके सामने पोर्न का बाजार खोल कर रख देगा.  तब उनके सामने नारी शरीर की जो बाजारू छवि बनेगी…वो अनजाने में उनमें विकृत मानसिकता और आपराधिक सोच की बुनियाद डालेगी. बच्चे छिप-छिपाकर एक बार इस गंदी वर्चुअल दुनिया में उतर गए…तो उन्हें रोकना कितना मुश्किल होगा…ये बताने की जरूरत नहीं. इसका अंजाम क्या और किस हद तक हो सकता है…इसकी दिल दहलाने वाली घिनौनी मिसालें टीवी और अखबार के जरिये आप हम तक रोज पहुंचती हैं.

 

पोर्न के उसी बीज को कुचलने के लिए ‘एंटी-डॉट’ के रूप में बच्चों के सामने न्यूड रहने का उपाय आजमाना चाहती हैं  रीटा. उन्हें लगता है कि बच्चे मां के रूप में नारी शरीर का परिचय पाएंगें…और करीब से उसे महसूस करेंगे…तो पोर्न का जो छलावा बाजार रच रहा है, उसके आकर्षण से नई पीढ़ी को बचाने में काफी हद तक मदद मिलेगी.

 

ये कड़वी हकीकत है कि चाइल्ड पोर्न की जिस आग में पश्चिम बहुत पहले अपने हाथ जला चुका है…कमाई के लिए अब हमें वो भी धड़ल्ले से परोसा जा रहा है. लिहाजा, रीटा के सोचे उपाय पर बहस हो सकती है…लेकिन उसके पीछे जो चिंता है, उस पर हमें भी गंभीरता से सोचना होगा.

 

दिल्ली में पिछले दिनों गिरफ्त में आए रविंद्र जैसे वहशियों की सोच पर आप क्या कहेंगे…जो मासूमों की जान लेकर अपनी यौन भूख को मिटाने के लिए जुर्म पर जुर्म किये जा रहा था. और इसे कबूल करते वक्त पर जिसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी.

 

छह महीने से साल-दो साल की बच्चियों से दुष्कर्म की खबरें आज आम हैं. आज से कुछ साल पहले तक ऐसी घिनौनी सोच भारतीय समाज में तो कम से कम देखने को नहीं मिलती थी.

 

16 दिसंबर 2012 का निर्भया कांड और उसी तर्ज पर बढ़ते यौन अपराध की भयावहता के बारे में जरा सोचिए. जिस सोच ने उन वहशियों को नारी शरीर में लकड़ी और सरिया जैसी चीजों को ढकेल देने की हद तक पहुंचा दिया…वो उन्हें पोर्न के बाजार ने ही तो दिया.

 

पोर्न का बाजार उत्तेजना का जो संसार रचता है…असल में वैसा होता नहीं है. यही वजह है कि असल जिंदगी में उन्हें पाने की जब कोशिश होती है…तो हाथ कुछ नहीं लगता…और उसे हासिल करने की नाकाम कोशिश में लोग पाशविकता तक उतर जाते हैं.

 

एक बार फिर रीटा टेम्पलटन की बात. ये तो तय है कि नारी शरीर को लेकर अपने बेटों को स्वस्थ सोच देने का जो तरीका रीटा आजमाना चाहती हैं, उसकी प्रेरणा उन्हें कहीं न कहीं अमेरिका और अफ्रीका के उन आदिवासी कबीलों की संस्कृति से आया होगा… जहां महिलाओं के शरीर का ज्यादातर हिस्सा खुला रहता है और जो अपने बच्चों से उनके किशोर उम्र तक पर्दा नहीं करतीं. भारत में उत्तर-पूर्व के राज्यों, बस्तर और अंडमान के आदिवासी समाज में भी इसकी झलक मिलती है.

 

आंकड़ों का सच तो यही है कि इन समाजों में यौन अपराध नहीं होते हैं या उसकी तादाद ना के बराबर है. अब सवाल ये कि…नई पीढ़ी को स्वस्थ सोच देने के लिए रीटा ने जो उपाय सोचा है…क्या उसके कामयाब होने की गारंटी हमारे समाज में है? और है…तो कितनी है? क्या कहते हैं आप?

 

आम आदमी की कोशिशें तो अपनी जगह हैं ही. पोर्न के बाजार को रोकने की बड़ी जिम्मेदारी सरकार की है…जिसकी मिसाल चीन की सरकार ने इंटरनेट के अश्लील साइटों को लगाम कस कर दी है. थोड़ी सी कमाई का मोह छोड़ दिया जाए…ऐसा मुमकिन है. सरकार इस नजरिये से सोचे…इसके लिए हमें भी आवाज बुलंद करनी होगी.

 

एक बात साफ है…अपने देश में जब तक ऐसा नहीं होगा…हमारे बच्चे महफूज नहीं होंगे… न तो उस गंदी सोच से ….ना ही वैसी गंदी सोच रखने वालों का शिकार होने से. सोचिएगा जरूर.

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