हिमाचल विधानसभा चुनाव में बंदरों का आतंक बना एक बड़ा मुद्दा terror of monkeys has become an big issue In Himachal assembly elections

हिमाचल विधानसभा चुनाव में बंदरों का आतंक बना एक बड़ा मुद्दा

हिमाचल प्रदेश के किसान अब इस समस्या को लेकर मुखर हो गए हैं और अब सरकारों और अपने होने वाले जनप्रतिनिधियों से बंदरों से मुक्ति दिलाने की मांग करने लगे हैं.

By: | Updated: 06 Nov 2017 04:54 PM
terror of monkeys has become an big issue In Himachal assembly elections
शिमला: हिमाचल प्रदेश में नौ नवंबर को विधानसभा के चुनाव हैं. इस बार चुनाव में सड़क, बिजली, पानी, नौकरी, अस्पताल और स्कूल जैसी मांगों के साथ-साथ प्रदेश के ज्यादातर जिलों में लोग  बंदरों से निजात दिलाने की मांग कर रहे हैं. प्रदेश में बंदरों का आतंक इतना है कि झुंड में खेतों को नुकसान पहुंचाने के साथ लोगों पर भी हमले करते हैं.

प्रदेश में खेती करना टेढ़ी खीर

हिमाचल प्रदेश पहाड़ों पर बसा है, जहां खेती करना अपने आप में टेढ़ी खीर है. पहाड़ों पर लेयर बना बनाकर किसान अपनी ज़मीन को खेती लायक बनाते हैं और फिर यहां फसल लगाते हैं. फसल खड़ी होते ही इन फसलों पर आए दिन बंदरों के हमलों से इनकी खड़ी फसल बर्बाद होती है, जिससे ना सिर्फ फसल बल्कि उसको उगाने में जो खर्च आता है, वो भी बर्बाद हो जाता है.

लोग कर रहे हैं बंदरों की नसबंदी कराने की मांग

हिमाचल में पहाड़ों पर बंदरों की बड़ी संख्या है. यहां जंगलों से कभी 100-200 तो कभी 500 के झुंड में बंदर एक साथ भोजन की तलाश में निकलते हैं और उन्हें जिस खेत में खड़ी फसल दिखती है, वो उस खेत पर हमला कर देते हैं. पूरे हिमाचल में लाहौल-स्पीति को छोड़ दें तो बाकी सभी 11 जिलों में बंदरों के आतंक ने बंदरों से निजात दिलाने को चुनावी मुद्दा बना दिया है. लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि सरकार बंदरों की नसबंदी कराने के साथ इनपर नियंत्रण के उचित प्रबंध सुनिश्चित करे.

पर्यटन और खेती हिमाचल के लोगों का आय का प्रमुख साधन

हिमाचल के पहाड़ों पर गेंहू, धान, मक्का समेत कई फलों की खेती होती है. यहां पर्यटन और खेती ही लोगों की आय का प्रमुख साधन है. किसान पहाड़ों की लेयरिंग करके उन्हें खेती लायक बनाता है और बड़ी मेहनत से उसपर फसल उगाता है. लेकिन ये सारी मेहनत बंदरों के हमला कर इन्हें ऐसे हाल में छोड़ देते हैं कि ये अपना और अपने परिवार का पेट भर सकें.

बंदरों की आदत इंसानों जैसी होती है. वो लगभग हर वो चीज़ खाते हैं, जो इंसान खाता है. ऐसे में अपने परिवार का भरण पोषण करने और अतिरिक्त आय के लिए जो फसल किसान लगाता है, उसे बंदरों के प्रकोप से बचाने वाला फिलहाल कोई नज़र नहीं आ रहा. हिमाचल प्रदेश के किसान अब इस समस्या को लेकर मुखर हो गए हैं और अब सरकारों और अपने होने वाले जनप्रतिनिधियों से बंदरों से मुक्ति दिलाने की मांग करने लगे हैं.

1971 तक देश से हुआ करता था बंदरों का निर्यात

आपको बता दें कि 1971 तक देश से बंदरों का निर्यात हुआ करता था. इन बंदरों की विदेश से ज़बरदस्त मांग हुआ करती थी, क्योंकि विदेशों में शोध के लिए बंदर सबसे उपयुक्त साबित होते थे. लेकिन जानवरों के लिए काम करने वाले संगठनों के विरोध की वजह से बंदरों के निर्यात पर रोक लगा दी गई. निर्यात से ना केवल सरकार को विदेशी मुद्रा की कमाई होती थी, बल्कि बंदरों की संख्या भी संतुलित होती थी. धीरे धीरे बंदरों की संख्या बढ़ती गई और अब ये विनाश का प्रतीक बन गए हैं.

प्रदेश में हर साल होती है 1500 करोड़ की फसल बर्बाद

हिमाचल में पहाड़ों पर बंदरों के आतंक भी संख्या बढ़ने के साथ बढ़ता गया और पिछले करीब 25 सालों से बंदरों ने किसानों को परेशान कर रखा है. अब स्थिति बेकाबू होती जा रही है. एक अनुमान के मुताबिक बंदरों समेत अन्य जानवरों की वजह से हिमाचल प्रदेश में हर साल करीब 1500 करोड़ की फसल बर्बाद होती है.

वीरभद्र सरकार ने शुरु की थी बंदरों पर नियंत्रण के लिए एक योजना

हिमाचल की वीरभद्र सरकार ने बंदरों पर नियंत्रण के लिए एक योजना की शुरुआत की थी, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति एक बंदर पकड़ के वन विभाग को सौपेगा तो उसे 500 रुपये का इनाम दिया जाएगा. कुछ महीनों तक चली यह योजना फ्लॉप हो गई, क्योंकि बंदरों को पकड़ना बेहद मुश्किल काम है और झुंड में घूमने वाले बंदरों को अगर कोई पकड़ने की कोशिश करता है तो वो उसपर हमला बोल देते हैं.

सरकार ने एक मशीन भी लांच की, जिसको लेकर दावा किया गया कि इन मशीनों से ऐसी आवाज़ निकलती है, जिससे बंदर दूर भागते हैं. लेकिन ये मशीन भी सरकार की बंदर पकड़ो योजना की तरह फिसड्डी साबित हुई और ट्रायल बेसिस पर लगाये गए मशीनों का बंदरों पर कोई असर नहीं दिखाई दिया. अब परेशान किसानों ने चुनाव में नेताओं से बंदरों से निजात दिलाने की मांग उठानी शुरू कर दी है.

सरकार उचित कदम उठाएगी- प्रेम कुमार धूमल

बीजेपी के सीएम प्रत्याशी प्रेम कुमार धूमल ने भी दावा किया है कि वीरभद्र सरकार जानवरों पर नियंत्रण के माले में फेल है और उनकी सरकार आने पर किसानों को राहत देने के लिए सरकार उचित कदम उठाएगी. ऐसा कम ही होता है जब बंदरों से मुक्ति का मुद्दा ना सिर्फ जबानी रह जाए बल्कि दोनों दलों के घोषणापत्र में जानवरों से मुक्ति को अपने एजेंडे में रखा जाता है. अब देखना होगा कि नई सरकार अपने गठन के बाद अपने इस चुनावी वादे को पूरा कर किसानों को राहत देने में कितनी गंभीर साबित होती है.

हिमाचल प्रदेश बीजेपी के प्रवक्ता महेश धर्माणी का कहना है कि कृषि को जानवरों से होने वाले नुकसान के लिए हमारी 2007 से 2012 की सरकार में काम किये गए. इस बार भी हमने अपने विज़न डॉक्यूमेंट में सोलर फेंसिंग लगाने की बात कही है. साथ ही अन्य लोगों से आने वाले सुझाव पर भी काम किया जाएगा.

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