BLOG: हिंदी में होली का ‘निराला’ रंग

BLOG: हिंदी में होली का ‘निराला’ रंग

नलिन चौहान | 13 Mar 2017 11:28 AM

प्रेम और मिलन का त्यौहार होली भारत की सांस्कृतिक धारा में विशेष महत्वपूर्ण स्थान रखता है. हिंदी साहित्य के सभी प्रमुख रचिताओं ने भिन्न-भिन्न रूपों में होली को लेते हुए उस पर लिखा है, जाकी रही भावना जैसी के रूप में.


हिंदी साहित्य के छायावाद में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का अप्रतिम स्थान है. उनके कृतित्व के इस पक्ष से कमतर लोग ही परिचित है कि उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं में लोक संगीत को औरों से अधिक अपनाया है. निराला को होली की धुन सर्वाधिक प्रिय रही है और शायद यही कारण है कि उनके होली से संबंधित कई गीतों में लोक गीतों की लयात्मकता पाई जाती है.


निराला ने अपनी प्रारंभिक रचनाओं से लेकर आखिरी दौर तक होली पर बहुत कुछ लिखा है. उनके साहित्य के आरंभ में जहां होली का विवरण मात्र है, वहां आगे चलकर रसबोध और सूक्ष्म होता गया है, कहां धरती का सौन्दर्य है, कहां रमणी का, यह कहना कठिन हो जाता है.


वे अपने काव्य संग्रह परिमल की ‘वासन्ती’ कविता में होली पर लिखते हैं,


फागुन का फाग मचे फिर, गवें अलिगुंजन होली,


हंसती नव हास रहें घिर, बालाएं डालें रोरी.


फागुन का यही फाग काव्य संग्रह ‘अर्चना’ में परिवर्तित होकर सूक्ष्म और सरस हो जाता है.


फागुन के रंगराग बाग बन फाग मचा है,


भर गये मोती के झाग, जनों के मन लूटे हैं.


निराला प्रकृति के सौन्दर्य में डूबते हैं, लोक-संस्कृति और लोक-संगीत में भी डूबते हैं. होली की धुन से मिलकर, प्रकृति और नारी के श्रृंगार चित्र और भी निखर उठते हैं, वसन्त की छवि मानो चित्रों में ही नहीं, सरस भदेस शब्दों में, लोक-गीत की धुन में व्याप गई हो.


नयनरों के डोरे लाल गुलाल भरे खेली होली


‘गीतिका’ में वसंत और श्रृंगार का वातावरण प्रस्तुत करने यह गीत पेश रचनाओं से अपनी शैली से भिन्न है जो कि निराला के भावी विकास का सूचक है.


‘गीतिका’ ही एक अन्य गीत है,


मार दी तुझे पिचकारी,


कौन री, रंगी छवि वारी,


‘अर्चना’ में ऐसे अनेक गीत है, जैसे


फूटे हैं आमों में बौर भौंर बन-बन टूटे हैं.


होली मची ठौर-ठौर सभी बन्धन छूटे हैं.


यह निराला के होली के सारे गीतों में सर्वोत्तम है, जिनमें रंग और रूप चित्रों को कला निखरी हुई हमें मिलती है.


होली के गीतों में “खेलूंगी कभी न होली वाला गीत” उन्हें जनता-जनार्दन के बहुत करीब ले जाता है और ऐसे ही गीतों में वे सर्वश्रेष्ट लगने लगते हैं.


यह अनायास नहीं है कि निराला ने सिर्फ होली और वसन्त पर अच्छा लिखा ही नहीं है बल्कि वह होली झूमकर खेलते भी थे और वसन्त के पूरे दिनों को उसी खास अन्दाज में जीते भी थे. आखिर क्यों न हो, वसन्त और होली के उल्लास से भारतीय जन-जीवन के उल्लास का सम्बन्ध है.


उनकी प्रामाणिक जीवनी “निराला की साहित्य साधना” के लेखक- शीर्षस्थ आलोचक रामविलास शर्मा ने अपनी एक अन्य पुस्तक, “संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्याएं” में लिखा है कि मुझे तो निराला जी की होली बहुत पसंद है. महीना मार्च का था. उन दिनों निरालाजी के साथ ही मैं रह रहा था. एकाएक मेरी नींद खुली तो मैंने देखा कि निरालाजी, जीने पर बैठकर होली गा रहे थे. मैंने तय किया कि पूरी होली गा लेने के बाद ही मैं ‘डिस्टर्ब’ करूंगा. होली खत्म होने के बाद जब मैंने पूछा कि निरालाजी किसकी होली गा रहे हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि अपनी गा रहा हूँ, निराला जी जो होली गा रहे थे वह थी- ‘नैनो के डोरे लाल’. यह निराला की लोकगीतों के रंग में लिखी गई सारी कल्पनाओं में सबसे सफल होली की रचना है.