Blog: हर बार नो का मतलब नो ही होता है

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प्रतीकात्मक तस्वीर

लड़कियां इसका बुरा मान रही हैं. लगातार विक्टिम ब्लेमिंग उन्हें परेशान कर रही है. वे कहीं कॉलेज परिसरों में विरोध पर बैठ रही हैं, कहीं सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आग उगल रही हैं. बीएचयू का मामला अभी तूल पकड़े हुए है, पीछे एक मामला और आया है. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने रेप के तीन अपराधियों को यह कहते हुए बेल दे दी है कि लड़की के खुद के व्यवहार में गड़बड़झाला है. वह सिगरेट पीती है और उसके हॉस्टल रूम से कंडोम मिले हैं. हालांकि पीड़िता ने साफ कहा था कि उसके साथ रेप हुआ था, लेकिन चूंकि वह लड़कों को पहले से जानती थी- इसलिए ऐसा माना गया कि कई बातों से सेक्स संबंध में उसकी सहमति के संकेत मिलते हैं. इन बातों में से एक बात सिगरेट पीना भी है.


लड़की का सिगरेट पीना उसके लिए मुसीबत बन गया. इस एक आदत की वजह से वह विक्टिम से कल्प्रिट बन गई. कटघरे में खड़ी कर दी गई. लोगों ने कहा-सिगरेट पियोगी, शराब पियोगी तो कैसे बचोगी? ये सब मर्दों के काम हैं. मर्दों के बराबर होने के लिए सिगरेट पीना, शराब पीना, क्या जरूरी है!! सिगरेट-शराब पीना औरत का काम नहीं. गुजरात सरकार इसी के चलते एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगा रही है कि पिछले सात सालों में उन्होंने सात हजार रुपए शराब पर खर्च कर डाले. उनके एनजीओ की अनियमितताओं में शराब का क्लॉज कब क्राइम बन गया- यह कोई समझाए. एक पैकेट और एक बोतल, औरतों के कैरेक्टर को चूर-चूर करने के लिए काफी है.


INDIA-CRIME-RAPE-CHILDREN


सिगरेट पीती है तो चालू तो होगी ही, ईजिली अवेलेबल भी हो जाएगी. एक बार एक कलीग ने बताया था कि कुछ दफ्तरों, जिनमें वह काम करती थी, अपने सहकर्मियों के साथ सिगरेट-शराब पीना आदमियों के लिए दोस्ती करने के लिए जरूरी सा हो जाता था. लेकिन जैसे ही कोई नई महिला कलीग सिगरेट जलाती थी, शराब की गिलास उठाती थी, मूड बदल जाता था. मानो, वह सीधा बेडरूम में आने का इनविटेशन दे रही हो.


मतलब रेप हुआ ही इसलिए क्योंकि लड़की की एक आदत, लड़कों को इनविटेशन लगी. दो-एक बार का यस, हर बार का यस बन गया. लड़की ने नो कहा, तब भी लड़के यस ही समझते रहे. इसी यस-नो के चक्कर में एक और औरत नप गई. पीपली लाइव वाले डायरेक्टर महमूद फारूकी रेप के आरोप से बरी कर दिए गए. उन पर एक अमेरिकी रिसर्चर ने रेप का आरोप लगाया था. फारूकी को बरी करते समय जो फैसला सुनाया गया था, उसमें कहा गया कि कभी-कभी नो भी नो नहीं, यस होता है.


अंग्रेजी भाषा को दो सामान्य शब्दों के इंटरप्रेटेशन इतने मुश्किल बन गए कि अर्थ का अनर्थ हो गया. जानने वालों ने भी कहा, अमेरिकी औरतों का क्या... वे तो बिंदास ही होती हैं. ये भी थी- फारूकी के गले लगी रहती थी- किस वगैरह करना तो चलता ही रहता था. बस, फारूकी इस आजादख्याली के चलते बहल गए. तो, यहां भी विक्टिम ब्लेमिंग चालू हो गई.




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सेक्सुअल हैरेसमेंट के बहुत से मामलों में हम विक्टिम को दोहरे हैरेसमेंट का शिकार बना देते हैं. दिल्ली होई कोर्ट की मशहूर वकील रेबेका जॉन के फेसबुक पेज की एक पोस्ट में ऐसी 16 दलीलों का जिक्र है, जो रेप केसेज़ के दौरान अक्सर सुनने को मिलती हैं. कोर्ट के भीतर, कोर्ट के बाहर. जैसे- देखकर तो नहीं लगता कि उसका रेप हुआ होगा. उसके कपड़े तो देखो- वह तो खुद ही मुसीबत को न्यौता देती है. रात को घर के बाहर क्या करने गई थी. वह तो कितने लड़कों के साथ नजर आती है. हम लोगों ने औरतों को बहुत आजादी दी हुई है. रेबेका कहती हैं कि हम आपसी बातचीत में ऐसी ही दलीलें देते रहते हैं. फिर सारी गलती औरत की है, यह मानकर बैठ जाते हैं.


दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर मृणाल सतीश की किताब ‘डिस्क्रिशन एंड द रूल ऑफ लॉ: रिफॉर्मिंग रेप सेनटेंसिंग इन इंडिया’ इसकी मिसाल है. किताब में 1984 से 2009 के बीच रेप के 800 मामलों की छानबीन की गई है. इसमें कहा गया है कि अगर रेप का आरोपी कोई परिचित व्यक्ति होता है, रेप विक्टिम शादीशुदा और सेक्सुअली एक्टिव होती है, तो अपराधियों को कम सजा मिलती है.


पर लड़कियां इसे चुनौती की तरह ले रही हैं. अगस्त में वर्णिका कुंडू स्टॉकिंग मामले के बाद बहुत सी लड़कियों ने मिल-जुलकर ट्विटर पर एक हैशटैग चलाया - एंटनोसिंड्रेला (#AintNoCinderella). रात को धमाचौकड़ी मचाने, चिल करने की अपनी ढेर सारी तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालीं. पूछा कि हम रात को बाहर क्यों न निकलें. यूनिवर्सिटीज में पिंजड़ा तोड़ भी इन्हीं दरवाजों के ताले तोड़ने की हिम्मत है. लड़कियां पूछ रही हैं कि हम दोस्तियां क्यों न करें. दोस्तियां अक्सर लड़कियों के लिए आजादी का पहला तजुर्बा बनकर आती हैं. वे अपनी बंधी सीमाओं से आज़ाद अनुभव करती हैं. जाति, भाषा, धर्म, प्रांत, जेंडर से अलग नई किस्म की मित्रताओं, बिरादरियों की संभावना उन्हें आकर्षित करती हैं.


विरोध करने के सौ तरीके हैं. एक तरीका और निकाला गया है- हंसाने का. ‘जेंडर एजुकेशन इनीशिएटिव नो कंट्री फॉर विमेन’ ने एक कैंपेन चलाया- ‘नो विक्टिम ब्लेमिंग’. उसमें तरह-तरह के पोस्टर बनाए गए. एक पोस्टर था- जब हम दूसरे क्राइम्स पर भी वैसे ही रिएक्ट करते हैं जैसे सेक्सुअल हैरेसमेंट में. एक केस लिया गया- सूरत में चार लड़कों ने एक आदमी को चाकू मारा. पहला सवाल किया गया- वह आदमी अपनी बीवी, बहन, मां के बिना अकेले बाहर क्यों घूम रहा था? दूसरा सवाल था- वह आदमी इतनी सुबह घर से क्यों निकला? क्या आदमियों को लगता है कि वह किसी भी समय, कहीं भी जा सकते हैं? तीसरे में कहा गया- इसीलिए कहा जाता है कि आदमियों को घर में ही रहना चाहिए.


ऐसे ही हर तरह के क्राइम में विक्टिम ब्लेमिंग की गई और लोटपोट करने वाले सवाल सामने आए. हां, विक्टिम अब कलप्रिट बनने को तैयार नहीं. वह जीत भी रही है. बीएचयू में पहली महिला चीफ प्रॉक्टर की नियुक्ति यह संकेत देती है. आप भी क्राइम के तरह-तरह के मामलों में विक्टिम ब्लेमिंग का खेल खेलिए और हंसिए. एक केस है- तीन औरतों को एक कुत्ते ने काटा- और एक जवाब है- कुत्ते भी बहक जाते हैं और गलती कर बैठते हैं.


(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)