BLOG : लड़कियों के लिए अब भी घर-घर में श्मशान घाट, फांसी घर हैं!

BLOG : लड़कियों के लिए अब भी घर-घर में श्मशान घाट, फांसी घर हैं!

माशा | 29 Aug 2017 06:39 PM

प्रतीकात्मक तस्वीर

मशहूर कवि गोरख पांडे ने जब ‘घर-घर में दीवारें’ और ‘दीवारों में बंद खिड़कियां’ होने की बात लिखी थी, तब न तो वह 21 साल की बानो बेगम को जानते थे और ना ही 24 साल की हादिया को. फिर भी उन्होंने लिखा था- ‘बंद खिड़कियों से टकराकर अपना सर, लहूलुहान गिर पड़ी है वह.‘ क्योंकि लड़कियों के लिए अब भी घर घर में श्मशान घाट, फांसी घर हैं. दीवारें मजबूत हो चुकी हैं.


बानो बेगम को दलित लड़के से शादी करने पर जला दिया गया. हादिया कुछ खुशकिस्मत है. उसकी हत्या नहीं हुई. धर्म परिवर्तन करने के बाद शादी करने का फैसला उलटा जरूर पड़ गया. केरल हाई कोर्ट में अपने पिता के पक्ष में फैसला आने के बाद वह सुप्रीम कोर्ट गई- पर दीवारें यहां भी पक्की हैं. पूरे मामले को महजबी रंग दिया जा चुका है.


अखिला शादी की लीगल उम्र छह साल पहले पार कर चुकी है. किसी सखी की वजह से दूसरे धर्म में कनवर्ट हुई. नाम रखा- हादिया. पिता को जमा नहीं तो मामला कोर्ट ने पहुंच गया. अभी यह मामला चल ही रहा था कि हादिया ने अपनी मर्जी से निकाह कर लिया. पिता के लिए यह और भी तकलीफदेह था. आखिर माता-पिता को ही तो हमारे यहां संतान की एवज में फैसले लेने का अधिकार है. उनकी दखल के बिना पढ़ाई-लिखाई, शादी ब्याह के फैसले कहां लिए जा सकते हैं. आपने फैसला लिया नहीं कि आफत मोल ले ली. हादिया के मामले में भी ऐसा ही हुआ.


कोर्ट ने भी माना कि पिता के साथ अन्याय हुआ है. आखिर 24 साल की ‘कच्ची उम्र’ में लड़की अपने आप फैसले कैसे ले सकती है. यह और बात है कि अपने देश में लड़कियों के लिए शादी की औसत उम्र 22 साल है और 47% लड़कियां 18 साल की लीगल उम्र से पहले ब्याह दी जाती हैं.


हादिया का मामला दिलचस्प इसीलिए भी है क्योंकि पिछले एक हफ्ते के अंदर सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसले सामने आए हैं. पहला इंस्टेंट तीन तलाक का है जिसमें कहा गया है कि एक झटके में औरत को तलाक दे देना गलत है. यह औरतों के हक के खिलाफ है. इसी हक को एक दूसरे फैसले में भी बरकरार रखा गया है. यह प्राइवेसी का हक है. मतलब हमें अपने शरीर, अपने मन और अपने दिमाग पर हक है. साथ ही अपने फैसले लेने का भी हक है. निजता का अधिकार है तभी उसका उल्लंघन करने पर औरतों को कानून संरक्षण देता है.


दिल्ली गैंगरेप के बाद 2013 में बलात्कार कानून में जो संशोधन किए गए (आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013), उनका आधार भी महिलाओं की निजता और उसकी निजता का संरक्षण करना ही था.


हादिया या उसकी जैसी लड़कियों को भी इसी हक की दरकार है. जब-जब यह कहा जाता है कि 24 साल की लड़की कमजोर और संवेदनशील होती है जिसका कई तरह से शोषण होता है, जैसा कि केरल हाई कोर्ट का कहना था, तब-तब हम यह साबित करते हैं कि लड़कियों को हमेशा किसी न किसी मर्द के सहारे की जरूरत होती है. खाप-पंचायतों से लेकर तरह-तरह के स्थानीय समूहों के फैसले लड़कियों पर लादे जाते हैं.




दिल्ली विश्वविद्यालय (फाइल फोटो)

दिल्ली विश्वविद्यालय के हॉस्टल का नाइट कर्फ्यू भी यही अनडायरेक्ट हिदायत देता है कि बाहर निकलीं तो हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. दिल्ली के मिरांडा हाउस में पढ़ चुकी और हॉस्टल में रहने वाली एक लड़की ने बताया था कि उसकी वॉर्डन कहा करती थी- शाम के बाद हॉस्टल से बाहर निकलो- बस, प्रेग्नेंट होकर वापस मत आना. प्रेग्नेंट होना भी औरत का अपना अधिकार नहीं. वह होना चाहे, न चाहे.


हादिया चाहती है कि उसे अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनने का हक मिले. यह उसकी अपनी स्वायत्तता का सवाल है. एक एडल्ट लड़की की ऑटोनॉमी और प्राइवेसी को संविधान भी स्वीकार करता है. वह धर्म परिवर्तन करना चाहे या अपना नाम. फिर जिस धर्म को किसी इंसानी निजाम के कानूनी सहारे से बचाना पड़े, उसका वकार ही क्या है. दरअसल इंसान जब एक बड़े समुदाय को अपने काबू में रखना चाहता है तो अक्सर धर्म उसका मददगार बन जाता है. इस मर्ज से आजाद होना जरूरी है.


हमारे यहां हादिया जैसी लड़कियां बहुत सी हैं. हादिया कोर्ट पहुंच तो गई पर कोर्ट ने उसकी गवाही लिए बिना मामले की जांच के आदेश दे दिए. अधिकतर अपने घर-आंगन से भी बाहर नहीं निकल पातीं. बंद खिड़कियों से टकराकर लहूलुहान हो जाती हैं या लहूलुहान कर दी जाती हैं. एनसीआरबी का डेटा कहता है कि 2014-16 के दौरान ऑनर किलिंग के 288 केसेज दर्ज किए गए हैं. जहां लड़कियां मां-बाप के हत्थे नहीं चढ़तीं, वहां लड़कों को जबरन फंसा दिया जाता है.


एक मशहूर अंग्रेजी अखबार ने 2013 में दिल्ली के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के 600 रेप ट्रायल्स की स्टडी करने पर पाया था कि इनमें 40% से ज्यादा केस कन्सेंसुअल सेक्स यानी सहमति से सेक्स के होते हैं. एक तिहाई मामलों में कपल घर से भागा हुआ होता है और माता-पिता लड़के पर रेप का चार्ज लगा देते हैं.


Supreme-Court


क्या लड़कियां इनसे घबराती हैं... बिल्कुल नहीं. नई लड़कियां हादिया सी जहां कहीं भी होती हैं, चाक पर अपने लिए स्पेस गढ़ लेती हैं. मध्ययुगीन, छटपटाती औरतों के दारुण प्रोफाइल पर उनकी तस्वीर चिपका देने से लगता है, संसार बदलेगा. इस बीच खबर यह भी है कि 27 जुलाई को केरल हाई कोर्ट की एक दूसरी बेंच ने 19 साल की एक लड़की अब्दुल्ला के मामले में साफ कहा कि वह एक एडल्ट लड़की के फंडामेंटल राइट पर रोक नहीं लगा सकती. लड़की अपनी पसंद से शादी करना चाहती हैं और उसके पिता उसे रोक रहे हैं. कोर्ट ने कहा कि यह माता-पिता की सिर्फ विशफुल थिकिंग हो सकती है कि बच्चे उनके कहेनुसार चलें. तो, ‘बच्चों’ की इच्छाओं पर लगाम लगाने के लिए केरल में कई हेल्पलाइनें चलाई जा रही हैं ताकि लड़कियों को दूसरे धर्म के लड़कों से सेव किया जा सके.


लड़कियों को सेव करने के लिए कोई फरिश्ता नहीं आएगा. बल्कि अपने सेवियर्स से ही लड़कियों को खुद को सेव करना होगा. खुद को हर धर्म, हर पंथ के तंग फंदे में फंसने से बचना होगा. किसी और को अपने वक्त की रुदाली मानकर अपना काम उनके जिम्मे नहीं डाला जा सकता. वक्त रहते आवाज उठानी होगी, क्योंकि देर तबाही को न्यौता है.


नोट- उपरोक्त दिए गए विचार और आंकड़ें लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.