मिशन इम्पॉसिबल : बहन मायावती दुश्मन से भी हाथ मिलाने को तैयार!

मिशन इम्पॉसिबल : बहन मायावती दुश्मन से भी हाथ मिलाने को तैयार!

बसपा सुप्रीमो मायावती की माया तो राम ही जाने! जिस यूपी में बारी-बारी से भाजपा और सपा को गच्चा देकर वह 4 बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं उसी यूपी में आज वह बीजेपी को नेस्तनाबूद करने के लिए सपा जैसी दुश्मन से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं! लखनऊ के आम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर बाबासाहेब आम्बेडकर की 126वीं जयंती मनाने पहुंची बहन मायावती ने यहां तक कह डाला था कि जो लोग आम्बेडकर के अनुयाइयों का सदियों से उत्पीड़न करते आए हैं, वही आज उनकी जयंती मनाते घूम रहे हैं. इसी अवसर पर उन्होंने संकल्प लिया कि अब ज़हर से ज़हर को काटने का काम किया जाएगा!


लेकिन प्रश्न यह उठता है कि होमियोपैथी के मूल सिद्धांत वाले इस उपचार में उनका साथ कौन देगा? बसपा यूपी में मुलायम सिंह को काफी पहले ही दुश्मन बना चुकी चुकी है. उसकी दलित वोट वाली जेब बीजेपी पिछले विधानसभा चुनाव में काट चुकी है. जिस वंशवाद और पारिवारिक सदस्यों को राजनीति में आगे बढ़ाने का मायावती जी-जान से विरोध करती थीं, वह सिक्का भी उन्होंने अपने सगे भाई आनंद कुमार को बसपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष घोषित करके अपने ही हाथों खोटा कर लिया. यूपी की 403 में से सिर्फ 19 विधानसभा सीटों पर सिमट जाने वाली बहन मायावती ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी का राग अब भी आलाप रही हैं और बीजेपी के हाथों से ‘लोकतंत्र बचाने’ का संकल्प ले रही है!


मायावती परिवारवाद की आलोचना करते हुए बसपा संस्थापक कांसीराम का उदाहरण देते नहीं थकती थीं और इसीलिए ख़ुद भी शादी न करने की मिसाल भी देती थीं. पार्टी के क़द्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को चुनावों से ऐन पहले उन्होंने इसी बिना पर बाहर चले जाने दिया था कि वह अपने कई परिवारजनों के लिए टिकट मांग रहे हैं! लेकिन अपने छोटे भाई आनंद कुमार को उपाध्यक्ष बनाकर न सिर्फ उन्होंने अपना संकल्प तोड़ा बल्कि पार्टी के दिग्गजों नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी, सुधींद्र भदौरिया और सतीश चंद्र मिश्र का क़द भी छोटा कर दिया है.


मायावती के खिलाफ़ ताज कॉरीडोर घोटाले तथा आय से ज़्यादा संपत्ति अर्जित करने के केस में सीबीआई जांच चल रही है और जीते जी अपनी और हाथियों की मूर्तियां लगाने में करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाने के दाग़ लगे हुए हैं. भले ही उन्होंने अपने भाई आनंद कुमार को इस शर्त के साथ यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने का वादा किया है कि वह पार्टी में हमेशा निःस्वार्थ भावना से कार्य करेंगे और कभी भी सांसद, विधायक, मंत्री या मुख्यमंत्री वगैरह नहीं बनेंगे, लेकिन आरोप यह है कि आनंद कुमार की कंपनियों ने मात्र 7 सालों में 18000% मुनाफ़ा कमाया, जिनमें 5 साल मायावती का मुख्यमंत्रित्वकाल था. अभी दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में आनंद कुमार से जुड़ी फर्मों व कंपनियों पर आयकर विभाग ने छापामारी की है. इससे बसपा का शीर्ष नेतृत्व भ्रष्टाचार के मोर्चे पर भी निशाने पर बना रहेगा.


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यूपी की 4 बार मुख्यमंत्री रह चुकीं आज की राज्यसभा सांसद मायावती अपने जन्मदिन की फिजूलख़र्ची को लेकर भी चर्चा में रहती हैं. उनके 47वें जन्मदिन पर पार्टी के लिए फंड इकट्ठा करने को लेकर कांसीराम ने जमकर तारीफ क्या कर दी थी कि उसके बाद तो मायावती का जन्मदिन एक कुबेर-समारोह बन गया और 2010 में 7312 करोड़ जमा और अरबों रुपए ख़र्च किए गए! दलितों की मसीहा का यह दिव्य रूप आज ख़ुद दलित भी नहीं पचा पाते!


हालांकि देश की राजनीतिक तस्वीर और ज़रूरत यही है कि बीजेपी के बुल्डोजर से बचने के लिए तमाम क्षेत्रीय दल एकजुट हो जाएं और राष्ट्रीय स्तर पर धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एक साझा मोर्चा बनाया जाए. कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर, नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, एनसीपी के शरद पवार और डीपी त्रिपाठी, सपा के अखिलेश यादव, आरजेडी के लालू यादव, जेडीयू के नीतीश कुमार, टीएमसी की ममता बनर्जी आदि इसकी सख़्त ज़रूरत भी बता चुकी हैं. लेकिन इन दलों के आपसी स्वार्थ और अंतर्विरोध इतने हैं कि स्थानीय स्तर पर इनका एक छतरी के नीचे आना असंभव-सी बात लगती है. सवाल यह भी है कि विपक्ष में एकमात्र अखिल भारतीय चेहरे वाली कांग्रेस राहुल गांधी को छोड़कर राष्ट्रीय स्तर पर इनमें से किसका नेतृत्व स्वीकार करेगी?


दूसरी तरफ ‘मिशन 2019’ के लिए बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए ने एकमत से नरेंद्र मोदी को अपना निर्विवाद सेनापति घोषित कर दिया है और यूपी में एक के बाद एक लोकलुभावन घोषणाएं करके सीएम योगी बीजेपी की राह सभी 80 सीटों के लिए आसान कर रहे हैं. यूपी में सवर्ण हिंदुत्व के साथ गैरयादव ओबीसी, गैरजाटव एससी, परंपरागत अगड़ी जातियों को मिलाकर एक नया जातीय समीकरण पहले ही उभर चुका है.


उड़ीसा पर कब्ज़ा करने के लिए बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सम्मेलन भुवनेश्वर में हो चुका है जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के सभी महारथी शामिल हुए. दक्षिण और पूर्वी भारत में बीजेपी आधार मजबूत करने की दिशा में आरएसएस एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही है. अपने 92 वर्षों के इतिहास में संघ ने पहली बार तमिलनाडु में अपनी एजीएम की. कोयंबतूर में 19 से 21 मार्च के बीच उसकी ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ की बैठक हुई. पश्चिम बंगाल में अभी जिस पैमाने पर उसने हनुमान जयंती मनाई है, उसकी मिसाल राज्य के इतिहास में नहीं मिलती! जाहिर है बीजेपी अपने ‘मिशन 2019’ को लेकर देश्व्यापी स्तर पर अभी से बेहद सक्रिय है.


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यूपीए के लिए मिशन इम्पॉसिबल से लग रहे 2019 के आम चुनावों में बीजेपी का विजय रथ रोकने और अपनी ज़मीन बचाने की फिराक में मायावती को आज कट्टर प्रतिद्वंद्वी सपा से हाथ मिलाने और राष्ट्रीय स्तर पर किसी महागठबंधन में शामिल होने से भी कोई गुरेज़ नहीं है. लेकिन चिंता की बात यह है कि अखिलेश के मन बनाने के बावजूद मुलायम सिंह ने इसके लिए साफ मना कर दिया है. ऐसे में यूपी में बसपा का ग्राफ लोकसभा की शून्य सीट से बहुत ज़्यादा आगे बढ़ता नहीं दीखता. मायावती को यकीनन बेचैनी इस बात को लेकर भी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर भानुमती के इस संभावित कुनबे का नेतृत्व कौन करेगा?


(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आकड़ें लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)


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