योगी के ‘गुलाब’ गुल मोहम्मद खान

योगी के ‘गुलाब’ गुल मोहम्मद खान

ब्रजेश सिंह | 20 Mar 2017 04:05 PM

देश के सबसे बड़े राज्य की कमान बतौर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने कल संभाल ली. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के पहले ही उनके आलोचक ये सवाल खड़ा करने में लग गये हैं कि आखिर योगी राज में मुस्लिम कैसे सुरक्षित महसूस कर सकते हैं, जिनके खिलाफ वो ज़हर उगलते रहे हैं. सवाल पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पर भी खड़ा किया जा रहा है कि आखिर क्या सोचकर आदित्यनाथ योगी को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया गया, वो भी तब जब चुनाव में मोदी ने उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने के वादे के साथ लोगों से वोट मांगे थे.


आलोचक तो ये तक कहने में लग गये हैं कि योगी की बतौर सीएम नियुक्ति के साथ ही मोदी का विकास वाला मुखौटा उतर गया है और मोदी सिर्फ कट्टर हिंदू राजनीति को प्रोत्साहन देने में लगे हैं देश के सबसे बड़े राज्य में. आलोचना के इस दौर में जब योगी आदित्यनाथ को मुस्लिम समाज के लिए सबसे बड़े खलनायक के तौर पर पेश किया जा रहा है, योगी के जीवन की एक कहानी ऐसी है, जो इससे उलट तस्वीर पेश करती है. ये कहानी शुरू होती है विसनगर से, जहां के एक कॉलेज से खुद मोदी ने बारहवीं की पढ़ाई की थी.


इस कहानी के केंद्र में रहे हैं गुलाबनाथ महाराज, जिनकी योगी आदित्यनाथ काफी इज्जत किया करते थे. गुलाबनाथ महाराज का मूल नाम गुल मोहम्मद खान था. गुल मोहम्मद खान बगल के बनासकांठा जिले के वडगाम तालुका के पसवादर गांव में एक मुस्लिम परिवार में जन्मे थे. गुल मोहम्मद के पूर्वज पठान थे और अफगानिस्तान से आकर गुजरात के इस हिस्से में बसे थे.


गुल मोहम्मद खान बचपन से ही हिंदू दर्शन और अध्यात्म में रुचि दिखाने लगे थे. उनके पिता असीम खान भी नाथ संप्रदाय के संतों की इज्जत किया करते थे. ऐसे में किशोरवस्था पूरी होते-होते गुल मोहम्मद नाथ संप्रदाय के संत बालकनाथजी के काफी करीब आ गये और आगे चलकर बालकनाथ जी से दीक्षा लेकर ही नये अवतार में आये, बन गये गुलाबनाथ. यही गुलाबनाथ आगे चलकर नाथ संप्रदाय के विसनगर मंदिर के गादीपति भी बने और साठ साल तक इस जिम्मेदारी को निभाते रहे.


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इस दौरान गुलाबनाथ के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ती चली गई. न सिर्फ चौधरी, पटेल या फिर पांचाल समुदाय के लोगों में गुलाबनाथ महाराज का प्रभाव बढ़ा, बल्कि मुंबई ही नहीं, बाद के वर्षों में विदेश में भी उनके भक्तों की संख्या बढ़ती चली गई. एक मोटे अनुमान के मुताबिक करीब दस लाख लोग गुलाबनाथ महाराज के प्रभाव में थे और उनके प्रति श्रद्धा रखते थे.


सवाल ये उठता है कि गुलाबनाथ और योगी आदित्यनाथ के बीच नजदीकी कैसे बढ़ी. दरअसल उम्र में योगी आदित्यनाथ और गुलाबनाथ के बीच काफी अंतर था, लेकिन साझा संबंध ये था कि दोनों ही महंत अवैद्यनाथ के करीबी थे. गोरक्ष पीठाधीश्वर के तौर पर महंत अवैद्यनाथ ने एक तरफ जहां पौडी गढ़वाल जिले के निवासी अजय सिंह बिष्ट को दीक्षा देकर योगी आदित्यनाथ के तौर पर अपना उत्तराधिकारी बनाया था, तो दूसरी तरफ गुलाबनाथ को नाथ संप्रदाय का प्रमुख चेहरा बनाया था, उनके उपदेश गुरू भी थे वो. इसी वजह से आदित्यनाथ और गुलाबनाथ के बीच गुरुभाई का रिश्ता बना. महंत अवैद्यनाथ की वजह से ही योगी आदित्यनाथ गुलाबनाथ महाराज के करीब आते गये, क्योंकि गुलाबनाथ महाराज भी काफी करीब थे अवैद्यनाथ के.


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उम्र बढ़ने और सेहत ठीक नहीं रहने के कारण जब महंत अवैद्यनाथ का प्रवास कम हो गया, तो योगी आदित्यनाथ के जिम्मे ही देश भर में मौजूद नाथ संप्रदाय से जुड़े करीब डेढ़ हजार आश्रमों के दौरे करने और संबंधित संतों से मुलाकात करने का काम आया. इसी सिलसिले में योगी आदित्यनाथ नियमित अंतराल पर गुजरात आया करते थे, जहां नाथ संप्रदाय से जुड़े छोटे-बड़े चौदह आश्रम हैं. इन आश्रमों में से ही एक महत्वपूर्ण आश्रम था विसनगर का आश्रम, जहां के गादीपति थे गुलाबनाथ जी.


योगी आदित्यनाथ और गुलाबनाथ महाराज के बीच पहली मुलाकात के बाद ही संबंध प्रगाढ़ होते चले गये. महंत अवैद्यनाथ भी गुलाबनाथ महाराज से काफी प्रेम करते थे. कारण बहुत साफ था. गुलाबनाथ महाराज, जो मुस्लिम परिवार में जन्मे थे, सनातम धर्म को न सिर्फ सहजता से अपनाया था, बल्कि उसका प्रचार-प्रसार भी बड़े पैमाने पर कर रहे थे. आठवीं तक पढ़े गुलाबनाथ महाराज व्यक्तिगत अभ्यास से न सिर्फ वेद-पुराण के अच्छे ज्ञाता बन चुके थे, बल्कि अंग्रेजी भाषा पर भी उनका नियंत्रण आ चुका था. वो साल में करीब तीन महीने विदेश अपने शिष्यों से मिलने जाते थे, उस वक्त वो धारा प्रवाह अंग्रेजी भी बोला करते थे.


आदित्यनाथ और गुलाबनाथ के बीच संबंधों की प्रगाढ़ता का आलम ये था कि अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर आदित्यनाथ गुलाबनाथ से मुलाकात के लिए आते रहते थे. विसनगर आश्रम का दौरा योगी आदित्यनाथ के गुजरात प्रवास का अनिवार्य हिस्सा होता था. योगी आदित्यनाथ का आखिरी गुजरात दौरा भी गुलाबनाथ के सिलसिले में ही हुआ था.


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दरअसल 6 दिसंबर 2016 के दिन करीब 86 वर्ष की उम्र में गुलाबनाथ महाराज ब्रह्मलीन हो गये थे. ऐसे में उसी दिन शाम को योगी आदित्यनाथ भागे-भागे विसनगर आए और लगातार तीन दिन तक रुके. गुलाबनाथ महाराज को समाधि देने का काम भी योगी आदित्यनाथ ने ही किया, जो वर्ष 2014 में महंत अवैद्यनाथ के देहांत के बाद गोरक्ष पीठाधीश्वर भी बन चुके थे. योगी आदित्यनाथ ने ही अपने गुरुभाई गुलाबनाथ महाराज के देहांत के बाद उनके शिष्य शंकरनाथजी को चादर देकर उन्हें विसनगर पीठ का गादीपति भी नियुक्त किया.


योगी आदित्यनाथ और गुलाबनाथ महाराज के प्रगाढ़ रिश्ते की इस कहानी का एक पहलू नरेंद्र मोदी से भी जुड़ा है. दरअसल गुलाबनाथ महाराज और नरेंद्र मोदी के रिश्ते भी काफी अच्छे थे. एक तो विसनगर आश्रम मोदी के गृहजिले महेसाणा का हिस्सा है, दूसरा कारण ये कि बतौर संगठन महामंत्री जब मोदी गुजरात में थे या फिर उससे पहले आरएसएस के प्रचारक के तौर पर काम कर रहे थे, धार्मिक संतों के साथ संपर्क बनाने की जिम्मेदारी उनके पास थी. ऐसे में गुलाबनाथ महाराज के साथ भी उनके करीबी रिश्ते बनते चले गये. यहां तक कि जब मोदी करीब तेरह वर्ष तक गुजरात के सीएम रहे, वो हर तीन-चार महीने पर एक बार गुलाबनाथ महाराज को फोन कर उनका हाल-चाल जान लेते थे, ये बात खुद गुलाबनाथ महाराज अपने शिष्यों को बताते थे.


बहुत कम लोगों को ध्यान में होगा कि मोदी को बीजेपी ने वर्ष 2013 के सितंबर महीने में पीएम उम्मीदवार के तौर पर पेश किया, लेकिन देश के संत समाज ने अपनी तरफ से ये काम दो साल पहले 2011 में ही कर दिया था.


भारतीय संत सभा की बैठक 2011 में अहमदाबाद में आयोजित की गई थी, जिसमें योगी आदित्यनाथ के साथ ही गुलाबनाथ महाराज भी मौजूद थे. इसी बैठक में तमाम संतों ने मोदी को देश के प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे सुयोग्य करार दिया था और आखिरकार वर्ष 2014 में मोदी देश के प्रधानमंत्री भी बने. ये भी एक संयोग है कि वर्ष 2016 में गोरखपुर में हुई संत सभा की एक बैठक के दौरान योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने की मांग संतों की तरफ से की गई और आज यूपी में सत्ता की बागडोर योगी आदित्यनाथ के हाथ में आ चुकी है बतौर मुख्यमंत्री.


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ये भी एक संयोग ही है कि जुलाई 2016 में गोरखनाथ मंदिर में ही योगी आदित्यनाथ, गुलाबनाथजी महाराज और नरेंद्र मोदी एक साथ मिले थे. उस समय प्रधानमंत्री मोदी न सिर्फ संतों की बैठक में शरीक हुए थे, बल्कि महंत अवैद्यनाथ की प्रतिमा का अनावरण भी किया था, जिनके उत्तराधिकारी बने योगी आज यूपी के मुख्यमंत्री बन चुके हैं.


खास बात तो ये भी है कि खुद गुलाबनाथ महाराज अपने साथी संतों के साथ मिलकर 2014 के लोकसभा चुनावों में यूपी में मोदी के लिए प्रचार करने पहुंचे थे. यूपी में 2014 के उस लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 71 सीटें जीती, जिसमें वाराणसी से नरेंद्र मोदी की रिकॉर्ड जीत भी शामिल थी. मोदी के पीएम बनने की खुशी गुलाबनाथ महाराज ने मनाई थी और आज उनके परिवार के लोगों को योगी आदित्यनाथ की नई भूमिका को लेकर खुशी है. गुलाबनाथ महाराज के बड़े भाई जुमा खान, जो अब 93 वर्ष के हो चुके हैं, उन्हें अपने भाई और योगी आदित्यनाथ के करीबी संबंधों की पूरी जानकारी है. यहां तक कि जुमाखान का बेटा दिलावर, जो पत्थर तोड़ने वाली मशीनें बनाने की फैक्ट्री चलाता है, उसे भी इस बात की खुशी है कि उसके चाचा जिस नाथ संप्रदाय के संत थे, उसी नाथ संप्रदाय के सबसे प्रमुख संत के पास अब देश के सबसे बड़े राज्य की कमान है.


उत्तर प्रदेश में भले ही विपक्षी दल योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद मुस्लिम समुदाय में डर फैलने की बात कर रहे हों, लेकिन करीब हजार किलोमीटर दूर गुजरात में एक मुस्लिम परिवार ऐसा है, जो इसकी खुशी मना रहा है, योगी आदित्यनाथ से अपने को जुड़ा महसूस कर रहा है. आखिर हो भी क्यों ना, परिवार के सदस्य गुल मोहम्मद भले ही गुलाबनाथ के रुप में नाथ संप्रदाय के साधु बन गये, लेकिन परिवार का संपर्क उनसे बना रहा और उन्हीं के जरिये योगी आदित्यनाथ से भी, जो उनके लिए डर नहीं, प्रेम के प्रतीक हैं.