BLOG: बदले-बदले सरकार नजर आते हैं

BLOG: बदले-बदले सरकार नजर आते हैं

बड़ी जंग जीतने के लिए कई बार पीछे भी हटना पड़ता है और मोर्चा भी बदलना पड़ता है. पिछले दस दिनों में मोदी सरकार के दो बड़े फैसले संकेत दे रहे हैं कि बड़ी जंग जीतने की तैयारी हो रही है. पेट्रोल डीजल पर दो रुपये की छूट पहला फैसला था और जीएसटी में छोटे व्यपारियों को राहत देना दूसरा फैसला है. सबसे बड़ी बात है कि पेट्रोल के भाव पर कुछ दिन पहले ही मोदी सरकार के ही एक मंत्री ने देश की जनता को ज्ञान दिया था कि विकास के लिए पैसे का जुगाड़ किस तरह किया जाता है और कैसे पेट्रोल की बढ़ी कीमत को सहन कर सकने वाले भी बेकार का रोना रो रहे हैं. लेकिन इसके तत्काल बाद ही सरकार ने घोषणा कर दी. जीएसटी से कपड़ा व्यापारी दुखी थे. मोदी सरकार के अफसर से लेकर मंत्री तक यही कह रहे थे कि टैक्स के दायरे में पहली बार आने के कारण रोना रोया जा रहा है, लेकिन अब जीएसटी में राहत देकर सरकार ने टैक्स के दायरे से बचने वालों के आंसु पोंछने की कोशिश की है. ऐसा मोदी शासन में होता नहीं था. पिछले तीन सालों में ऐसा होना सुना देखा नहीं था. इससे भी बड़ा बदलाव मोदी सरकार ने अपने ही फैसले को उलट कर किया है. आर्थिक सलाहकार परिषद को मोदी ने खत्म कर दिया था, लेकिन अब इसका गठन किया गया है. यह बात हालांकि समझ के परे हैं कि नीति आयोग के ही एक सदस्य को परिषद की कमान क्यों सौंप दी गई?.


कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीजेपी और मोदी हमेशा चुनाव जीतने की फिराक में ही रहते हैं, लिहाजा ताज़ा फैसले गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में ही देखे जाने चाहिए. यह बात एक हद तक सही हो सकती है लेकिन मोदी तो जोखिम लेने के लिए जाने जाते हैं. उत्तर प्रदेश का चुनाव याद कीजिए. मतदान शुरु होने से कुछ दिन पहले ही घरेलु गैस सिलेंडर 76 रुपये मंहगा कर दिया गया था. यूपी जीतना मोदी और अमित शाह के लिए जन्म मरण का सवाल था, लेकिन उसके बावजूद सिलेंडर के दाम बढ़ा दिए गये थे. यूपी की तरह गुजरात जीतना भी मोदी और अमित शाह के लिए बहुत जरुरी है लेकिन यहां जीएसटी से खाखरा को अलग करने का फैसला मोदी सरकार ने कर लिया. जिन 27 चीजों पर से जीएसटी कम किया गया है, उनमें से सात का सीधा रिश्ता गुजरात से जुड़ता है. जाहिर है कि आर्थिक मोर्चे पर सरकार की नाकामी पर कभी अपने रहे बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के लेख भारी पड़े हैं. शल्य से लेकर भीष्म पितामाह से लेकर दुशासन दुर्योधन जैसी उपमाओं और तुलनाओं से बात आगे बढ़ चुकी है. यह बात मोदी समझ गये हैं. जिस दिन रिजर्व बैंक आर्थिक हालात की गमगीन तस्वीर पेश करता है उसी दिन मोदी एक सम्मेलन में आंकड़ों के साथ पहुंचते और तालियां बजवाने में भी कामयाब हो जाते हैं लेकिन वह खुद जानते हैं कि आंकड़ों से न नौकरी मिलती है और न ही पेट भरता है. जब मनमोहनसिंह सरकार के समय विकास दर आठ पार कर गयी थी तब विपक्ष में बैठी बीजेपी ही कहा करती थी कि आंकड़ों से पेट नहीं भरता. अब जब वह सत्ता में है तो कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों के साथ साथ बीजेपी के ही दो नेता यही राग अलाप रहे हैं. यह राजनीति है. छवि बनाने और बिगाड़ने की राजनीति है. इस छवि के खेल को मोदी और शाह से ज्यादा और कौन बेहतर ढंग से समझ सकता है. लिहाजा ताबड़तोड़ अंदाज में सारी आलोचना का मुंह तोड़ जवाब देने का फैसला किया लगता है.


सवाल उठता है कि जो प्रधानमंत्री कड़वी दवा देने और कड़े फैसले लेने की बात करते रहे हों उन्हें एक दो बयानों के बाद क्या सीधे बैक फुट पर आ जाना चाहिए था. या कहीं ऐसा तो नहीं कि विजयदश्मी के मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषण से वह परेशान हो गये हैं. भागवत ने अपने भाषण में रोजगार का जिक्र किया था, छोटे व्यपारियों की तकलीफों के तरफ ध्यान दिलाया था और कुल मिलाकर अंसतोष की बात कही थी. ऐसा लगता है कि मोदी संघ प्रमुख को अर्थशास्त्र समझा नहीं सकते थे और उनके चिंतन को हाशिए पर नहीं छोड़ सकते थे. या कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी भी समझ गये हैं कि जितने आर्थिक सुधार के काम होने थे वह हो लिए, अब चुनाव जीतने हैं और इसके लिए लोकप्रिय फैसले लेने ही होंगे. इस साल गुजरात में और हिमाचल में विधानसभा चुनाव है. अगले साल कर्नाटक और फिर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य हैं. इस बीच कांग्रेस ने भी अपने तेवर बदले हैं. राहुल गांधी ने पहले विदेशों में जाकर मोदी सरकार पर तंज कसे और अब देश में घूम घूम कर मोदी सरकार पर रोजगार नहीं देने के गंभीर आरोप लगा रहे हैं. गुजरात में मंदिर-मंदिर जाने के बाद वह मोदी सरकार पर वार करते हैं. वहां बीजेपी से नाराज पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल उनका स्वागत करते हैं. खफा दलित समाज के नेता जिग्नेश से भी कांग्रेस चुनावी तालमेल करने की तरफ बढ़ रही है. कुछ अन्य छोटे दल भी कांग्रेस के साथ आने का संकेत दे रहे हैं. तो क्या गुजरात में 150 प्लस सीटें जीतने का लक्ष्य सामने रखने वाले अमित शाह को अपने ही दावे पर शंका होने लगी है?


विदेशी एजेंसियां जीएसटी की तारीफ कर रही हैं. विदेशी सरकारों के नुमाइंदे कह रहे हैं कि भारत में भले ही विकास दर के 5.7 फीसद होने पर बवेला मचा हो लेकिन वह इसे बहुत गंभीरता से नहीं लेते. उन्हे लगता है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है और जीएसटी के शुरुआती झटके सहने के बाद स्थिति काबू में आ जाएगी. मोदी सरकार के मंत्री,  मोदी खुद और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी यही कुछ कह रहे हैं. लेकिन क्या वजह है कि उन्हें लगता है कि जनता उनके तर्कों से सहमत नहीं है. आत्मविश्वास में यह कमी क्यों देखी जा रही है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. पिछले तीन सालों में दे ने देखा है कि किस तरह से मोदी सरकार ने विपक्ष के हर वार पर पलटवार कर उसे चित्त किया है. इस बार ऐसा क्यों हुआ कि राहुल गांधी के विदेशी दौरों पर दिये बयानों का जवाब देने के लिए मोदी सरकार के मंत्रियों को उतरना पड़ा. राहुल के बयानों पर प्रतिक्रिया लायक क्यों माना गया. इसकी वजह यही है कि राहुल गांधी ने कांग्रेस की हार के कारण स्वीकारे. राजनीति में अपनी गलती स्वीकार लेना खुद को जनता की नजर में माफी दिलवाना होता है. राहुल का कहना कि यूपीए सरकार घंमड के कारण हारी, रोजगार नहीं दे पाई इसलिए हारी. उसके बाद राहुल कहते हैं कि कांग्रेस रोजगार नहीं दे सकी तो लोगों ने मोदी को रोजगार के लिए चुना और अब अगर वह भी नहीं दे पा रहे हैं तो जनता उनका भी वही हश्र करेगी जो कांग्रेस का किया था. यह एक ऐसा बयान है जो सीधा सपाट होते हुए भी राजनीति की उलटबांसियों से युक्त था.


रोजगार का मतलब नौकरी होता है. सरकारी नौकरी होता है. बीजेपी ने भी अपने चुनाव अभियान में नौकरियां देने का वायदा किया था. हर साल एक करोड़ नौकरियां, लेकिन अब वही बीजेपी कह रही है कि उसने रोजगार के मौके प्रदान करने की बात कही थी और यह काम मुद्रा और अन्य योजनाओं के जरिए हो रहा है. लेकिन उसका यह तर्क शायद जनता के गले नहीं उतर रहा है या यूं कहा जाए कि बीजेपी नेताओं को ही लग रहा है कि यह तर्क काम नहीं कर रहा है. इस सबके बावजूद विपक्ष बिघरा है, राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता सवालों के घेरे में है, कांग्रेस के पास विकल्प का अभाव है और आम वोटर का मोदी में विश्वास कम नहीं हुआ है. (हालांकि यही बात बीजेपी की राज्य सरकारों के बारे में नहीं कही जा सकती). गरीबी रेखा से नीचे वालों को गैस कनेक्शन देने की उज्जवला योजना हो या बिजली से वंचित घरों तक उजाला फैलाने की सौभाग्य योजना, मोदी अपने नये वोट बैंक का निर्माण कर रहे हैं और उसका लगातार विस्तार भी कर रहे हैं. इसका तोड़ अभी तक विपक्ष नहीं निकाल सका है. लेकिन फिर वही सवाल उठता है कि जब चुनावी मोर्चे पर वोटों का गणित पक्ष में है तो फिर कड़े आर्थिक सुधारों से परहेज क्यों किया जा रहा है. सोशल मीडिया के कमेंट पढ़ कर देश को नहीं चलाया जा सकता न ही चलाया जाना चाहिए.


(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार और आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)