शहाबुद्दीन को श्रद्धांजलि: ऐसे बेबाक जिनमें हर बड़ी ताक़तों से टकरा जाने का हौसला था

शहाबुद्दीन को श्रद्धांजलि: ऐसे बेबाक जिनमें हर बड़ी ताक़तों से टकरा जाने का हौसला था

मौत एक अटल हकीकत है और जो भी इस दुनिया में आया है, उसे एक दिन इस दार-ए-फानी से जाना पड़ता है. लेकिन कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं कि जिनके चले जाने का ग़म मुद्दतों सताता रहता है. सैयद शहाबुद्दीन का इंतेकाल भी भारत के मुसलमान के लिए ऐसा ही दर्द है.


सैयद शहाबुद्दीन की शख्सियत के कई रंग हैं. ये आपकी ही शख्तियत का कमाल है कि आपके वैचारिक विरोधी भी आपका ज़िक्र निहायत ही इज़्ज़त और एहतराम से करते हैं और आप से बेइंतेहा मुहब्बत करने वाले भी खफा-खफा से हो जाते हैं. भारतीय मुसलमानों के बीच आपकी हैसियत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के बाद जितने भी बड़े मुस्लिम रहनुमा हुए उनमें आपका नाम पहली पंक्ति के नेताओं में शुमार होता है. बल्कि उत्तर भारत के मुसलमान डॉक्टर जाकिर हुसैन के बाद आपको ही अपना क़ायद मानते हैं.


यूं तो शहाबुद्दीन छात्र जीवन से ही सियासी और समाजी मुद्दों को लेकर आवाज़ उठाते रहे हैं, लेकिन उन्हें अपनी जिंदगी के सफर में हर मोड़ पर जिस खूबी की सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी वो उनकी बेबाकी थी. शहाबुद्दीन का जुनून ऐसा कि समंदर की खतरनाक लहरें हों या जंगल की खामोशी हो या पहाड़ों की अना... बिना अंजाम की परवाह किए तने-तनहा लड़ जाते थे और इसकी नींव छात्र जीवन में ही पड़ गई. तभी तो पहली ही मुलाकात में पंडित नेहरू ने न सिर्फ पहचान लिया बल्कि उन्हें 'बिहार का नॉटी ब्वॉय’ तक कहा. एमएससी तक हर जगह गोल्ड मेडिलिस्ट रहे शहाबुद्दीन ने 1955 में पटना यूनिवर्सिटी में छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया और इसी वजह से उनका आईएफएस में ज्वाइन करना नामुमकिन सा हो गया था. एक साल तक उन्हें ज्वाइन नहीं कराया गया.


बाबरी मस्जिद और शहाबुद्दीन


जिस वजह से शहाबुद्दीन सबसे ज्यादा याद किए जाएंगे या कोसे जाएंगे उनमें बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्म भूमि आंदोलन और शाहबानो केस के दौरान उनके नेतृत्व का मुद्दा सबसे अहम होगा.


जब 80 के आखिरी दशक और 90 के शुरुआती दशक में जय श्री राम जैसे धार्मिक नारे की गूंज से मुसलमान के घरों, मुहल्ले और बस्तियों में खौफ और सन्नाटा पसर जाता था, तब शहाबुद्दीन मुसलमानों के सबसे बड़े मसीहा और रहनुमा थे. उस नफरत, खौफ और मायूसी के दौर में जब सब ज़बानें सिली हईं थीं, शहाबुद्दीन अपने कलम और तर्क से डटे हुए थे, बल्कि दहाड़ रह थे. हालांकि, उस दौर के उनके सियासी अंदाज़ को लेकर उनके चाहने वाले भी सवाल उठाते हैं. उनकी बेबाकी, उनके जोश, जुरुअत और जुनून को कटघरे में खड़ा करते हैं. लेकिन यह भी हकीकत है कि वो ही लोग उनकी ईमानदारी और उनके इरादे पर फिदा हो जाते हैं और यहां तक कहते हैं कि मुसलमानों की तरक्की को लकेर उनमें मौलाना आज़ाद जैसी तदबीर (कोशिश) और अल्लमा इकबाल जैसी तड़प थी.


चाहने वाले क्यों नाराज़ हुए?


शहाबुद्दीन ने दो अहम मुद्दों पर सबसे ज्यादा लड़ाई लड़ी. बाबरी मस्जिद और शाहबानो केस. शाहबानो केस में वे सरकार को झुका तो पाए, लेकिन इसके बदले मुसलमानों की इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी. कानून के रखवालों के सामने बाबरी मस्जिद तोड़ी गई और देशभर में भारी दंगे हुए और इस तरह मुसलमानों के बुनियादी सवालों पर बहस नहीं हो सकी. हालांकि, मुसलमानों के एक तबके का मानना रहा कि 80 के दशक में शहाबुद्दीन की जो सियासी हैसियत थी अगर वो उस वक़्त मुसलमानों के शिक्षा, रोज़गार और आरक्षण जैसे मुद्दे को उठाते तो अपने समाज का ज्यादा भला कर पाते.


वो खूबी जिसका सभी कायल थे


शहाबुद्दीन एक ज़हीन शख्सियत के मालिक थे. इसका अंदाज़ा तो इसी से लगाया जा सकती है वो हमेशा गोल्ड मेडेलिस्ट रहे. भौतिकी शास्त्र में एमएससी करने के बावजूद अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और अरबी के जानकार थे. उर्दू साहित्य से गहरी दिलचस्पी थी. हमेशा सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी मुद्दों पर लिखते रहे. लेकिन ये लिखना कोई आम लिखना नहीं था... इस मजबूती के साथ लिखते थे कि सरकारें हिल जाती थी. विरोधी की जबानें सिल जाती थीं. मुसलमानों की बदहाली का सच सच्चर कमेटी ने बताया, लेकिन उस रिपोर्ट से सालों पहले शहाबुद्दीन यही दावा करते रहे, और ज़बानी नहीं, बल्कि दस्तावेजों और आंकड़ों के साथ ये दावा किया. उनकी इस खूबी का सभी कायल रहे.


जब शाही इमाम से भिड़ गए


बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौरान शहाबुद्दीन की लड़ाई सरकार से तो थी ही, लेकिन उस वक़्त के शाही इमाम अब्दुल्लाह बुखारी से भी उनकी खूब तनातनी रही. इंडिया गेट के वोट कल्ब पर धरने के दौरान तो दोनों बड़ी शख्सियतें गुत्थम गुत्था हो गई. लेकिन जब 2008 में शाही इमाम के निधन पर मैंने शहाबुद्दीन से इस वाक्य पर पूछा तो उनका कहना था कि इमाम साहिब से उनके रिश्ते अच्छे थे, लेकिन वो इस बात के खिलाफ थे कि मस्जिद के मेंबर को सियासत का अड्डा बनाया जाए.


क्यों मुसलमानों की सियासत


शहाबुद्दीन न बहुत धार्मिक थे और न ही टिपिकल मुसलमानों जैसा रहन सहन था. छात्र जीवन में अपने नेतृत्व क्षमता से सबको आगाह किया था. तब उन्हें कम्युनिस्ट होने का तमग़ा मिला, लेकिन उन्होंने इनकार किया और कहा कि वो सेकुलर समाजवादी हैं. आउटस्टेंडिंग वॉयस ऑफ मुस्लिम इंडिया में शहाबुद्दीन का कहना है कि उन्होंने कानून और संविधान के भीतर मुसलमानों के हक और इंसाफ की लड़ाई लड़ी और इसपर उन्हें गर्व है.


राजनीति में कैसे आए


आम लोगों में यही राय है कि शहाबुद्दीन को तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सियासत स्पॉंन्सर की. लेकिन खुद शहाबुद्दीन इससे इनकार करते हैं. ऑउटस्टेंडिंग वॉयस ऑफ मुस्लिम इंडिया में खुद शहाबुद्दीन लिखते हैं कि वाजपेयी से उनके रिश्ते बहुत ही मधुर थे, लेकिन वाजपेयी ने उन्हें तीन बार इस्तीफा वापस लेने के लिए समझाया. राजनीति में आने का फैसला उनका खुद का था. नौकरी से इस्तीफे के बाद दिल्ली के बजाए पटना को अपना ठिकाना बनया और यहीं से सियासत का आगाज़ किया.


इंदिरा गांधी से टकराहट


शहाबुद्दीन की शख्सियत ही ऐसी थी कि किसी से भी टकरा जाते थे. इंदिरा गांधी ने इसे भलीभांति भांप लिया था, तभी इंदिरा गांधी ने शहाबुद्दीन को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वीसी से लेकर मंत्री बनने तक के कई ऑफर दिए. 2004 में भी लोकसभा चुनाव से पहले सोनिया गांधी ने शहाबुद्दीन से मुलाकात की थी और उनसे मदद मांगी थी.


विरोधी भी करते हैं सलाम


शहाबुद्दीन के कलम के सभी कायल थे. जब कुछ साल पहले उन्होंने अपनी मैगजीन मुस्लिम इंडिया को बंद करने का एलान किया तो उनके विरोधी विचारधारा के लेखक सुधेंद्र कुलकर्णी ने इंडियन एक्सप्रेस में लेख लिखकर उनकी काबलियत को सलाम किया था.


कईं किंवदंतियां हैं...


शहाबुद्दीन को लेकर कई किंवदंतियां भी हैं. कई पार्टियों में जाने और खुद की इंसाफ पार्टी बनाने को लेकर मुसलमानों के भीतर उनके नेतृत्व पर सवाल उठते रहे हैं. इसपर शहाबुद्दीन का ये जवाब उड़ाया जाता रहा है कि जब अपने बेटे की प्यास बुझाने के लिए पानी की आस में मां हाजरा सात-सात बार सफा और मरवा की पहाड़ियों पर दौड़ सकती हैं तो क्या मैं कौम की मुहब्बत में सियासी पार्टी भी नहीं बदल सकता.