जानें पांच वजहें, आखिर इतनी जल्दी में क्यों है आम आदमी पार्टी? 

By: | Last Updated: Thursday, 30 January 2014 4:08 PM

पिछले साल की बात है, मैंने अपने बागवानी के शौक को दोबारा जिंदा किया. वैसे पौधे तो हमारी छोटी सी बालकनी में काफी हैं लेकिन इस बार किचन गार्डन बनाने का ख्याल आया. मैंने बाजार जा कर करीब चालीस प्लास्टिक के गिलास खरीदे उनमें मिट्टी और खाद का काम्बिनेशन लगाया और बीज रोप दिए. उम्मीद थी कि कुछ दिनों में मेरे गमलों में बैंगन, भिंडी, तोरई, मिर्च जैसे घर में उगने वाले पौधे फल दे रहे होंगे. मैंने पूरी देखभाल भी की. पर कई दिन हो गए कोई हलचल नहीं हुई. फिर मैंने घर में पूछा तो पता चला मेरे बच्चे उन्हें बार-बार छेड़ते रहे हैं कि कहीं आज पौधा निकल तो नहीं आया. कुछ गुस्सा आया कुछ हंसी, उनकी उत्सुकता वाजिब थी. आज लग रहा है कि उन्होंने गलत क्या किया जब अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के तमाम दिग्गज भी वैसी जल्दबाजी दिखा सकते हैं तो बच्चों का क्या कसूर.

 

जब अच्छा दही जमाना होता है तब उसे ढककर रख दिया जाता है. बार-बार छेड़ा नहीं जाता. अब आप बेशक सवाल करें कि दही और राजनीति क्या मेल? लेकिन मेल तो है जनाब. दही जमाने के लिए दूध को सही तापमान तक उबाला जाता है फिर खट्टा डाल कर छोड़ दिया जाता है. राजनीति में भी सही वक्त का इंतजार जरूरी है. पर शायद टीम केजरीवाल इसी वक्त को सही वक्त मान रही है लेकिन मुझे नहीं लगता कि आम को इतनी जल्दबाजी दिखानी चाहिए थी. 

 

पहला

 

आम आदमी पार्टी ने 350 सीटों पर लड़ने का ऐलान किया है. दिल्ली में 70 विधानसभा सीटें थीं. लेकिन अगर लोकसभा की बात करें तो सिर्फ 7. देश की तुलना में दिल्ली एक बेहद छोटा है जबकि ये साढ़े तीन सौ सीटें बेहद फैली हुई होंगी. दिल्ली जैसी छोटी सी जगह के लिए देश के कई शहरों से वालिंयटर पहुंचे थे. लेकिन जब बात 350 सीटों की होगी इतने लोग कहां से लाएगी आप.

 

 

दूसरा

 

आम आदमी पार्टी ने सदस्य बनने के लिए जो अभियान छेड़ा है उसमें एक करोड़ सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन इस एक करोड़ में ऐसे कितने होंगे जो नए विकल्प को मजबूत करना चाहते हैं और कितने होंगे जिनके लिए ये नेता बनने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने का आसान रास्ता होगा – ये कहना अभी मुश्किल है. पर इनके भेद को आम आदमी पार्टी को खुद पहचानना होगा. अगर ना पहचाना गया तो अभी और ड्रामा इस पार्टी के अंदर देखने को मिल सकता है. मुझे नहीं लगता कि लोकसभा चुनाव तक पूरे देश में से इस फर्क को पहचाना जा सकेगा.

 

तीसरा

 

सवाल ये भी है कि क्या देश भर में जुटे लोगों को राज्य के स्तर पर और फिर ब्लॉक या गांव के स्तर तक जोड़ने में आम आदमी पार्टी कामयाब हो पाएगी. क्या इतने कम समय में आप पार्टी पूरे देश में अपने सदस्यों में से कार्यकर्ता छांट पाएगी और फिर उन छांटे गए कार्यकर्ताओं को चुनाव में घर-घर पहुंचने की तैयारी कर पाएगी? दिल्ली में आप के कार्यकर्ता पहुंचे या ना पहुंचे हों लेकिन उनका मैसेज पहुंच गया था लेकिन यही बात पूरी 350 सीटों पर होगी ये कहना मुश्किल है.

 

चौथा

 

देश में वोट पाने के लिए आप को दिल्ली में अपने को साबित करना होगा. पर महीना बीत जाने के बाद भी दिल्ली की जनता को अब तक पूरा फायदा होता नजर नहीं आया है. करप्शन के नाम पर जो एक्शन हुआ है उसे उगुलियों में गिन सकते हैं. बिजली पानी के बिलों पर ऐलान का फायदा अब तक जनता के पास नहीं पहुंचा है. जो जांच शुरू हुई हैं उनके नतीजे जल्दी आने से रहे. आने वाले महीने में चुनाव शुरू हो जाएंगे तो कोई बड़ा कदम दिल्ली में उठा नहीं पाएंगे केजरीवाल. यानी चुनाव से पहले दिल्ली में कुछ कर दिखाने की उम्मीद कम ही है. असर हुआ तो लंबे वक्त में होगा इसलिए दिल्ली के काम के नाम पर वोट मांगना थोड़ा मुश्किल लग रहा है.

 

पांचवां

 

ऐसे में लगता है कि आम आदमी पार्टी की एक रणनीति राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर खुद को स्थापित करने की है. चार या ज्यादा राज्यों में अगर किसी पार्टी को मान्यता मिल गई तो वो राष्ट्रीय दल बन जाती है. आम आदमी पार्टी को चार राज्यों में राज्य को लोकसभा कोटे से चार फीसदी या ज्यादा सांसद जितवाने होंगे. ये आसान काम नहीं है क्योंकि भारत में फिलहाल छह दल ही ऐसे हैं जो राष्ट्रीय दल होने की हैसियत रखते हैं. कांग्रेस, बीजेपी, के अलावा बीएसपी और एनसीपी हैं तो वहीं सीपीआई और सीपीएम भी राष्ट्रीय दल हैं.

 

रणनीति जो भी हो लेकिन आम आदमी पार्टी अगर देश को बदलने के संकल्प के साथ उतरी है तो उसे लंबी लड़ाई की तैयारी करनी चाहिए ना कि एक साल में विधानसभा और दो साल में लोकसभा के रणनीति पर उतरना चाहिए.

 

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