फिल्म रिव्यू: 'बजाते रहो' के प्रोमो पर न करें भरोसा

फिल्म रिव्यू: 'बजाते रहो' के प्रोमो पर न करें भरोसा

By: | Updated: 27 Jul 2013 05:47 AM

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<b>फिल्म
बजाते रहो के प्रोमो देखकर एक
अच्छी कॉमेडी फिल्म की
उम्मीद बंध गई थी लेकिन ये
फिल्म भी उन्हीं फिल्मों की
जमात में शामिल है, जिनके
सिर्फ ट्रेलर ही बढ़िया होते
हैं.</b>
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फिल्म बजाते रहो कहानी है
मम्मी जी यानि श्रीमती
बावेजा (डॉली अहलूवालिया) की,
जो अपने स्वर्गीय पति मिस्टर
वावेजा के ऊपर लगे धोखाधड़ी
के आरोप को हटाकर उन्हे
निर्दोष साबित करना चाहती
हैं.
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सभरवाल (रवि किशन) ने मिस्टर
बावेजा झांसे में फंसा कर
निवेशकों के 15 करोड़ रुपए का
घोटाला कर दिया था. मम्मी जी
सभरवाल से बदला लेने निकलती
हैं. इस मिशन में उनका साथ
देता हैं उनका बेटा सुखी
(तुषार कपूर), मिंटू (विनय
पाठक), जुगाड़ू बल्लू (रणवीर
शोरी) और कबूतर (हुसैन).
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सभरवाल (रवि किशन) एक घाघ शख्स
है जिसे अपने जाल में फंसाना
बेहद मुश्किल काम है. किस तरह
मम्मी जी की पूरी टीम उससे
बदला लेती है, ये कहानी अपने
आप में दिलचस्प है. फिल्म को
कुछ सीन आपको दिबाकर बनर्जी
की यादगार फिल्म खोसला का
घोसला की याद भी दिला देंगे.
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लेकिन किसी फिल्म को अच्छा
बनाने में सिर्फ स्टोरी
आइडिया काफी नहीं होता. फिल्म
शुरुआत से ही काफी धीमी गति
से चलती हैं. खासतौर पर तुषार
कपूर की प्रेम कहानी दिखाने
में काफी समय बर्बाद किया गया
है. फिल्म में बार बार गाने
जबरदस्ती ठूंसे हुए हैं. सारे
गीत बेकार हैं, सिवाय एक भजन
हैं जिसे सुनकर आपको बेहद
हंसी आएगी.<br /><br />फिल्म की जान
हैं डॉली अहलूवालिया का
परफॉरमेंस. पिछले साल की
कामयाबी फिल्म विकी डोनर में
भी उनके अभिनय की काफी तारीफ
हुई थी. इस फिल्म में उन्हें
पूरा मौका मिला है और वो किसी
सीन में कमज़ोर नहीं पड़ीं.
विनय पाठक काफी समय बाद फॉर्म
में नज़र आए हैं. हालांकि
फिल्म में उनके सीन बहुत
ज्यादा नहीं हैं. हैरानी की
बात है कि विनय पाठक जैसे
बेहतरीन अभिनेता इतनी कम
फिल्मों में क्यों नज़र आते
हैं? रणवीर शोरी भी अपने
किरदार में पूरी तरह फिट बैठे
हैं. रवि किशन ने शायद पहली
बार एक पंजाबी किरदार निभाया
है और विलेन सभरवाल के रोल
में जान डाल दी है. तुषार के
बारे में क्या कहें? डॉली,
विनय पाठक और रणवीर शोरी जैसे
बेहतरीन कलाकारों के सामने
तुषार सपोर्टिंग कलाकार ही
लगते हैं, इससे ज़्यादा कुछ
नहीं.<br /><br />फिल्म के निर्देशक
शशांत शाह इससे पहले फिल्म
दस्विदानिया, चलो दिल्ली और
टेलीविजन पर द ग्रेट इंडियन
कॉमेडी शो बना चुके हैं.
बजाते रहो को वो एक कॉमेडी
थ्रिलर बनाना चाहते थे लेकिन
फिल्म ना तो तो पूरी तरह
कॉमेडी बन पाई है, ना ही
थ्रिलर. फिल्म के कलाकारों ने
अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है,
लेकिन ये फिल्म धीमी रफ्तार,
खराब स्क्रिप्ट और नीरस
डायलॉग्स से मार खा गई.<br /><br />फिल्म
बजाते रहो बहुत अच्छी बन सकती
थी, लेकिन टाइमपास फिल्म से
ज़्यादा कुछ नहीं बन पाई है.
इसे देखने तभी जाएं जब आपके
पास वीकेंड पर कुछ और बेहतर
करने को ना हो.<br />
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