फिल्म समीक्षा: अगर कुछ ना कर रहे हों तो जरूर कर लें बेवकूफियां

By: | Last Updated: Friday, 14 March 2014 7:04 AM
फिल्म समीक्षा: अगर कुछ ना कर रहे हों तो जरूर कर लें बेवकूफियां

फिल्म का नाम: बेवकूफियां

रेटिंग: ढाई स्टार

समीक्षक: यासिर उस्मान

 

कुछ फिल्में होती है जिन्हें ठीक-ठाक, औसत फिल्मों की लिस्ट में रख दिया जाता है. ऐसी फिल्मों को अक्सर थिएटर में जाने के बजाय डीवीडी या टेलीविजन पर देखना ज़्यादा बेहतर रहता है. यशराज फिल्म्स की बेवफूफ़ियां ऐसी ही एक फिल्म है. इसकी कहानी पुराने ढर्रे पर चलती है लेकिन एक नई जोड़ी (आयुष्मान-सोनम) और ऋषि कपूर की बढ़िया एक्टिंग की वजह से ये एक टाइमपास फिल्म तो बन ही गई है.

 

मोहित चढ्ढा (आयुष्मान) गुड़गांव में एक एयरलाइन्स कंपनी में काम करने के साथ-साथ मायरा सहगल (सोनम) से प्यार करता है. लेकिन मायरा के पिता रिटायर्ड IAS अफसर वीके सहगल (ऋषि कपूर) अपनी बेटी की शादी किसी मिडिल क्लास लड़के से नहीं बल्कि किसी अमीर शख्स से करना चाहते हैं.

 

जब उसे मोहित के बारे में पता चलता है तो वो किसी भी तरह मोहित को रिजेक्ट करने की तरकीबें लड़ाता है. इसी बीच रिसेशन यानि आर्थिक मंदी का दौर आता है और मोहित की नौकरी चली जाती है. इसी के साथ मायरा के पिता के सामने खुद को साबित करने की सारी उम्मीद भी टूटने लगती है. फिर कैसे मोहित और मायरा का प्यार इन मुश्किलों से लड़ता है.

 

हबीब फैसल की लिखी रोमांस की ये कहानी आज के ज़माने की है, मंदी वाला ट्विस्ट भी बहुत अच्छा है. लेकिन पहले भाग के बाद फिल्म बोझिल हो जाती है. ये प्यार और पैसे की जंग की आम कहानी बन जाती है. फिल्म में कई जगह हॉलीवुड फिल्म Meet The Parents की झलक नज़र आती है.

 

आयुष्मान का रोल पूरी तरह विकी डोनर के अंदाज़ का है और सोनम को देख कर लगता है कि वो फिल्म में अपना ही किरदार निभा रही है. सोनम और आयुष्मान की केमेस्ट्री इतनी फीकी है कि देखकर लगता है कि ये बेकार में ही एक-दूसरे के प्यार के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वैसे भी फिल्म का सबसे चर्चित पक्ष सोनम का बिकिनी सीन है, उनका अभिनय नहीं.

 

फिल्म में सबसे अच्छा काम ऋषि कपूर का है. जिस सीन में वो आते हैं, उसमें सबके चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है. इस फिल्म को आज के ज़माने का रोमांस कहकर प्रमोट किया गया था मगर पैकेजिंग के अलावा इस रोमांस में हर बात पुरानी नज़र आती है.

 

फिल्म का संगीत बेहद औसत है। सिर्फ ‘गुलछर्रे’ ही याद रहता है. आयुष्मान खुराना का गाया ‘खामख्वाह’ भी बेहद औसत है और उनके पिछले हिट गीतों के सामने कहीं नहीं ठहरता.

 

निर्देशक नूपुर अस्थाना ने मॉडर्न लव स्टोरी बनाने की कोशिश तो की लेकिन फिल्म औसत दर्जे से ऊपर उठने में नाकाम रही है. इस हफ़्ते अगर कुछ ना कर रहे हों तो बेवकूफियां कर लें.

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Web Title: फिल्म समीक्षा: अगर कुछ ना कर रहे हों तो जरूर कर लें बेवकूफियां
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