फिल्म समीक्षा: सस्ती बॉलीवुड स्टाइल लाउड कॉमेडी से ज़्यादा कुछ नहीं है 'गैंग ऑफ घोस्ट्स'

By: | Last Updated: Friday, 21 March 2014 8:54 AM
फिल्म समीक्षा: सस्ती बॉलीवुड स्टाइल लाउड कॉमेडी से ज़्यादा कुछ नहीं है ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’

रेटिंग:  ढ़ाई स्टार

 

इस हफ़्ते भूतों वाली दो फिल्में रिलीज़ हुई हैं. रागिनी एमएमएस 2 में भूत डराता है, लेकिन गैंग ऑफ घोस्ट्स् में भूतों का पूरा गैंग है जो कॉमेडी करता है. गैंग ऑफ़ घोस्ट्स 2012 में रिलीज़ हुई एक बेहद चर्चित और सफल बंगाली फिल्म भूतेर भबिष्यत की रीमेक है. भूतेर भबिष्यत आज के बदलते समय और खत्म होते मूल्यों पर बेहतरीन व्यंग्य थी. लेकिन सतीश कौशिक निर्देशित गैंग ऑफ घोस्ट्स् एक सस्ती बॉलीवुड स्टाइल लाउड कॉमेडी से ज़्यादा कुछ नहीं बन पाई है.

 

फिल्म की कहानी है मुंबई में एक पुराने वीरान पड़े बंगले की है. इस बंगले में अलग-अलग दौर के कई भूतों का निवास है. इसमें एक ज़मींदार है, ईस्ट इंडिया कंपनी का एक अफ़सर, रॉकस्टार, पुरानी फिल्म हीरोइन, एक बंगाली बुद्धिजीवी, एक ब्रिगेडियर का भूत है. इस बंगले पर एक बिल्डर की नज़र है. वो इस बंगले को तोड़कर एक नया शॉपिंग मॉल बनवाना चाहता है. जब नए ज़माने में भूतों को बेघर होने का डर सताता है तो क्या होता है, फिल्म गैंग ऑफ घोस्ट्स् में यही दिखाया गया है.

 

फिल्म में कहानी अनोखी है. हालांकि कई सीन हूबहू बंगाली फिल्म से उठाए गए है मगर कई जगहों पर ये फिल्म वाकई हंसाती है. फिल्म में बंगाली भूत बने हुए सोरभ शुक्ला ने सबसे बेहतरीन एक्टिंग की है. फिल्म एक्ट्रेस के भूत के किरदार में माही गिल ने भी बहुत कमाल का काम किया है. लेकिन अनुपम खेर, जैकी श्रॉफ, असरानी अपने पुराने रोल्स की नकल करते नज़र आते हैं. फिल्म के हीरो शरमन जोशी है जिन्होंने ईमानदारी से अपना रोल निभाने की कोशिश की है. फिल्म में प्रियंका चोपड़ा की बहन मीरा चोपड़ा भी हैं. वो काफ़ी ग्लैमरस लगी है, लेकिन करने के लिए इस फिल्म में ज़्यादा कुछ था नहीं.

 

फिल्म में हंसाने के लिए बार-बार कॉमेडी सीन्स भरने की कोशिश की गई है और यही सीन्स फिल्म को कमज़ोर बनाते हैं. फिल्म के स्पेशल इफेक्ट्स बचकाने हैं और फिल्म का लुक भी बहुत सस्ता सा लगता है. सतीश कौशिक का निर्देशन 90 के दशक में बनने वाली फिल्मों की याद दिलाता है. आज की फिल्मों का लुक और तकनीक काफी आगे निकल चुका है. ये फिल्म पुराने समय की लगती है.

 

अगर गैंग ऑफ घोस्ट्स् को एक व्यंग्य के तौर पर ही रखा जाता तो ये फिल्म कहीं ज़्यादा असरदार हो सकती थी. लेकिन बॉलीवुड फॉर्मूलों के तड़के के बीच इस फिल्म का सही संदेश और मनोरंजन खो गया है. फिर भी एक नए सब्जेक्ट के लिए ये फिल्म देखी जा सकती है.

 

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