ब्लॉग: आखिर देश में तीसरे मोर्चे के लिए क्या समीकरण हैं?

By: | Last Updated: Thursday, 13 February 2014 5:22 AM
ब्लॉग: आखिर देश में तीसरे मोर्चे के लिए क्या समीकरण हैं?

नई दिल्ली: आज कल देश में तीसरे मोर्चे की चर्चा है. जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव से लेकर सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव आजकल तीसरे मोर्चे की बात कर रहे हैं. बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी भी आजकल अपनी रैलियों में तीसरे मोर्चे की बात करते हैं. नरेंद्र मोदी कहते हैं कि थर्ड फ्रंट देश को थर्ड ग्रेड का बना देगा. जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि अगर देश में तीसरे मोर्चे की सरकार बनी तो प्रदेश और देश का विकास और तेजी से होगा. लेकिन मोदी और अखिलेश की बातों में कितनी सच्चाई है?  आखिर देश में तीसरे मोर्चे के लिए क्या समीकरण हैं ?

 

तीसरा मोर्चा यानी की देश के तमाम क्षेत्रिय राजनीतिक दलों और कुछ राष्ट्रीय दलों का चुनावी गठजोड़. फिलहाल तीसरे मोर्चे का जो स्वरूप सामने आ रहा है उसमें कुल 11 छोड़े बड़े राजनीतिक दल शामिल हैं. जिसमें से कुछ दल ऐसे भी हैं जिनकी किसी ना किसी राज्य में सरकारें हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड, उत्तर प्रदेश में सत्तासीन मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता की एआईडीएमके भी इसमें शामिल हैं सीपीआई और सीपीएस जैसी लेफ्ट की पार्टियां भी इसमें शामिल हैं. जबकि ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल के भी इसमें शामिल होने की खबर हैं.

 

लेकिन सवाल उठता है कि अगले चुनाव में तीसरे मोर्चे की क्या भूमिका होगी ? वर्तमान में जो तीसरे मोर्चे का स्वरूप है उसके मुताबिक साल 2009 के लोकसभा चुनाव में तीसरे मोर्चे को 93 सीटें मिलीं थी. और फिलहाल ऐसा कोई भी राजनीतिक समीकरण बनता नहीं दिख रहा है जिससे तीसरा मोर्चा केंद्र में सरकार बना पाए. हां तीसरा मोर्चा यूपीए और एनडीए का खेल जरूर बिगाड़ सकता है क्योंकि 272 के जादुई आकड़े तक एनडीए भी पंहुचती नहीं दिख रही है और यूपीए तो इस आंकड़े से काफी पीछे दिख रही है. ऐसे में संभव है कि तीसरा मोर्चा हर बार की तरह इस बार भी चुनाव के बाद टूट जाए और कुछ दल यूपीए या एनडीए में शामिल  हो जाएं. जैसा की हर बार चुनावों के बाद होता है.

 

इस बार तीसरे मोर्चे में जो राजनीतिक पार्टियां शामिल हैं उनमें से ज्यादातर के हालात उनके गृह प्रदेशों में ही ठीक नहीं हैं. बिहार में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन के टूटने के बाद जनता का विश्वास जेडीयू पर से कम हुआ है. वहां गठबंधन टूटने का सीधा फायदा बीजेपी को मिलता दिख रहा है. तमाम सर्वे भी बता रहे हैं कि बिहार में जेडीयू की हालत बेहद ही खराब है. ऐसा ही कुछ यूपी में भी है. यूपी की समाजवादी सरकार के प्रति भी लोगों में गुस्सा है. और यह गुस्सा चुनाव परिणामों में भी देखने को मिल सकता है. समाजवादी पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में अगर दहाई के अंक में भी सिमट जाए तो कोई आश्चर्य नहीं है.

 

तीसरे मोर्चे के लिए गठजोड़ में जुटी लेफ्ट की पार्टियों की भी हालत ठीक नहीं है. 32 सालों के लंबे शासन के बाद उन्हें बंगाल की सत्ता से बेदखल होना पड़ा. हालांकि पश्चिम बंगाल के  2011 के विधानसभा चुनाव में लेफ्ट को 30 फीसदी वोट मिले थे. जो अच्छा खासा आंकड़ा है. लेकिन बंगाल में ममता दिन प्रतिदिन और मजबूत होती जा रहीं हैं. जिसका प्रमाण पंचायत चुनावों और निकाय चुनावों में भी देखने को मिला है. ऐसे में लेफ्ट बंगाल में हाशिए पर जा रहा है. सीपीआई और सीपीएम के पास फिलहाल लोकसभा की कुल 16 सीटें हैं जो फिलहाल बढ़ती नहीं दिख रही हैं.

 

आम आदमी पार्टी के आगमन से पूरी संभावना है कि क्षेत्रिय दलों को नुकसान होगा. बीजेपी को कोई खास नुकसान तो नहीं होगा लेकिन कांग्रेस और क्षेत्रिय दलों को बड़ा झटका लग सकता है. आम आदमी पार्टी भले ही ज्यादा सीटें ना जीते लेकिन उत्तर भारत के कुछ राज्यों और दक्षिण भारत में स्थापित राजनीतिक दलों के वोट काट सकती है. जो निर्णायक हो सकता है.

 

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर तीसरे मोर्चे की तमाम कोशिशों के बाद भी जनता तीसरे मोर्चे पर विश्वास क्यों नहीं कर पाती है. अगर हम इसका उत्तर खोजने की कोशिश करें तो पता चलता है कि तीसरे मोर्चे की उतपत्ति ही कुछ राजनीतिक दलों के स्वार्थ से होती है. समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव कई बार खुद को प्रधानमंत्री बनाने की अपील कर चुके हैं. वो अपने कार्यकर्ताओं से कई बार इस बारे में कह चुके हैं. बसपा सुप्रीमों मायावती हमेशा एक दलित की बेटी को प्रधानमंत्री बनाने की बात कह चुकी हैं. नीतीश कुमार में भी पीएम बनने की लालसा है. हाल ही में सीपीआई और एआईडीएमके में चुनावी गठजोड़ हुआ तो लेफ्ट के नेताओँ ने जयललिता को तीसरे मोर्चे का पीएम उम्मीदवार बता दिया.

 

यानी की तीसरे मोर्चे में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तो बहुत हैं लेकिन जनता भी जानती है कि इनके पास  272 का जादुई बहुमत तो होगा नहीं. ऐसे में इनको वोट देने से क्या फायदा. अगर हम इनको वोट देंगे तो ये पार्टियां केंद्र में जाकर कांग्रेस या बीजेपी से सौदा ही करेंगी. इसलिए सीधे सीधे बीजेपी या कांग्रेस को ही क्यों ना वोट दें.

 

एक और सबसे अहम बात, जैसा कि कांग्रेस के संभावित पीएम उम्मीदवार राहुल गांधी अपनी रैलियों में देश के विकास की बात करते हैं. भविष्य की योजनाओं की बात करते हैं. नरेंद्र मोदी भी अपनी रैलियों में देश के विकास की बात करते हैं. वो भविष्य की योजनाओं का खाका रखते हैं. अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ बात करती है. लेकिन तीसरे मोर्चे में शामिल लगभग सभी राजनीतिक दल या तो अपने नेता को सिर्फ प्रधानमंत्री बनाने की बात करते हैं या देश को सांप्रदायिक ताकतों खास तौर पर बीजेपी को रोकने की बात करते हैं. इन पार्टियों का कोई विकास मॉडल नहीं होता. तीसरे मोर्चे के दल राज्यों में जाति और धर्म के आधार पर सीटों के बंटवारे को लेकर ही उतरते हैं. इसलिए उनका ध्यान भी सिर्फ जाति-धर्म के आधार पर अपने अपने राज्यों में ज्यादा से ज्यादा सींटे जीतने पर होता है.

 

इतिहास भी गवाह रहा है कि तीसरे मोर्चे देश में कभी भी स्थायी नेतृत्व नहीं दिया है. शायद यही कारण है कि देश की जनता तीसरे मोर्चे पर ना तो विश्वास कर पाती है और ना ही तीसरे मोर्चे को स्वीकार ही कर पाती है.

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