ब्लॉग: क्या केजरीवाल पर से जनता का विश्वास टूट रहा है?

By: | Last Updated: Tuesday, 28 January 2014 3:21 PM

नई दिल्ली: 27 दिसंबर दिन शुक्रवार स्वतंत्र भारत के इतिहास का वो दिन जिस दिन हमने और आपने इतिहास बनते देखा. गले में मफलर लगाए एक ‘आम इंसान’ को दिल्ली की जनता ने दिल्ली के सियासत की बागडोर सौंप दी. उस दिन जब मैं पटेल नगर मेट्रो स्टेशन पर उतरा तब मुझे स्टेशन के ठीक बाहर मूंगफली बेचता एक दुकानदार नज़र आया जिसके सर पर आम आदमी पार्टी की टोपी नज़र आई. स्टेशन पर भी बहुत लोग मिले जो रामलीला मैदान में केजरीवाल के शपथ ग्रहण समारोह से लौट रहे थे. अचानक उस दिन मुझे दिल्ली बदली-बदली नज़र आई. दिल्ली की फिजा में कहीं स्वराज की मिली-जुली खुशबू महसूस हुई.

आज अरविंद केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री बने एक महीने से ज्यादा हो गए. आखिर क्या बदला दिल्ली में पिछले 1 महीने में?  क्या लोगों की समस्याएं दूर हुईं? और सबसे अहम बात क्या दिल्ली की जनता का विश्वास अब भी केजरीवाल पर उतना ही है जितना चुनाव के पहले था? इन सवालों का जवाब लोग अपनी-अपनी विचारधाराओं और अनुभवों के अनुसार दे सकते हैं.

 

अगर एबीपी न्यूज़ और नीलसन के सर्वे की बात की जाए तो जो परिणाम हमारे सामने आए हैं उनके अनुसार पिछले एक महीने में केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को थोड़ा-बहुत नुकसान तो हुआ ही है. और इसमें केजरीवाल अपवाद नहीं हैं. जब भी कोई सरकार बनती है तो सरकार बनने से पहले जनता की हजारों अपेक्षाएं होती हैं और कोई भी सरकार जनता की हर अपेक्षा को पूरा नहीं कर सकती है. सरकार बनने के बाद समाज में हमेशा एक समूह उभरता है जो नई सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं होता है. केजरीवाल के साथ भी यही हो रहा है. जिस दिल्ली में केजरीवाल 1 महीने पहले पीएम रेस में नंबर वन थे उसी दिल्ली में अब वो नंबर दो हो गए हैं.

 

आज दिल्ली में करीब 16 फीसदी लोग ऐसे भी हैं जो केजरीवाल के कामकाज को बहुत बुरा मानते हैं. जबकि 28 फीसदी लोग औसत मानते हैं. हालांकि अब भी 55 फीसदी लोग ऐसे हैं जो केजरीवाल के कामकाज से खुश हैं. लेकिन यह आंकड़ा करीब 20 दिन पहले 75 फीसदी के आस-पास था. आखिर पिछले 20-25 दिनों में ऐसा क्या हुआ है जो समाज के एक बड़े तबके ने उनसे कटना शुरू कर दिया है, हालांकि एक बड़े तबके का विश्वास आज भी पूरे ज़ोश के साथ बरकरार है.

केजरीवाल के पिछले 1 महीने के कामकाज को देखें तो हां केजरीवाल सरकार ने बहुत सारे काम भी किए हैं. जो सरकार बनने के सिर्फ 1 महीने में करना एक बड़ी बात है. केजरीवाल सरकार ने सरकार बनने के 10 दिनों के भीतर ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ते हुए एंटी करप्शन हेल्प लाइन बनाया. वादे के अनुसार बिजली के बिलों में कटौती की. बिजली कंपनियों का ऑडिट कराने का फैसला किया. दिल्ली के लोगों के लिए प्रति दिन 666 लीटर पानी मुफ्त किया. दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में स्कूल खोलने की पहल की. ये वो काम हैं जो अरविंद केजरीवाल की सरकार ने एक महीने के अंदर किया. यानी की माना जा सकता है कि शुरुआत अच्छी है.

 

क्यों टूट रहा है भरम?

 

लेकिन अब सवाल ये उठता है कि सिर्फ एक महीने में इतना सब कुछ करने के बाद भी केजरीवाल से जनता का भरम क्यों टूट रहा है?

 

केजरीवाल सरकार के प्रति कम हो रहे लोगों के विश्वास की वजह केजरीवाल सरकार का कामकाज नहीं बल्कि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की पिछले दिनों की गतिविधियां वजह रही हैं.

 

केजरीवाल ने जनता दरबार का असफल प्रयोग शुरू किया. जाहिर सी बात है केजरीवाल दिल्ली के हर आम नागरिक से नहीं मिल सकते हैं. तो जो लोग नहीं मिल पाएंगे वो विरोध तो करेंगे ही. और अगर केजरीवाल सुरक्षा नहीं लेंगे तो जनता की भारी भीड़ को केजरीवाल की टीम कैसे रोकेगी और मैनेज करेगी. इस जनता दरबार को लेकर भी लोगों में थोड़ी नाराजगी आई.

 

अरविंद केजरीवाल सरकार में कानून मंत्री सोमनाथ भारती प्रकरण ने केजरीवाल सरकार की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. एबीपी के सर्वे ने भी इसके संकेत दिए हैं. दिल्ली के 55 फीसदी लोगों का कहना है कि सोमनाथ प्रकरण से आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सरकार की छवि खराब हुई है.

 

सोमनाथ प्रकरण और एक विदेशी महिला से गैंगरेप के बाद आरोप पुलिस पर मढ़ने की कोशिश ने भी केजरीवाल की छवि को खराब की. केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस के 5 अफसरों के तबादले के लिए अनशन शुरू कर दिया. इस धरने के बाद लोगों की नजर में केजरीवाल की छवि उस छोटे बालक की तरह हो गई जो अपनी मांगे मनवाने के लिए जमीन पर लोटने लगता है.

 

इसी अनशन के दौरान केजरीवाल के मंत्री सोमनाथ ने बीजेपी के नेताओं पर थूकने की बात कर दी. राजनीति में शूचिता की बात करने वाली आम आदमी पार्टी का यह रूप पूरे देश को रास नहीं आया.

 

इसी दौरान पार्टी के नेता कुमार विश्वास के कुछ पुराने वीडियो भी सामने आए. जिस पर पार्टी को जवाब देते नहीं बना.

 

अनशन के ही दौरान ही केजरीवाल ने बात ही बात में खुद को अराजकतावादी कह दिया.  जिसकी काफी तीव्र आलोचना हुई.

 

बिन्नी बड़ा नुकसान कर गए!

 

एक कहावत है घर का भेदी लंका ढ़ाहे. विपक्ष पहले दिन से ही केजरीवाल सरकार पर आरोप लगाता रहा है. लेकिन केजरीवाल सरकार उन्हें हल्के में टाल देती थी. लेकिन आम आदमी पार्टी के ही विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने पार्टी के लिए तूफान खड़ा कर दिया. बिन्नी के आरोपों का टीम केजरीवाल के पास कोई जवाब नहीं था. बिन्नी के आरोपों ने पार्टी को असहज कर दिया. आम आदमी के चाणक्य योगेंद्र यादव भी बिन्नी पर अपने पुराने बयानों को लेकर उलझे नजर आए. पार्टी ने बिन्नी को तो निकाल दिया लेकिन बिन्नी पार्टी का बड़ा नुकसान कर गए.

 

सरकार बनने से पहले ही केजरीवाल ने कुछ ऐसे वादे भी किए जो राजनीतिक थे. कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वालों को स्थाई करने का वादा किया. अब यह वादा ही उनके गले की फांस बन गया है. केजरीवाल की राह पर ही चलते हुए अस्थाई कर्मचारी अब अनशन कर रहे हैं. दिल्ली के सभी अस्थाई कर्मचारियों को स्थाई करना शायद केजरीवाल सरकार के लिए असंभव है. इस हालात में केजरीवाल को जनता के गुस्से से रूबरू तो होना ही पड़ेगा.

 

फिलहाल केजरीवाल की छवि को थोड़ा नुकसान तो जरूर हुआ है. लेकिन सिर्फ एक महीने में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा. लेकिन इतना जरूर है कि केजरीवाल की सरकार और आम आदमी पार्टी उस भारतीय क्रिकेट टीम की तरह हो गई जिसे जनता तुरंत सर पर चढ़ा ले रही है और तुरंत उतार दे रही हैं. लेकिन जनता की ऐसी प्रतिक्रिया ना तो आम आदमी पार्टी के लिए अच्छा है और ना ही देश के लोकतंत्र के लिए.

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