ब्लॉग: क्या है यूपी और बिहार में मोदी ‘लहर’ की वजह?

By: | Last Updated: Monday, 27 January 2014 3:23 PM

लोकसभा चुनावों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. अगले चंद महीनों में देश नया प्रधानमंत्री चुनने में भिड़ जाएगा. फिलहाल देश के सामने प्रधानमंत्री पद के जो दो बड़े उम्मीदवार हैं उनमें कांग्रेस के राहुल गांधी की तुलना में बीजेपी के नरेंद्र मोदी काफी आगे चल रहे हैं. न्यूज़ चैनलों के हालिया सर्वे के मुताबिक देश में मोदी की लहर है. पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण हर तरफ नमो-नमो का जाप चल रहा है.

 

एबीपी न्यूज़ और नीलसन के सर्वे के अनुसार यदि देश में आज चुनाव हो तो एनडीए को 543 में से 226 सीटें मिल सकती हैं. वहीं कांग्रेस सिर्फ 101 सीटों पर सिमटती नज़र आ रही है. सीएसडीएस के सर्वे में भी बीजेपी को बढ़त मिलती दिख रही है.

 

बीजेपी की इस बढ़त में सबसे बड़ा योगदान हिंदी हार्ट लैंड के दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार का है. एबीपी न्यूज-नीलसन के सर्वे के मुताबिक 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में मोदी की धूम है. बीजेपी यहां 80 में से 35 सीटें जीत सकती है. जबकि 40 लोकसभा सीटों वाले बिहार में बीजेपी को सबसे ज्यादा 24 सीटें मिल सकती हैं.

 

अब सवाल ये है कि जातिगत राजनीति का केंद्र रहे उत्तर प्रदेश में जातिगत राजनीति के दो बड़े दिग्गजों के होने के बावजूद बिना किसी मजबूत क्षेत्रिय संगठन के बीजेपी को इतनी बढ़त क्यों मिलती दिख रही है?

 

बीजेपी को बढ़त क्यों?

 

उत्तर प्रदेश में साल 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. सभी पुराने रिकार्डों को तोड़ते हुए समाजवादी पार्टी ने 403 विधानसभा सीटों वाले यूपी में 226 सीटें जीती थी. समाजवादी पार्टी को इस चुनाव में कुल पड़े वोटों में 29.91 प्रतिशत वोट मिला था. दूसरे नंबर पर मायावती की बहुजन समाज पार्टी रही जिसे 80 सीटें मिली और कुल पड़े वोटों का 25.91 प्रतिशत वोट मिला. वहीं दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी की हालत हर बार की तरह खराब ही रही. कांग्रेस को सिर्फ 37 सीटों और 13.96 प्रतिशत वोट शेयर से ही संतोष करना पड़ा था. जबकि बीजेपी को 48 सीटें मिलीं और 15 प्रतिशत वोट शेयर मिला.

 

यानी की आंकड़े साफ जाहिर कर रहे हैं कि दोनों ही राष्ट्रीय दलों की उत्तर प्रदेश में हालत साल 2012 तक नाजुक थी. अब पिछले 2 सालों में आखिर ऐसा क्या हो गया कि वही जनता जिसने समाजवादी पार्टी को 29.91 प्रतिशत और बहुजन समाज पार्टी को 28.91 प्रतिशत वोट शेयर दिया, वही जनता इन दोनों ही पार्टियों को सिरे से नकारते हुए करीब एक दशक से सुस्त पड़ी बीजेपी की तरफ रूख करती दिख रही है.

 

उत्तर प्रदेश में पिछले दो दशकों से ऐसा देखा गया है कि क्षेत्रिय पार्टियों के उभार के बाद से ही समान्यत: जनता एसपी और बीएसपी में ही झूलती रही है. जनता एसपी से नाराज होकर बीएसपी में जाती थी और बीएसपी से नाराज होकर फिर एसपी में. यही चक्र चलता रहता था और मयावती और मुलायम बारी-बारी से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होते रहते थे. लेकिन इस बार पूर्वी यूपी से लेकर पश्चिमी यूपी तक बदलाव की गूंज महसूस की जा सकती है.

 

वजह साफ है कि सत्ता रूढ़ पार्टी एसपी और बीएसपी से लोग काफी नाराज हैं. साल 2012 में जब मायावती सत्ता से बेदखल हुईं थी तब सबसे बड़ी वजह यही थी की वो आम जनता से कट गईं थी. उन्होंने प्रशासन की बागडोर पूरी तरह से नौकरशाहों के हाथ में दे दी थी. फिर भी दलितों का भरोसा मायावती पर कायम रहा और दलितों ने उन्हें वोट किया और किसी तरह मायावती पार्टी की इज्जत बचाने में कामयाब हो पाईं पार्टी को सीटें तो ज्यादा नहीं मिली लेकिन वोट प्रतिशत ठीक-ठाक मिल गया.

 

अखिलेश को लेकर टूटा भरम

 

जनता हर बार की तरह प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी एसपी को भारी बहुमत से सत्ता में ले आई. इसकी सबसे बड़ी बजह रही है चुनाव से ठीक पहले मुलायम पुत्र अखिलेश ने प्रदेश में घूम-घूमकर उम्मीद की साईकिल चलाई और नए से लेकर पुराने सभी समाजवादियों को जोड़ा. अखिलेश को युवा समझकर विकास की उम्मीद लगाए शहरी क्षेत्र के युवाओं ने भी इस चुनाव में समाजवादी पार्टी को वोट दिया. नतीजा प्रदेश में एसपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

 

लेकिन सरकार बने 2 साल भी नहीं बीते की अखिलेश से जुड़ा भरम टूट गया. भले ही राज्य में एसपी की सरकार हो लेकिन अभी चुनाव हो तो प्रदेश में एसपी तीसरे नंबर पर जा सकती है. वजह साफ है लचर कानून व्यवस्था, विकास के खोखले दावे, प्रदेश में बढ़ता अपराधिकरण और सरकार की प्रशासनिक असफलता. और हर बार की तरह एसपी राज में कुछ कथित एसपीईयों की गुंडागर्दी.

 

प्रदेश की जनता अब एसपी और बीएसपी दोनों ही पार्टियों की कार्यप्रणाली से ऊब चुकी है. ऐसे हालात में बीजेपी ने मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया. उत्तर प्रदेश ज्यादातर हिंदुओं को 2002 के गुजरात दंगों से लेना देना नहीं है और उनके लिए ये दंगे भी देश के दूसरे अन्य दंगों की तरह ही है. हां ये जरूर है कि प्रदेश के मुस्लिम मतदाता इन दंगों को ज्यादा गंभीरता से लेते हैं. प्रदेश में 18 फीसदी मुसलमान हैं जो एसपी, कांग्रेस और बीएसपी में बंटे हुए हैं. जबकि 80 फीसदी हिंदुओं की एक बड़ी आबादी के बीच मोदी विकास के प्रतीक हैं. उनके जेहन में उस गुजरात का विकास मॉडल रेखांकिंत है जिसे उन्होंने अपनी आंखों से नहीं देखा है. सिर्फ मीडिया और बीजेपी के बड़े – बड़े नेताओं के मुख से ही सुना है.

 

जिस प्रदेश में पिछले दो दशकों से सड़कों की हालत ठीक ना हो सिवाय प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के, जहां बिजली सिर्फ वहीं आती हो जहां से मुलायम सिंह के परिवार के लोग सांसद हों. जहां एसपी के राज में ही सबसे ज्यादा एसपी नेताओं की  हत्या होती हो वहां टेलीवीजन में दिखता मोदी का विकास मॉडल और सुशासन लोगों का ध्यान आकर्षित करता है.

 

राजनाथ, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह की कर्म भूमि होने के बावजूद प्रदेश में बीजेपी का कोई मजबूत संगठन नहीं है लेकिन इस बार मोदी का जादू रंग ला रहा है. इस बार मोदी को सिर्फ उच्च जातियों के ही वोट नहीं मिलेंगे, पूरी संभावना है कि इस बार एसपी का बेस वोट यादव और बीएसपी का बेस वोट दलित भी बीजेपी की तरफ रुख करे. इन दोनों ही पार्टियों के पढ़े लिखे मतदाता बीजेपी की तरफ रुख कर सकते हैं.

 

बिहार में नमो-नमो क्यों?

 

जहां तक बिहार की बात है तो लोग नीतीश सरकार के कामकाज से नाराज नहीं हैं लेकिन लोगों ने नीतीश को नहीं बल्कि जेडीयू और बीजेपी के संयुक्त गठबंधन को बहुमत दिया था. लोगों को पता था कि जेडीयू ने जिसके साथ गठबंधन किया है उस पार्टी में बाबरी विध्यवंस के समय रथ यात्रा करने वाले लालकृष्ण आडवाणी और हमेशा विरोधियों के निशाने पर रहे मोदी भी हैं. फिर भी लोगों ने नीतीश सरकार को वोट दिया. नीतीश ने जब सेक्युलरवाद का नारा बुलंद करके बीजेपी से रिश्ता खत्म किया तो लोगों ने खुद को ठगा महसूस किया. लोगों को लगा कि नीतीश भी कांग्रेस की तरह दोहरी राजनीति कर रहे हैं.

लोगों को पता है कि यदि उन्होंने नीतीश की पार्टी जेडीयू को वोट दे भी दिया तो वो अकेले नीतीश क्या कर लेंगे. नीतीश राज्य में ठीक हैं. मोदी के हिंदुत्ववादी और विकासवादी चेहरे ने लोगों को नीतीश से इतर सोचने पर मजबूर कर दिया.

 

कांग्रेस, एसपी, बीएसपी, जेडीयू चाहे कुछ भी कहें, लेकिन मोदी प्रभाव ने यूपी और बिहार की जनता को बीजेपी के बारे में सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया है.

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