ब्लॉग: जब राहुल मोदी से डरते हैं तो फिर क्यों दानवीर बनते हैं?

By: | Last Updated: Saturday, 18 January 2014 8:43 AM

नई दिल्ली: राहुल गांधी आगे की ओर देख रहें हैं लेकिन वो पीछे की ओर देखना नहीं चाहते हैं . यूपीए सरकार पर भष्ट्राचार का साया मंडरा रहा है उसपर वो बात नहीं करना चाहते हैं ऐसे में कांग्रेस पार्टी कैसे आगे बढ़ेगी. देश की जनता राहुल गांधी से भ्रष्ट्राचार पर क्या कार्रवाई हुई है उसका हिसाब मांग रही है, महंगाई पर क्यों काबू नहीं किया गया है इसका हिसाब मांग रही है, देश का विकास रूक गया है इस पर हिसाब मांग रही है लेकिन  राहुल गांधी दिमागी बीमारी की इलाज की जगह पेट का इलाज करने में लगे हुए हैं.

बात कांग्रेस पार्टी की साख की हो रही है जबतक साख पर से साया नहीं उठेगा तो सत्ता कहां से मिलेगी. राहुल गांधी की नजर लोकसभा चुनाव के अर्थमेटिक्स पर है लेकिन जनता में कांग्रेस पार्टी को लेकर क्या केमिस्ट्री चल रही है शायद इसका अंदाजा नहीं है, अगर अंदाजा है तो कैसे और किस पर कार्रवाई करेंगे. राहुल गांधी की कथनी और करनी में काफी फर्क है जब जोश में भाषण देंगे तो कांग्रेसी कार्यकर्ता ताली तो बजाएंगे हीं लेकिन उनके भाषण का जनता पर क्या असर पड़ता है वो ज्यादा अहम है.

 

राहुल को दानवीर नहीं सत्यवादी बनना होगा

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां पर दान का पिटारा खोलने से नहीं बल्कि जनता के अधिकार और जनता में साख बनाने की जरूरत है. वो दिन लद गये जब राजा प्रजा से कहते थे मैंने वो किया ये किया. शायद राहुल आज भी राजा और फकीर की मानसिकता से ग्रसित हैं. राहुल के भाषण में यही दिखा कांग्रेस पार्टी या सरकार ने ये दिया, सरकार ने वो दिया, सरकार ये देगी और सरकार वो करेगी. ऐसी भाषा एक लोकतांत्रिक सरकार की नहीं हो सकती है भले यूपीए सरकार ने वाकई अच्छे काम किए. जनता को कई अधिकार दिए लेकिन राहुल की बोल में ये खोट दिख रहा है. वैसे राहुल ने लोकसभा चुनाव के पहले जनता को लुभावने की भरपूर कोशिश की है और उनका अधिकार क्षेत्र भी है.
 

भाषण कमोबेश दमदार और जानदार था. मंच से राहुल गांधी ने पीएम से गुजारिश की है कि 9 गैस सिलेंडर के कोटे को बढ़ाकर 12 कर दिया जाए . राहुल की मांग समझें या आदेश, कैबिनेट में इस पर चर्चा शुरू हो गई है शायद जल्द ही राहुल के वायदे पर सरकार की मुहर लग सकती है लेकिन सवाल ये उठता है कि सरकार दर्द देकर दवा क्यों देना चाहती है खैर इससे जनता को राहत मिलेगी लेकिन सवाल ये उठता है कि कांग्रेस पार्टी को इससे लोकसभा चुनाव में क्या फायदा होगा. यही नहीं राहुल गांधी ने घोषणा की है कि लोअर मिडिल क्लास को छत दंगे, स्वास्थ्य सेवा, महिलाओं को आगे बढ़ाएंगे और भष्ट्राचार पर काबू करने के लिए और 6 बिल लाएंगे.

दरअसल यही होता आ रहा है कि जब सरकार के खिलाफ नाराजगी रहती है तो जबतक सरकार नहीं जाती है तो लोगों का गुस्सा शांत नहीं होता है भले जनता के लिए कांग्रेस पार्टी पिटारा क्यों नहीं खोल दे. वैसे भी देश की राजनीति काफी बदल गई है एक तरफ कांग्रेस पर बीजेपी का हमला, आम आदमी पार्टी के राजनीति अखाड़े में आने से कुश्ती की हार-जीत के नियम बदल गये हैं और कांग्रेस पार्टी  से कई सहयोगी पार्टियों के नाता टूटने से यूपीए गठबंधन कमजोर हो गया है .

 

राहुल गांधी मोदी से क्यों डरते हैं?

एक तरफ राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी और अरविंद केजरीवाल पर ताबड़तोड़ हमला करते हैं लेकिन मोदी की ललकार के बाद भी वो पीएम क्यों नहीं बनना चाहते हैं. दूसरी तरफ वो कहते हैं कि सत्ता जहर है फिर पार्टी के उपाध्य़क्ष बन जाते हैं . तीसरी बड़ी बात वो कहते हैं मैं पार्टी का सिपाही हूं जो भी जिम्मेदारी दी जाएगी तो फिर क्यों पीएम पद से भाग रहें हैं. उनकी दलील है कि संविधान में पीएम को चुनने का अधिकार सांसद को है यानि अगर कांग्रेस जीतती है चुनाव के बाद ही पीएम उम्मीदवार तय होगा लेकिन राहुल और सोनिया के इस तर्क में दम नहीं दिख रहा है.

 

इंदिरा गांधी 42 साल में कांग्रेस की अध्यक्ष बन गई और 49 साल में देश के पीएम वहीं राजीव गांधी बिना लोकसभा का चुनाव लड़े ही 40 साल में देश के पीएम बन गये. इंदिरा गांधी को तो सिर्फ जवाहर लाल नेहरू से राजनीति सीख मिली थी जबकि राजीव गांधी को नाना और मां से राजनीति के गुर सीखने को मिले थे ये अलग बात है कि राजीव गांधी को राजनीति में रूचि नहीं थी लेकिन मजबूरी बस उन्हें पीएम बनना पड़ा ये अलग बात है कि राजीव गांधी पीएम के तौर पर हिट तो नहीं हुए लेकिन कंप्यूटर और आईटी क्षेत्र में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है.

 

जहां राहुल गांधी की बात है वो तो सबसे ज्यादा राजनीति गलियारे में रहें हैं क्योंकि इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया से काफी सीखने का मौका मिला है ये अलग बात है कि वो राजनीति की एबीसीडी कितना सीखे . करीब 10 साल से वों सांसद हैं और 43 साल के होने के बाद क्यों पीएम पद से कतरा रहें हैं. क्या गठबंधन की मजबूरी की वजह से अपने दायित्व से भागना चाहते हैं या मां के मॉडल पर चलना चाहते हैं या पीएम बनना ही नहीं चाहते हैं.

राहुल गांधी ये सोच सकते हैं पीएम पद के लिए पहले डिजर्व करो उसके पाद डिजायर करो लेकिन इतने सुनहरे मौके को छोड़ना कहीं इस पद से तो बेरूखी की बात तो नहीं है. एक बात ये भी चर्चा में है कि कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी को मोदी के खिलाफ उतार कर किरकिरी नहीं करना चाहती है. कांग्रेस को लगता है कि इस बार कांग्रेस पार्टी की जीत नहीं होने वाली है ऐसे में हार का ठीकरा राहुल पर क्यों फोड़ा जाए.

 

इस दलील में भी दम हो सकता है लेकिन इसके भी दो पहलू हैं. राहुल गांधी यदि हार के ठप्पा से भागना चाहते हैं तो भी सवाल है कि बिना हार के स्वाद चखे हुए मंजे हुए नेता कैसे बनेंगे वहीं दूसरा सवाल ये है कांग्रेस कार्यकर्ताओं में कैसे जोश भरेंगे जिसके नेता जीत के नेता बनना चाहते हैं लेकिन हार के नेता नहीं बनना चाहते हैं..राहुल गांधी को ऐसी पार्टी मिली है जहां पर कोई विरोध नहीं यानि एकछत्र राज है जबकि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को भी पार्टी से जबर्दस्त विरोध और विद्रोह का भी सामना करना पड़ा था तो फिर क्यों पीएम पद से भाग रहें हैं.

 

क्या सोनिया की राह पर राहुल हैं?

क्या राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी के पद चिन्हों पर चलना चाहते हैं क्योंकि पहले सोनिया गांधी शायद पीएम पद के लिए तैयार हो गई लेकिन जब मौका मिला तो पीएम पद को तौबा कर चुकी हैं. 1998 में एनडीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला भी कुछ ऐसा ही था. जयललिता और विपक्ष की मदद से सोनिया गांधी ने सरकार को गिरा दी. राष्ट्पति के पास सरकार बनाने का दावा भी पेश कर आईं लेकिन जब सरकार बनाने की बारी आयी तो वे बहुमत का समर्थन नहीं जुटा पाईं. अगर वो बहुमत जुटा पाती तो साफ है कि वहीं पीएम बनती .

 

क्या हुआ कि पांच साल बाद उनके रूख में बदलाव हुआ ये राज अभी राज ही बना हुआ है. 2004 में जब कांग्रेस की जीत हुई तो सोनिया ने अपना नाम दरकिनार करके मनमोहन सिंह को पीएम पद के लिए आगे कर दिया इसकी तीन वजह हो सकती है एक शरद पवार ने विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर कांग्रेस से अलग हो गये वहीं बीजेपी ने विदेशी मूल का मु्द्दा उठाकर सोनिया पर ताबड़तोड़ हमला की.  ये वजह हो सकती है कि वो आहत हो गईं हो और प्रधानमंत्री बनने के सपनों को तिलांजलि देने का फैसला कर लिया हो .

तीसरी वजह ये हो सकती है कि पीएम का पद कांटो का ताज है और इसी वजह से सोनिया झमेला में नहीं पड़ना चाहती हों. ये जरूरी नहीं है कि पॉवर और देश को चलाना पीएम पद पर ही बैठकर किया जा सकता है. बिना सिरदर्दी मोल लिए भी रिमोट से कंट्रोल सरकार चलाई जा सकती है जैसा कि उनपर इसी तरह चलाने का आरोप लगता रहा है.  शायद राहुल गांधी भी सोनिया मॉडल पर ही चलने का फैसला किया हो. सवाल ये उठता है क्या राहुल गांधी भी सोनिया गांधी की तरह ही किसी नये मनमोहन को ढूंढ़ कर सरकार चलाने का मन बना लिया हो.

Bollywood News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: ब्लॉग: जब राहुल मोदी से डरते हैं तो फिर क्यों दानवीर बनते हैं?
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
और जाने: ????????? ????? ????
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017