ब्लॉग: मुलायम सिंह राजनीति के 'सातवें मकाम' पर हैं!

By: | Last Updated: Thursday, 30 January 2014 3:15 PM

हमारे दिल में कोई भट्ठी नहीं जल रही है क्या? हम साधु सन्यासी हैं क्या? भट्ठी भड़क रही है मेरे दिल में. कुछ प्रयास कर दो. अखिलेश को जीताकर तो मुख्यमंत्री बना दिया, हमें क्या बनाओगे? ये शब्द समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह के हैं. अब तो आप समझ ही गए होंगे कि मुलायम सिंह अपने कार्यकर्ताओं से क्या कह रहे थे. मुलायम सिंह के अंदर देश का प्रधानमंत्री बनने की आग अभी भी जल रही है. और शायद मुलायम के पास यह आखिरी मौका है कि वो पीएम बनें. यानी की मुलायम सिंह राजनीति के ‘सातवें मकाम’ पर हैं.

 

लेकिन सवाल यह है कि क्या मुलायम सिंह का प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश पूरी हो पाएगी? क्या उन्हें उत्तर प्रदेश का वो जनसमर्थन फिर से मिलेगा जो साल 2012 के विधानसभा चुनावों में मिला था? अगर मुलायम सिंह किसी तरह यूपी में ठीक-ठाक सीटें ले भी आते हैं तो क्या केंद्र में किसी भी बड़ी पार्टी को बहुमत ना मिलने की स्थिति में तीसरे मोर्चे में उनकी क्या भूमिका होगी ?

 

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सबसे बड़ी ताकत यादवों के बाद मुसलमान रहे हैं. सीएसडीएस के मुताबिक साल 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में करीब 45 फीसदी मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी को वोट दिया था. जो अन्य पार्टियों को मिले मुस्लिम वोट से काफी ज्यादा थे. इस बार मुजफ्फरनगर दंगे की वजह से समीकरण बदले-बदले नज़र आ रहे हैं. मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर खुद मुलायम सिंह के बयान और यूपी के गृह सचिव के बयान के बाद मुसलमानों में मुलायम को लेकर जमकर गुस्सा है. खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में तो समाजवादी पार्टी को लेकर काफी रोष है.

 

मुसलमानों की मन:स्थिति को मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी के अन्य नेता भी समझ रहे हैं. शायद यही वजह है कि पिछले दिनों एसपी सरकार ने दो बड़े काम किए. पहला उन्होंने प्रदेशभर में चल रहे मदरसों के मुखियाओं को बुलाया. उसमें मुजफ्फरनगर को लेकर मीडिया रिपोर्टिंग पर भी सवाल उठाया गया. एसपी सरकार ने मुसलमानों के लिए जो अच्छे काम किए हैं उन्हें भी सामने रखा गया. प्रदेश के शहरी विकास मंत्री आजम खां ने भी मदरसा संचालकों और मुस्लिम धर्म गुरूओं से मुलायम को वजीर-ए-आजम बनाने की अपील कर दी.

 

आजम ने कहा कि ‘अगर आपने दिल पर ले लिया और सबने मिलकर चिल्ला लगा दिया तो इंशा अल्लाह मुलायम जी दिल्ली की गद्दी पर होंगे.’

 

धर्म गुरूओं और मदरसा संचालकों के इसी सम्मेलन में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ये भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो सरकारी योजनाओं में अल्पसंख्यकों खास तौर पर मुस्लिम भाइयों को 20 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. जबकि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 18 फीसदी ही है.

 

यूपी के मदरसा संचालकों और मुस्लिम धर्म गुरूओं के साथ एसपी सरकार की यह बैठक साफ इशारा करती है कि मुलायम सिंह अपने प्रमुख वोट बैंक मुसलमान को लेकर कितना चिंतित हैं.

 

एसपी सरकार ने मुसलमानों को फिर से साथ जोड़ने के लिए जो सबसे बड़ा काम किया वो ये कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तीन मुस्लिम विधायकों को सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया गया. यानी की एसपी सरकार ने मुसलमानों में यह संदेश देने की कोशिश की समाजवादी पार्टी ही मुसलमानों की सच्ची हितैषी है.

 

अब दूसरा बड़ा सवाल यह है कि यदि मुलायम सिंह की तमाम कोशिशों के बाद भी मुस्लिम समाज समाजवादी पार्टी से जुड़ा रहता है तो फिर भी क्या एसपी को 2012 के विधानसभा चुनाव की तरह भारी बहुमत मिल पाएगा ?

 

एसपी पर दोहरे नुकसान का साया!

 

ज़मीनी हकीकत की बात की जाए तो एसपी सरकार की छवि हिंदू मतदाताओं में ऐसी सरकार की बनी है जो सिर्फ समाज के एक ही वर्ग का ध्यान रखती है. एसपी सरकार की योजनाए सिर्फ अल्पसंख्यक समाज के लिए ही है. इस बात को और बल दिया बीजेपी के नेताओं ने. मोदी के मंच से ही बीजेपी के नेता ऐसी बात बोलते रहते हैं. मोदी की कानपुर रैली में ही मोदी के बोलने से पहले प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने कहा कि ब्राह्मणों, क्षत्रियों तुम्हारी बेटियों को कन्या विद्या धन नहीं मिलेगा. क्योंकि तुम मुसलमान नहीं हो. दूसरी तरफ मुस्लिम समाज में एसपी सरकार की छवि ऐसी बनी है जिसने मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों के लिए कोई काम नहीं किया. यानी की समाजवादी पार्टी को इस बार दोहरा नुकसान उठाना पड़ सकता है.

 

दूसरी सबसे अहम बात यह कि साल 2012 में भारी बहुमत से जीतकर आई अखिलेश सरकार उम्मीदों की सरकार थी. बीएसपी से नाराज जनता ने विकास को देखते हुए अखिलेश को वोट दिया था. 2012 के चुनावों में एसपी को बहुत से वोट ऐसे मिले जो उनके परंपरागत वोट नहीं थे. लेकिन उम्मीदों पर बनी सरकारों से जनता का भरोसा बहुत जल्दी टूटता है. अखिलेश ने फिर से वही योजनाएं शुरू कीं जो साल 2007 से पहले मुलायम सिंह ने लागू की थीं. बेरोजगारी भत्ता और कन्या विद्याधन जैसी योजनाओं से प्रदेश में जितने लोगों को फायदा हुआ उससे कहीं ज्यादा लोगों में असंतोष ऊपजा. बेरोजगारी भत्ता के लिए रोजगार दफ्तरों में लगने वाली लम्बी-लम्बी लाइनों और उसके  बाद भी सभी को बेरोजगारी भत्ता ना मिलना युवाओं में असंतोष का कारण बना. सरकारी नौकरियों में भी एसपी सरकार पर आरोप लगते रहे हैं कि पुलिस और दारोग़ा की भर्तियों में सिर्फ प्रदेश के यादवों को लिया जा रहा है. भले ही यह सच्चाई ना हो लेकिन समाज में एसपी सरकार के प्रति यह गलत संदेश जरूर गया.

 

कन्या विद्या धन के मसले पर भी उच्च हिंदू जातियों को आपत्ति रही है. उनका आरोप रहा है कि इसमें यादवों और मुसलमानों को सरकार वरीयता देती है.

 

2012 में बनी एसपी सरकार ने लैपटॉप बांटकर युवाओं को लुभाने का प्रयास किया. लेकिन करीब 30 प्रतिशत अशिक्षित और बिजली की कमी से जूझ रहे उत्तर प्रदेश में लैपटॉप किसी काम का नहीं था. राजधानी लखनऊ में ही तमाम छात्र अपने-अपने लैपटॉप पांच हज़ार में बेचते नज़र आए.

 

कन्या विद्या धन, बेरोजगारी भत्ता और लैपटॉप की चकाचौंध में जनता मूलभूत सुविधाओं और बेसिक इफ्रांस्ट्रक्चर से महरूम रह गई. सड़कें आज भी उसी हाल में है जिस हाल में मायावती उन्हें छोड़कर गईं थी. यूपी में बिजली आज भी रात और दिन की शिफ्ट में आती है. एक हफ्ते रात में तो एक हफ्ते दिन में. करोड़ों युवा इस उम्मीद में हैं कि किसी तरह बीटीसी और बीएड करके वो प्राइमरी अध्यापक बन जाएं.

 

ऐसे में वो तमाम लोग निराश हैं. ये ना तो मुसलमान हैं और ना ही हिंदू ये वो हैं जो विकास चाहते हैं. ये लोग एसपी सरकार से भी बेहद नाराज हैं. इन हालात में मुलायम की इच्छा कैसे पूरी होगी ये तो वक्त ही बताएगा. फिलहाल तो प्रदेश में एसपी सरकार की स्थिति यह है कि अगर आज चुनाव हो तो समाजवादी पार्टी 10 से 15 सीटों पर ही सिमट सकती है. यह सर्वे भी बता रहे हैं. और इतनी सीटों पर वो तीसरे मोर्चे पर तो क्या उनके लिए यूपी में अपनी लाज बचाना भी मुश्किल हो जाएगा.

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