मद्रास कैफे: पराई जंग की अंदरूनी दास्तां

By: | Last Updated: Saturday, 24 August 2013 7:24 AM
मद्रास कैफे: पराई जंग की अंदरूनी दास्तां

<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
<b>मद्रास
कैफे.</b> नाम सुनकर बड़ा अटपटा
लगता है. जेहन में तमाम तरह की
बातें घूमने लगती हैं कि आखिर
इस फिल्म में ऐसा क्या दिखाने
की कोशिश की जानेवाली है कि
फिल्म का नाम इस कदर जुदा है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
आंखों के सामने से मद्रास
कैफे की चंद रीलों के गुजरते
ही यकीन हो जाता है कि ये
फिल्म हिंदी सिनेमा के
मानकों के हिसाब से ना सिर्फ
एक अद्भुत अनुभव है, बल्कि
युद्ध औऱ खुफिया मिशन पर
आधारित फिल्मों में से अब तक
की सबसे बेहतरीन फिल्म भी है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
दुनिया के सबसे खूंखार
आंतकवादी संगठनों में से एक
एलटीटीई से भारत सरकार के
टकराव को केंद्र में रखकर,
श्रीलंका में दो दशक तक चले
गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि पर
बनी मद्रास कैफे सही मायनों
में हिंदी में बनी पहली ऐसी
वॉर फिल्म है, जिसका
ट्रीटमेंट हमें कई स्तरों पर
हैरान करता है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
हिंदी में बनने वाली
अति-राष्ट्वाद से ओत-प्रेत और
अतिश्योक्ति की सभी सीमाओं
को पार करनेवाली तथाकथित
युद्ध आधारित फिल्मों से परे,
मद्रास कैफे श्रीलंका के
गृहयुद्ध में भारतीय दखल को
इतने विस्तार से दिखाती है कि
फिल्म देखते-देखते हमें खुद
पर ही शक होने लगता है कि क्या
हम सचमुच में इतने जटिल विषय
पर बनी कोई हिंदी फिल्म देख
रहे हैं या फिर कोई हॉलीवुड
फिल्म. हालांकि कहीं-कहीं
इतनी विषम समस्या के सरलीकरण
की कोशिश भी साफ झलकती है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
मद्रास कैफे के विषय की
संजीदगी हमें इतनी नहीं
चौंकाती, जितनी इसके विषय की
गहराई जेहन में चस्पां हो
जाती है. फिल्म की
स्क्रिप्टिंग, स्क्रीनप्ले,
डायलॉग्स औऱ इनकी अदायगी,
छोटे-छोटे से रोल के लिए
अदाकारों का चयन, अदाकारी का
सरल अंदाज सबकुछ
काबिल-ए-तारीफ है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
कमलजीत नेगी का कैमरा
गृहयुद्ध से घिरे श्रीलंकाई
लोगों की बेबसी और उनके साथ
होने वाले अमानवीय बर्ताव की
तस्वीरों को बड़े ही क्रूर
अंदाज में कैद करता है.
बार-बार होने वाले कत्लेआम के
विभत्स दृश्य हों, आंतकियों
के साथ भारतीय सैनिकों के
मुठभे़ड़ के सीन्स
हों,एलटीएफ (असल में एलटीटीई)
के मुखिया अन्ना (प्रभाकरण से
मेल खाता किरदार) को पकड़ने
की नाकाम कोशिश हो या फिर चंद
पलों में निकलने वाली
सैकड़ों गोलिय़ों की आवाज हो,
मद्रास कैफे के पटल पर सबकुछ
एकदम से अनसुना और अनदेखा-सा
लगता है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ की
अफसरों की कतार में एक भी
चेहरा बनावटी होने का आभास
बिलकुल नहीं कराता. सभी के
चेहरों के हाव-भाव, मिशन को
कामयाब बनाने को लेकर चेहरे
पर आनेवाली शिकन और इसके मिशन
के तमाम तकनीकी पहलुओं को
लेकर होने वाली
बहस-मुहाबिसें देख-सुनकर
लगता है कि मानों सचमुच में
हम इंटेलिजेंस की सीक्रेट
वर्ल्ड के गवाह बन गए हों.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
श्रीलंका में भारतीय मिशन के
गद्दार मुखिया बाला (प्रकाश
बेलावादे) और रॉ के हेड के रूप
में रॉबिन दत्त (सिद्धार्थ
बसु) दोनों अपने किरदारों को
इतनी शिद्धत से निभाते हैं कि
जैसे हम भूल से जाते हैं कि वे
ऐक्टिंग कर रहे हैं. फिल्म का
‘हीरो’ विक्रम सिंह (जॉन
अब्राहम) फिल्म में किसी तरह
की हीरोगिरी करता नजर नहीं
आता.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
रॉ एजेंट एक सुपरहीरो नहीं,
बल्कि असल जिंदगी में एक आम
आदमी की तरह बिहेव करता है,
विक्रम का किरदार हर सीन में
हमें इसका बराबर एहसास कराता
रहता है. जॉन के परफॉर्मेंस
में एक ईमानदारी की झलक नजर
आती है. फिल्म के लिए रिस्क
लेने वाले प्रोड्यूसर के तौर
पर भी जॉन की तारीफ करनी होगी.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
विक्रम की बीवी के छोटे से
रोल में रूबी (राशि खन्ना)
वक्त-वक्त पर अपनी लाचारगी को
कुछ यूं पेश करती हैं कि उनके
मर्डर के बाद भी विक्रम के
साथ-साथ दर्शकों को भी उनका
जज्बाती चेहरा बार-बार याद
आता है. श्रीलंकाई गृहयुद्ध
की हकीकत जानने पहुंची फॉरेन
वॉर जर्नलिस्ट जया (नरगिस
फाकरी) हिंदी में भले ही एकाध
हिंदी डायलॉग भी ना बोलती हों
और भले ही वो रूबी की तरह काफी
कम टाइम के लिए स्क्रीन पर
दिखती हों, मगर उनकी
इनवेस्टिगेटिव स्टोरीज पूरे
मसले पर गहरा असर डालती
हैं.‘हीरो‘ जॉन की तरह ही
नरगिस का रोल भी टिपिकल
‘हीरोइन’ के खांचे से बाहर
बैठता है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
मद्रास कैफे की जटिल कहानी
इंडिया-श्रीलंका-ब्रिटेन-सिंगापुर
जैसे कई देशों की जटिल राहों
से होकर जेट की स्पीड से
भागती है. तेजरफ्तार अंदाज
में बढ़ती कहानी की सारी जटिल
कड़ियों को जोड़कर एक चुनावी
रैली में भारत के पूर्व
प्रधानमंत्री (राजीव गांधी,
हालांकि फिल्म में ये किरदार
अनाम ही रखा गया है) की हत्या
को रोकने के लिए हो रही सारी
मशक्कत से पैदा होनेवाली
टेंशन दर्शकों की धड़कनें भी
तेज करती है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
मद्रास कैफे का पूरा
दारोमदार डायरेक्टर शूजीत
सरकार अपने कंधों पर उठाते
हैं. इस कॉम्प्लेक्स
सब्जेक्ट को शूजीत जिस तरह से
हैंडल करते हैं, वो सकारात्मक
तौर पर उनके प्रति अविश्वास
का भाव जगाता है. फिल्म में
भले ही शूजीत ने कई कलात्मक
आजादियां लीं हों और फिल्म की
कुछ खामियां भले ही एकदम से
पकड़ में आ जाती हों, मगर
सॉलिड रिसर्च के बाद
डॉक्यू-ड्रामा स्टाइल में
बनी मद्रास कैफे शूजीत की
काबिलियत को भरपूर मुजाहिरा
करती है.
</p>
<p xmlns=”http://www.w3.org/1999/xhtml”>
कश्मीर समस्या पर 2005 में बनाई
फिल्म ‘यहां’ औऱ 2012 में कॉमेडी
फिल्म ‘विक्की डोनर’ जैसी लीक
से हटकर फिल्मों से खुद को
साबित कर चुके निर्देशक
शूजीत सरकार ने मद्रास कैफे
से खुद को उन चुनिंदा
निर्देशकों में अपना शुमार
करा लिया है, जिनमें सिनेमा
की गहरी समझ भी है और कुछ अलग
करने का माद्दा भी.<br />मद्राफ
कैफे सिनेमा के अलहदा होने का
भरपूर एहसास कराती है. चूकना
मत.<br />
</p>

Bollywood News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: मद्रास कैफे: पराई जंग की अंदरूनी दास्तां
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017