मूवी रिव्यू: अच्छे सब्जेक्ट और स्टार्स के बावजूद आपका मनोरंजन नहीं कर पाएगी 'गुलाब गैंग'

By: | Last Updated: Friday, 7 March 2014 8:03 AM
मूवी रिव्यू: अच्छे सब्जेक्ट और स्टार्स के बावजूद आपका मनोरंजन नहीं कर पाएगी ‘गुलाब गैंग’

रेटिंग:  दो स्टार

माधुरी दीक्षित और जूही चावला जैसी दिग्गज अभिनेत्रियों के साथ भी आप कितनी बोर और बकवास फिल्म बना सकते हैं ‘गुलाब गैंग’ इसकी ताज़ा मिसाल है. एक लाइन में बताया जाए तो ये ए-ग्रेड स्टार्स को लेकर बनाई गई एक सी-ग्रेड फिल्म से ज़्यादा कुछ नहीं हैं.

 

निर्माता-निर्देशक कुछ भी कहें लेकिन फिल्म का सब्जेक्ट बुंदेलखंड के महिला संगठन ‘गुलाबी गैंग और उसकी संस्थापक संपत पाल पर ही आधारित है. रज्जो (माधुरी) गांव में अपना गुलाब गैंग चलाती है. ये गैंग बच्चों लड़कियों को पढ़ाता है और महिलाओं पर हुए अच्याचारों का रॉबिनहुड वाले एक्शन अंदाज़ में बदला लेता है. इसी मार-धाड़ के बीच में रज्जो महिला नेता सुमित्रा देवी (जूही चावला) से टकरा जाती है. फिर ये कहानी इन दोनों के बचकाने डायलॉग और एक्शन सीन्स का मुरब्बा बन जाती है.

 

जहां संपत पाल का गुलाबी गैंग महिलाओं के हौसले की असली कहानी है, वहीं फिल्म गुलाब गैंग में एक तरह से उनपर किया गया मज़ाक ही है. फिल्म की रफ्तार बहुत धीमी है और पहला भाग बोरियत से भरा है. इंटरवल के बाद जब जूही चावला के सीन आते हैं तो फिल्म में ड्रामा और मनोरंजन की डोज़ ज़रा बढ़ती है. मगर जूही भी इस फिल्म को बचा नहीं पातीं.

फिल्म की स्क्रीनप्ले इतना सुस्त और सपाट है कि माधुरी दीक्षित जैसी अभिनेत्री के लिए भी करने को ज़्यादा कुछ नहीं है. जिस सीन में भी उन्हें अच्छे डायलॉग मिले हैं, वो अपना असर छोड़ती हैं. फिल्म में सबसे अच्छा काम जूही चावला का है. एक घाघ नेता के रूप में जूही के सीन ही फिल्म की हाईलाइट हैं. 

 

फिल्म का गीत-संगीत भी निर्देशक सौमिक सेन ने ही दिया है जो बहुत ही साधारण है. फिल्म में हर मारधाड़ वाले सीन के बाद गुलाब गैंग की महिलाएं जश्न नाचती-गाती हैं. ये बेहद अटपटा भी लगता है.   

 

एक निर्देशक के तौर पर सौमिक सेन ने इतनी शानदार स्टारकास्ट का सही इस्तेमाल नहीं कर पाए. इस तरह के सब्जेक्ट पर पहले मिर्च-मसाला और मृत्युदंड जैसी शानदार फिल्में बन चुकी हैं. यहां भी अच्छी फिल्म बनाने का पूरा मौका था लेकिन ये फिल्म उम्मीदों पर बिलकुल खरी नहीं उतरती. फिल्म का ट्रीटमेंट टीवी सीरियल या 80 के दशक की एक्शन फिल्मों जैसा लगता है. सौमिक सेन फिल्म के लेखक, निर्देशक और संगीतकार हैं. शायद वो किसी डिपार्टमेंट पर पूरा ध्यान नहीं दे पाए. 

 

अच्छे सब्जेक्ट और स्टार्स के बावजूद ये फिल्म मनोरंजन करने में नाकाम है.

 

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