मूवी रिव्यू: बोरियत से भरी जॉन डे

By: | Last Updated: Thursday, 12 September 2013 9:50 PM
मूवी रिव्यू:  बोरियत से भरी जॉन डे

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<b>फिल्म: जॉन डे</b>
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<b>रेटिंग: **</b>
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जॉन डे के प्रोमो देखकर लग
रहा था कि काफ़ी अर्से बाद
नसीरुद्दीन शाह शायद फॉर्म
में नज़र आएंगे. इस फिल्म का
प्रचार भी इस तरह किया गया था
जैसे ये उनकी कामयाब फिल्म ए
वेडनेस्डे जैसी
एक्शन-थ्रिलर है. लेकिन सबसे
पहले ये साफ़ कर देना चाहता
हूं कि ‘जॉन डे’ एक बोरियत से
भरी फिल्म है और अंत तक आते
आते इतनी उबाऊ हो जाती है कि
समझ में नहीं आता कि इसके
किरदार क्या कर रहे हैं और
क्यों कर रहे हैं.
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ये स्पेन की एक कामयाब फिल्म
‘ला काजा 507’ (बॉक्स नंबर 507) की
देसी नक़ल है. ये कहानी है जॉन
डे (नसीरुद्दीन शाह) की जो एक
बैंक में मैनेजर है. दो साल
पहले उसकी बेटी की एक
एक्सीडेंट में मौत हो गई है.
अब वो अपनी पत्नी के साथ अपनी
अतीत को याद करके एक दुखभरी
ज़िंदगी जी रहा है. अचानक एक
दिन उसके बैंक में लूट हो
जाती है. ठीक उसी दिन उसकी
पत्नी पर भी हमला होता है. इस
दौरान ही उसे पता चलता है कि
उसकी बेटी की भी हत्या हुई थी.
वो इस पूरी साजिश का
पर्दाफ़ाश करने निकलता है तो
उसका सामना भ्रष्ट पुलिस
अफसर गौतम (रणदीप हुडा) से
होता है. गौतम पूरा शैतान है
और जॉन डे भगवान को मानने
वाला एक आम आदमी. इसके बाद
फिल्म इन्हीं के टकराव पर
आधारित है.
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फिल्म की शुरुआत के एक-दो सीन
देखकर लगता है जैसे ये फिल्म
जबरदस्त सस्पेंस थ्रिलर
होगी लेकिन फिर इसकी रफ्तार
जैसे रुक जाती है. फिल्म के
सारे किरदार इतने दुख के मारे
लगते हैं कि उनकी बातें सुनकर
और उनकी हरकतों देखकर कई बार
आप ये सोचने लगते हैं कि कुछ
तो करो जिससे मज़ा आए.
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ये अलग बात है कि
नसीरुद्दीन शाह इस रोल में भी
जान डालने की कोशिश करते हैं.
उनका अभिनय इतना स्वाभाविक
है कि कई बार तो आपको लगेगा कि
वो अभिनय कर ही नहीं रहे हैं.
ये बेहद अफसोस की बात है कि
उनके जैसा कमाल का एक्टर ऐसी
खराब स्क्रिप्ट वाली
फिल्में चुन रहा है. वहीं
रणदीप हुडा एक ही एक्सप्रेशन
के साथ डायलॉग बोलते रहते
हैं. उनका किरदार अजीब अजीब
हरकतें करता हैं. मकरंद
देशपांडे और शरत सक्सेना भी
हैं लेकिन उनका सही इस्तेमाल
नहीं हुआ है.
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फिल्म के कुछ हिंसक सीन तो
इतने घिनौने हैं कि आपको
लगेगा कि आप थिएटर से बाहर
निकल जाएं. इस तरह की हिंसा
अक्सर जापान और कोरिया की
फिल्मों में होती है लेकिन
कहीं ना कहीं वो अपने
किरदारों को जस्टीफाई कर
देते हैं. जॉन डे की कहानी में
कोई कमी नहीं नहीं है. स्पेन
वाली फिल्म (ला काजा 507) जिस पर
ये फिल्म आधारित है, वो एक
बढ़िया थ्रिलर है. लेकिन यहां
निर्देशक अहिशोर सोलोमन
पूरी तरह चूक गए हैं. फिल्म
में इतने अच्छे कलाकारों को
लेकर उन्होने एक बोर करने
वाली फिल्म बना दी है. सबसे
ज़्यादा निराशा फिल्म का
क्लाईमैक्स में होती है. आपने
पूरी फिल्म इस उम्मीद में देख
लेते हैं कि अंत में
नसीरुद्दीन शाह और रणदीप
हुडा आमने-सामने आएंगे, टकराव
होगा और शायद पैसे वसूल हो
जाएं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं
होता. पूरी फिल्म में उनके
बीच बस फोन पर एक डायलॉग है.
इसके कुछ ही मिनटों में बिना
कुछ कहे-सुने गोलियां चलती
हैं और फिल्म अपने अंजाम तक
पहुंच जाती है. 
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जॉन डे में ना तो कोई गाना है
और ना ही कोई कॉमेडी सीन और
इसकी रफ़्तार बेहद धीमी है.
जब आप फिल्म देखकर निकलते हैं
तो आपका सिर तनाव से भारी
होता है. लेकिन कहीं ना कहीं
आप ये ज़रूर सोचेंगे कि इन
एक्टर्स के साथ कोई अच्छा
निर्देशक, इसी कहानी पर एक
शानदार थ्रिलर बना सकता था.
जॉन के निर्देशक ने ये मौक़ा
गंवा दिया. भला वीकेंड पर आप
ऐसी फिल्म देखने क्यों
जाएंगे?<br />
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Web Title: मूवी रिव्यू: बोरियत से भरी जॉन डे
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