मूवी रिव्यू: मनोरंजन के साथ-साथ खास संदेश भी है भूतनाथ रिटर्न्स में

By: | Last Updated: Saturday, 12 April 2014 6:56 AM
मूवी रिव्यू: मनोरंजन के साथ-साथ खास संदेश भी है भूतनाथ रिटर्न्स में

रेटिंग- *** (तीन स्टार)

 

नई दिल्ली: आम मसाला हिंदी फिल्में सिर्फ़ मनोरंजन के घिसे-पिटे फॉर्मूलों को भुनाती रहती है. ऐसी फिल्में कम होती है जो मनोरंजन भी करें और संदेश भी दे जाएं. आमतौर पर राजकुमार हीरानी ब्रांड की फिल्में ऐसा करती रही हैं. ‘भूतनाथ रिटर्न्स’ भी बढ़िया एंटरटेनमेंट हैं जो आपको हंसाते हुए एक अच्छा संदेश दे जाती है.


फिल्म की कहानी-

भूतनाथ जब भूतवर्ल्ड यानि भूतों की दुनिया में वापस पहुंचता हैं तो उसका जमकर मज़ाक उड़ाया जाता है. उससे कहा जाता है कि वो कैसा भूत है जो एक बच्चे तक को नहीं डरा पाया. उसे एक बार फिर इंसानों की दुनिया में भेज दिया जाता है. इस बार उसका एक ही मक़सद है कि किसी भी तरह बच्चों को डरा कर अपनी इज़्ज़त वापस पा सके. इस बार वो पहुंचता है मुंबई की सबसे बड़े झुग्गी-झोंपड़ी धारावी में. लेकिन भूतनाथ अच्छा भूत है इसलिए जब वो एक नेता के ज़ुल्म और भ्रष्टाचार देखता है तो एक बच्चे अखरोट (पार्थ भालेराव) की मदद से चुनाव में उतरने का फैसला करपता है. चुनावी अखाड़े में भूत के खड़े होने से बड़ी मज़ेदार चीज़े सामने आती हैं.

 

भूतनाथ रिटर्न्स के प्रमोशन से लगा था कि ये फिल्म शायद बच्चों के लिए है लेकिन ये बहुत ही साफ़–सुथरी और सशक्त फिल्म है जिसका मज़ा पूरे परिवार के साथ लिया जा सकता है. राजनीतिक तंत्र की खामियां और भ्रष्टाचार जैसे जाने-पहचाने मुद्दे कॉमेडी का सहारा लेकर उजागर किए गए हैं, जो एक पल को हंसाते हैं और फिर सोचने को भी मजबूर करते हैं.

 

फिल्म के लीड रोल में अमिताभ बच्चन ज़बरदस्त फॉर्म में हैं मगर बच्चन के सामने बच्चा यानि पार्छ भालेराव लगभग हर सीन में बाज़ी मार गया है. इस फिल्म को देखने की अगर एक वजह बताई जाए तो वो है पार्थ. लगता ही नहीं कि वो अभिनय कर रहा है. विलेन बने बमन ईरानी ने भी रंग जाम दिया है. फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट भी बढ़िया और छोटे-छोटे रोल निभाने वाले कलाकारों के सीन भी दमदार है.

 

फिल्म के डायलॉग सशक्त हैं. बच्चों की फिल्म चिल्लड़ पार्टी का सह-निर्देशन कर चुके नितेश तिवारी ने भूतनाथ रिटर्न्स के साथ एक बेहद अच्छे आयडिया को पर्दे पर उतारा है. कहीं कहीं ये फिल्म राजकुमार हीरानी की ‘मुन्नाभाई’ फिल्मों की याद दिलाती है. फिल्म की अगर कोई खामी है तो वो है फिल्म की लंबाई. अगर ये फिल्म आधे घंटे छोटी हो सकती तो कमाल की हो सकती थी. बीच में ये बोझिल होती है मगर अंत तक आते आते फिर से रफ़्तार पकड़ लेती है. 

 

फिल्म के अंत में अमिताभ के डायलॉग बहुत कमाल के हैं. देश के चुनावी बुख़ार में `भूतनाथ रिटर्न्स` बड़ी सफ़ाई से वोटिंग से जुड़ा संदेश देती है, वो भी हंसते-हंसाते. ये अच्छी कोशिश हैं. इस वीकेंड देखकर आइए.

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