जहां राधा में कृष्ण हैं और कृष्ण में राधा, वो है वृंदावन का श्री बांके बिहारी मंदिर

By: | Last Updated: Friday, 4 September 2015 5:18 AM
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नई दिल्ली: वृंदावन का सबसे आलौकिक और प्राचीन मंदिर है श्री बांके बिहारी मंदिर. श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर श्री बांके बिहारी के दर्शन सबसे शुभ हैं. इस ऐतिहासिक मंदिर से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं.

 

मंदिर में श्री कृष्ण की श्याम रंग की एक प्रतिमा है. इस मूर्ति के बारे में मान्यता है कि इस प्रतिमा में साक्षात श्री कृष्ण और राधा समाए हुए हैं. इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा कृष्ण के दर्शन का फल मिल जाता है.

 

कृष्ण भक्त कहीं भी, किसी भी मंदिर में जाएं वहां श्री कृष्ण के संग उन्हें श्री राधा की मूर्त भी दिखती है. लेकिन बांके बिहारी जी के मंदिर की खास बात ये है कि एक ही मूरत में राधा-कृष्ण के एक साथ दर्शन हो जाते हैं.

 

श्री बांके बिहारी जी का मंदिर कब बना, कैसे बना और यहां राधा-कृष्ण एक संग एक ही मूरत में कैसे हैं इसकी कहानी भी बहुत रोचक है. इस प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही अद्भुत है.

 

कहते हैं भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों की हर प्रार्थना स्वीकार करते हैं. श्री कृष्ण के परम भक्त थे स्वामी हरिदास. संगीत सम्राट तानसेन के गुरू स्वामी हरिदास भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे और उन्होंने अपने संगीत को प्रभु को समर्पित कर दिया था. वृंदावन में स्थित श्री कृष्ण की रासस्थली निधिवन में बैठकर स्वामी हरिदास कान्हा को अपने संगीत से रिझाया करते थे.

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वामी हरिदास भगवान कृष्ण के अदृश्य रूप की आराधना करते थे. भगवान की भक्ति में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते. उनकी भक्ति और गायन से रिझकर भगवान श्री कृष्ण उनके सामने आ जाते. हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्री कृष्ण को दुलार करने लगते. एक दिन  उनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्री कृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी सांवरे सलोने का दर्शन करवाएं.

 

इसके बाद हरिदास जी श्री कृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे-

 

‘भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे। प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे।। अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे। श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।।’

श्री कृष्ण और राधा ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की। श्री कृष्ण और राधा जी दोनों ही स्वामी हरिदास से कहने लगे पहले मुझे सजाओ तो स्वामी हरिदास जी ने कहा कि आप दोनों एक हो जाओ. भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और राधा कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को बांके बिहारी नाम दिया.

 

वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बांके बिहारी के विग्रह में राधा कृष्ण दोनों ही समाए हुए हैं. भगवान बांके बिहारी का दर्शन राधा और कृष्ण के महामिलन का दर्शन है. जो भी श्री कृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है उसकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त के कष्टों दूर कर देते हैं.

 

जब स्वामी हरिदास ने भगवान कृष्ण को साकार रूप में पाना चाहा तो श्री कृष्ण बांके बिहारी के रूप में प्रकट हो गए. वैसे जब भी कोई पूरी श्रद्धा से अपने कान्हा को पुकारता है तो वो उन्हें दर्शन जरूर देते हैं.

 

एक और कथा जो बहुत मान्य है वृंदावन में वो ये कि बांके बिहारी जी की मूर्ति को हर थोड़ी देर में पर्दे से ढक दिया जाता है ताकि बिहारी जी अपना स्थान छोड़ कर कहीं चले ना जाएं। कहते हैं कि अगर कोई श्री बांके बिहारी के मुखाविंद को लगातार देखता रहे तो प्रभु उसके प्रेम से मंत्र मुग्ध होकर उनके साथ चल देते हैं इसलिए हर कुछ देर में पर्दा स उनको ढक दिया जाता है.

तीर्थ: वृंदावन का श्री बांके बिहारी मंदिर 

साथ ही ये भी कहा जाता है कि क्योंकि बांके बिहारी श्री कृष्ण के बाल रूप हैं इसलिए कहीं उन्हें किसी की नजर ना लग जाए इसलिए भी हर कुछ देर में उनके आगे पर्दा कर दिया जाता है.

 

आप जब भी वृंदावन जाएंगे तो कृष्ण भक्ति रस में डूबे भक्तों को उनके प्रेम लीन होकर झूमते पाएंगे. यही तो जादू है इस धरती का, जहां बिहारी जी के प्रेम में भक्त ऐसे रम जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि वो प्रभु के भक्ति में लीन हैं या उनके अविरल प्रेम में.

 

(श्री बांके बिहारी मंदिर के दर्शन करें एबीपी न्यूज के खास शो ‘तीर्थ’ में, हर सुबह 7.30 बजे)

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