जन्मदिन विशेष: अनु मलिक को बनना था पुलिस कमिश्नर

By: | Last Updated: Saturday, 1 November 2014 11:06 AM
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नई दिल्ली: ‘एक गर्म चाय की प्याली हो’, ‘ऊंची है बिल्डिंग’ और ‘ये काली-काली आंखें’ जैसे गीत गाने वाले अनु मलिक आज भारतीय संगीत जगत का जाना-माना नाम हैं. बॉलीवुड हो या हॉलीवुड अनु मलिक से कोई अछूता नहीं है. उनका गाना ‘छम्मा-छम्मा’ (चाइना गेट) अंग्रेजी फिल्म में भी इस्तेमाल किया गया है. बुलंदियों को छू चुके अनु की दिली इच्छा हालांकि पुलिस कमिश्नर बनने की थी.

 

2 नवंबर, 1960 को मुंबई में जन्मे अनु मलिक दिग्गज संगीतकार सरदार मलिक के बेटे हैं. अनु के बचपन का नाम अनवर सरदार मलिक था. वह स्कूल के दिनों में बहुत शरारती थे. उन्हें मराठी की कविताएं याद रखने में बहुत दिक्कत होती थी, इसलिए वह उन्हें गाकर याद किया करते थे. इस तरह उनकी जिंदगी में ‘लय’ का प्रवेश स्कूल के समय से ही हो गया था. अनु ने संगीत की शिक्षा पंडित राम प्रसाद शर्मा से ली है.

 

शुरुआत में नहीं किए गए पसंद

 

गायक-संगीतकार अनु ने अपने कॅरियर की शुरुआत 1977 में फिल्म ‘हंटरवाली’ से बतौर संगीतकार की. मनमोहन देसाई, प्रेमनाथ, मोहन चौधरी तथा एफ.सी. मेहरा जैसे लोगों के साथ काम करने वाले अनु को पहले अच्छा संगीतकार नहीं माना जाता था. शुरुआती दौर में उन्होंने ‘एक जान हैं हम’, ‘सोनी महिवाल’ और ‘गंगा जमुना सरस्वती’ जैसी फिल्मों में हाथ आजमाया, लेकिन वैसी सफलता नहीं मिली, जिसकी तलाश थी.

 

‘बाजीगर’ ने खोली किस्मत की चाभी

 

1992 में आई फिल्म ‘बाजीगर’ ने उन्हें रातोंरात युवा दिलों की धड़कन बना दिया. इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सफलता ने उनके कदम चूमे. ‘जन्म’, ‘सर’, ‘तहलका’ जैसी फिल्मों में उनके संगीत की बहुत प्रशंसा हुई. इसके बाद दौर आया ‘बॉर्डर’, ‘रिफ्यूजी’, ‘एलओसी कारगिल’, ‘अक्स’, ‘फिजा’ और ‘मैं हूं ना’ का. इन फिल्मों ने उन्हें बालीवुड में एक अलग पहचान दिलाई. ‘रिफ्यूजी’ में उनके बेहतरीन काम के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी नवाजा गया था.

 

अनु ने कुमार सानू, उदित नारायण, शान, सोनू निगम जैसे कई गायकों को भी मौका देकर बुलंदियों तक पहुंचाया. अलिशा चिनॉय के साथ भी उन्होंने ‘विजयपथ’ और ‘नो एंट्री’ जैसी फिल्मों में काम किया.

 

बनना था पुलिस कमिश्नर

 

अनु ने एक बार एक कार्यक्रम में बताया था कि वह पुलिस कमिश्नर बनना चाहते थे. उन्होंने और उनकी पत्नी ने मुंबई में एम.ए. करने के बाद आईएएस की परीक्षा भी दी थी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. बॉलीवुड में उनके गाने पसंद किए गए और सिविल सर्विसेज की तैयारी करते-करते वह संगीत निदेशक बन गए.

 

बीती बातों को याद करना नहीं है पसंद

 

अनु मानते हैं कि इधर कुछ साल से फिल्म निर्माता उन्हें कम याद कर रहे हैं. उनका कहना है कि यह उनका निजी दुख है, क्योंकि ऐसे कई निर्माता हैं, जिनकी फिल्मों के संगीत पर उन्होंने खूब मेहनत की. लेकिन उन लोगों ने उन्हें अपनी अगली फिल्म के लिए याद नहीं किया. अनु को हालांकि इसका मलाल नहीं है. उन्हें बीती बातों को याद करना पसंद नहीं है.

 

‘बॉर्डर’, ‘विरासत’ और ‘रिफ्यूजी’ के गाने ही असल पहचान

 

अनु मानते हैं कि लोग ‘गर्म चाय की प्याली हो..’ जैसे गाने बहुत पसंद करते हैं, लेकिन वह ‘एलओसी कारगिल’, ‘बॉर्डर’, ‘विरासत’, ‘रिफ्यूजी’, ‘अशोका’ के कम्पोज किए गानों को ही अपनी असल पहचान मानते हैं. इन फिल्मों के गाने अनु के दिल के बहुत करीब हैं. वह कहते हैं कि लोगों को पता ही नहीं है कि उन्होंने ये गाने भी कम्पोज किए हैं.

 

झोली में हैं फिल्मफेयर और राष्ट्रीय पुरस्कार

 

अनु मलिक को दो बार फिल्मफेयर (सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक) से नवाजा जा चुका है. उन्हें यह पुरस्कार फिल्म ‘बाजीगर’ और ‘मैं हूं ना’ के लिए दिए गए. इसके अलावा उन्हें एक बार सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला है. फिल्म ‘रिफ्यूजी’ में बेहतरीन संगीत के लिए उन्हें इस पुरस्कार से नवाजा गया था.

 

अनु टेलीविजन रियलिटी शो ‘इंडियन आइडल’ और ‘एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा’ के निर्णायक भी रह चुके हैं.

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