Movie Review: संजय दत्त की ‘मृत्युदाता’ है 'भूमि'

Movie Review: संजय दत्त की ‘मृत्युदाता’ है 'भूमि'

फिल्म में तर्क दूर दूर तक नहीं हैं, हालांकि फिल्म की सबसे बड़ी कमी ये नहीं है. तर्क के बिना भी मनोरंजक फिल्में बनी हैं और बनती हैं. संजय दत्त और अदिति राव के कुछ सीन बेहद मार्मिक हैं मगर इस लचर फिल्म को बचाने के लिए यह काफी नहीं हैं.

By: | Updated: 22 Sep 2017 05:37 PM

स्टार कास्ट: संजय दत्त, अदिति राव हैदरी, शरद केलकर शेखर, सुमन


डायरेक्टर: उमंग कुमार


रेटिंग: 1.5 स्टार


कहानी


जो दर्शक संजय दत्त के फैन हैं वो बॉलीवुड में उनकी इस वापसी से बड़ी आस लगाए बैठे थे. फिल्म शुरू हुई. संजय दत्त स्क्रीन पर नज़र आए तो देखकर लगा कि जानदार स्क्रीन प्रेज़ेंस अब भी बरक़रार है. कई साल जेल में रहने के बाद भी अपना स्टाइल भूले नहीं हैं. जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती गयी ये साफ़ होता चला गया कि अगर स्क्रिप्ट और निर्देशन घटिया हो तो कोई भी स्टार कुछ नहीं कर सकता. 1997 में अमिताभ बच्चन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. पांच साल फिल्मों से दूर रहने के बाद ‘मृत्युदाता’ से उनका कमबैक होने वाला था. फिल्म की ज़बरदस्त हाइप थी. लोग पूर्व सुपरस्टार को देखने के लिए एडवांस बुकिंग करवाए बैठे थे. मगर फिल्म इतनी वाहियात थी कि आज भी उसकी मिसाल दी जाती है. पहले ही शो के बाद दर्शकों ने सदी के महानायक अमिताभ बच्चन तक को ठेंगा दिखा दिया था.


‘भूमि’ की कहानी रेप और उसके बदले की है. बिल्कुल यही कहानी आप कुछ हफ़्तों पहले रिलीज हुई श्रीदेवी की फिल्म 'मॉम' में देख चुके हैं. यहां उसी कहानी की पृष्ठभूमि महानगर से उठाकर आगरा में रख दी गयी है. अरुण सचदेव (संजय दत्त) की बेटी भूमि (अदिति राव हैदरी) का शादी से एक दिन पहले गैंगरेप हो जाता है. इसका ज़िम्मेदार धौली (शरद केलकर) है. जब पुलिस और अदालत से भूमि को इंसाफ नहीं मिलता तो भूमि का पिता एक एक कर सब बलात्कारियों को सज़ा देता है. इस कहानी पर सैकड़ों बार फिल्में बन चुकी हैं. हाल ही श्रीदेवी की ‘मॉम’ में भी इसे कुछ परिपक्वता के साथ दिखाया गया था. ‘भूमि’ में कई सीन बिल्कुल सी-ग्रेड और सस्तेपन से भरपूर हैं. 1980 की फूहड़ एक्शन फिल्मों की तरह यहां रेप का घिनौना सीन फिल्माया गया है.


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एक्टिंग


विलेन शरद केलकर पुराने दौर के खलनायकों का कैरिकेचर नज़र आते हैं. संजय दत्त के जिगरी दोस्त के रूप में शेखर सुमन कई सीन में अपने अंदाज़ से हंसाते हैं. लेकिन उनका रोल भी ठीक से लिखा नहीं गया.



क्यों देखें/ना देखें


फिल्म में तर्क दूर दूर तक नहीं हैं, हालांकि फिल्म की सबसे बड़ी कमी ये नहीं है. तर्क के बिना भी मनोरंजक फिल्में बनी हैं और बनती हैं. संजय दत्त और अदिति राव के कुछ सीन बेहद मार्मिक हैं मगर इस लचर फिल्म को बचाने के लिए यह काफी नहीं हैं. फिल्म का स्क्रीनप्ले और निर्देशन बहुत ही कमज़ोर, फूहड़ और आउटडेटेड है. ऐसी फिल्में 30 साल पहले बनती थीं. निर्देशक उमंग कुमार एक सफल फिल्म ‘मैरीकॉम’ बना चुके हैं. हालांकि उसमें भी कई खामियां थीं, लेकिन ‘भूमि’ के सामने वो क्लासिक नज़र आती है. फिल्म ‘पिंक’ की तर्ज पर वो ‘भूमि’ में फेमिनिज्म से जुड़े डायलॉग ठूंसने की कोशिश भी करते हैं लेकिन इस फिल्म को कुछ भी और कोई भी बचा नहीं पाता. संजय दत्त को उनकी वापसी के नाम पर धोखा दिया गया है.

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