SPECIAL: बिहार में असली ट्विस्ट अभी बाकी है!

By: | Last Updated: Tuesday, 8 September 2015 12:55 PM

नई दिल्ली: सीट बंटवारे को लेकर एनडीए और महागठबंधन दोनों में विवाद हो रहा है. एनडीए में रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी एक दूसरे से आगे दिखने की होड़ में लगे हैं. दलित और महादलित नेताओं की इस लड़ाई से एनडीए को नुकसान भी हो सकता है.

 

पासवान और मांझी दोनों महत्वकांक्षी नेता माने जाते हैं. अपने अपने फायदे के लिए दोनों किसी हद तक जा सकते हैं .

 

पासवान और मांझी में ताजा विवाद शुरू हुआ है मांझी के लालू के साथ जाने की अटकलों के बाद. चार दिन पहले अचानक खबर चर्चा में आई कि मांझी बीजेपी का साथ छोड़ लालू के साथ भी जा सकते हैं. इसके बाद ही पासवान का ट्रायल वाला बयान सामने आया. पासवान ने मांझी के कद को नीचा दिखाने के लिए ट्रायल पर रहने वाला बयान दिया. उसी का नतीजा है कि मांझी अब पासवान को परिवारवाद से बाहर निकलने की नसीहत दे रहे हैं .

 

लालू के साथ जाने की चर्चा को रविवार के दिन ‘हम’ के नेता महाचंद्र सिंह ने खारिज किया था. लेकिन राजनीति तो संभावनाओं का खेल है . आज की तारीख में नेता पहले फायदा देखते हैं फिर सिद्धांत. हो सकता है कि मांझी का सौदा बीजेपी से न पटे तो वो लालू के साथ चले जाएं. लेकिन इसकी संभावना भी तब बनेगी जब लालू और नीतीश की दोस्ती टूटे. जिस तरीके से महागठबंधन में गांठ ढीली पड़ रही है उससे इस संभावना को अभी सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता .

 

पासवान और मांझी के झगड़े की असली वजह है कुछ सीटों पर टकराव. इस वजह को समझने के लिए 10 साल पहले चलना होगा. 2005 में जब पासवान की पार्टी ने 29 सीटें जीती थी तब सरकार नहीं बनने के बाद ज्यादतर विधायक नरेंद्र सिंह के नेतृत्व में नीतीश के साथ चले गए थे. 2005 के नवंबर में जेडीयू के टिकट पर ज्यादातर लोग जीतकर विधानसभा पहुंच गय . अब इनमें से कई विधायक मांझी के खेमे में हैं.

 

नरेंद्र सिंह के दोनों बेटे जो कि चकाई और जमुई से विधायक हैं. अजीत कुमार जो की कांटी से हैं. साहेबगंज के राजू सिंह और टिकारी के अनिल कुमार जैसे विधायक इस बार मांझी के साथ हैं. मांझी इन लोगों के लिए टिकट चाह रहे हैं तो पासवान ने दगाबाजी का सर्टिफिकेट बांटकर अडंगा लगा दिया है. ये वो नाम हैं जो सामने हैं. इसके अलावा कई ऐसी सुरक्षित सीटें हैं जिस पर पासवान दावा जता रहे हैं.

 

पासवान और मांझी दोनों की असली राजनीति सुरक्षित सीटों पर ही हैं. ऐसे में दोनों का टकराव जायज भी है और गठबंधन के लिए घातक भी. वैसे मांझी की पार्टी में ज्यादातर विधायक बीजेपी के साथ ही रहकर चुनाव लड़ना चाहते हैं. लेकिन जब सीटों का मामला फंसेगा तो फिर कोई न कोई फैसला लेना होगा. इसीलिए तमाम विकल्प अभी खुले हुए हैं.

 

जहां तक पासवान की पॉलिटिक्स की बात है तो भाई भतीजावाद से वो बाहर नहीं निकल पाए हैं. दो भाई और बेटा सांसद हैं. एक भाई पशुपति पारस अलौली से लड़ेंगे ही. दामाद से लेकर समधी तक टिकट के दावेदार हैं. लिहाजा परिवारवाद का आरोप कोई गलत भी नहीं है.

ऐसा नहीं कि मांझी परिवारवाद से बचे हुए हैं. दामाद को लेकर पहले मुख्यमंत्री रहते हुए विवाद हो चुका है. इस बार बेटे को भी चुनावी राजनीति में उतारने की तैयारी कर रहे हैं. खुद बेटे के लड़ने का एलान मांझी ने ही किया था.

 

बीजेपी भी भाई भतीजावाद से बाहर नहीं है. पार्टी के दर्जन भर से ज्यादा सांसद, विधायक, बड़े नेता ऐसे हैं जो रिश्तेदारों के लिए टिकट चाह रहे हैं. कहने का मतलब ये कि परिवारवाद के इस हम्माम में हर कोई नंगा है .

 

कहा जा रहा है कि बीजेपी खुद 150-160 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. पासवान को 40 के आसपास सीटें मिल सकती हैं. 20-20 सीटों के आसपास कुशवाहा और मांझी की पार्टी को मिलने की उम्मीद है. सब शांति से हो गया तब तो ठीक नहीं है नहीं तो समझ लीजिए कि सीटों को लेकर ही बिहार में असली क्लाइमेक्स बाकी है .

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Web Title: Bihar Election special Report
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