MOVIE REVIEW: ड्रामेबाजी से दूर एक बेहतरीन ड्रामा है चौरंगा

Chauranga movie review

रेटिंग: **** (चार स्टार)

2015 का अंत सिनेमा के लिहाज़ से बहुत बुरा रहा. आखिरी दो फिल्मों से बॉक्स ऑफिस और फैंस दोनों को काफी उम्मीदें थीं लेकिन ना तो शाहरुख-शेट्टी की जोड़ी बॉक्स ऑफिस पर वो जादू बिखेर पाई जिसकी इससे उम्मीद थी, ना ही ‘बाजीराव मस्तानी’ पर्दे पर वैसा जादू बिखेर पाई जिसके लिए भंसाली जाने जाते हैं. कहते हैं कि अंत भला तो सब भला, कम से कम साल 2015 का अंत तो भला नहीं रहा! लेकिन सुकून की बात यह है कि साल 2016 की शुरुआत दमदार हुई है. साल के पहले शुक्रवार को रिलीज़ होने वाली दो फिल्मों में से एक फिल्म है ‘वज़ीर’ जिसके बारे में आप जानते होंगे. फिल्म एक्शन थ्रिलर है जिससे अमिताभ, फरहान जैसे बड़े कलाकार हैं. फिल्म की कहानी लिखने में विधु विनोद चोपड़ा भी शामिल हैं और इन वजह से फिल्म से काफी उम्मीदें हैं. लेकिन दूसरी फिल्म के बारे में बहुत कम लोगों को पता होगा. फिल्म का नाम ‘चौरंगा’ है. ‘चौरंगा’ में जाने-पहचाने चेहरे की तौर पर आपके सामने संजय सूरी का नाम पेश किया जा सकता है, आईएम जैसी दमदार फिल्म की वजह से शादय आप उनको जानते हों.

खैर! साल 2015 के मई में एक फिल्म आई थी मसान. नीरज के निर्देशन में बनी फिल्म मसान भी मल्टीलेयर्ड फिल्म है. जिसमें सबकी कहानी बीचों-बीच झूलती रहती है, किसी को अपना अंत नहीं मिलता. फिल्म की कहानी को एक मोड़ पर ले जाकर छोड़ दिया गया है जिसके बाद की कहानी आप खुद गढ़ सकते हैं. फिल्म के साथ एक बात ये भी थी कि इसमें उस किस्म का ड्रामा नहीं है जैस अमूमन हिंदी फिल्मों में होता है. ऐसी ही फिल्म है चौरंगा, बिल्कुल मसान की तरह ही. मतलब चीज़ें जैसी हैं वैसी दिखाई गई हैं. सिनेमा में कहानी कहने के लिए एक किस्म का ढ़ोंग अपनाया जाता है. इससे ये फायदा उठाने की कोशिश होती है कि लोगों के लिए फिल्म मज़ेदार हो, वे इसका आनंद उठा सकें. लेकिन चौरंगा में आपको वो मज़ा नहीं आएगा जो सलमान या रोहित शेट्टी के सिनेमा में आता है, अगर आता है तो! चौरंगा एक अलग तरह से आपका मनोरंजन करती है. फिल्म आपको ये बात याद दिलाती है कि अगर आप जाति, औरतों के बदहाली, गरीबी,  समाज में मौजूद ढ़ोंग जैसी बातों की तरफ अपनी आंखें मूंद लेते हैं तो वो समस्याएं ख़त्म नहीं हो जातीं. वो आपको दिखना बंद नहीं हो जातीं बल्कि आप बस उन्हें नहीं देखने का ढ़ोंग कर रहे होते हैं. वो वहीं होती हैं, आपकी आंखों के ठीक सामने!

Soham-Maitra-and-Riddhi-Sen-on-the-Sets-of-Chauranga-at-Bolpur-Santiniketan

हर हिंदी फिल्म की तरह इस फिल्म में लड़की (फिल्म में जंमीदार की बेटी मोना और असल ज़िंदगी एना शाह) और लड़के (फिल्म में संटू और असल ज़िंदगी में शोम मित्रा) का प्यार परवान नहीं चढ़ता. प्यार एक तरफ से होता है लेकिन दूसरी तरफ इसका इल्म भी नहीं होता. फिल्म में कई नई बातें हैं, जैसे कि एक दलिता महिला (फिल्म की किरदार धनिया और असल ज़िंदगी में तनिष्ठा चटर्जी) भी अतिमहत्वकांक्षी हो सकती है. उसके जीवन में लिए गए फैसले उसके अपने हो सकते हैं. वे मजबूर तो है लेकिन इसे उसने अपनी कमज़ोरी के बजाय हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है. इसके सही गलत को लेकर बहस हो सकती है लेकिन ये लीक से हट कर है, इतना तो तय है. जितनी सीमित फिल्में मैंने देखी हैं उनमें पहली किसी हिंदी फिल्म में ऐसा दिखाया गया है कि एक ब्राह्मण किसी जानवर (एक बकरी) से सेक्स की भूख मिटाने की कोशिश करता है और वैसे वो किसी को नहीं छोड़ता. अगर ऐसा कुछ खान्स, बच्चन, कुमार वगैरह के सिनेमा में दिखाया जाता तो अबतक लोगों की भावनाएं आहत हो जातीं लेकिन भावनाओं के आहत होने के लिए आपको चीज़ें पता होनी चाहिए. आपने नहीं पता तो आप बहुत सुखी रह सकते हैं.

फिल्म के बैकग्राउंड में बिहार का एक गांव है जो आधुनिकता की तरफा बढ़ तो रहा है लेकिन दलितों, महिलाओं से लेकर संविधान द्वारा चुने गए मुखिया के खिलाफ तमाम विरोधाभासों को पाले हुए है. लड़की स्कूटी से पढ़ने जाती है, सलमान के सिनेमा की दीवानी है. फिर भी जब उसका लव लेटर पकड़ा जाता है तब वो बेतरतीबी से पीटी जाती है. वहीं उसका जमींदार बाप (फिल्म में धवल और असल ज़िदगी में सजय सूरी) दलित महिला (धनिया) से शारीरिक संबंध तो बनाता है लेकिन जब धनिया के बच्चे उसका पैर छूने आते हैं तो अपने पैर पीछे खींच लेता है. मंदिर में जाने वाला दलित आज भी कैसे अपनी जान गंवा देता है और उसे दफनाकर कैसे दफनाई गई ज़मीन में हैंडपंप गड़ा देते हैं. ऐसा बहुत कुछ है जो डाइरेक्टर बिकास रंजन मिश्रा ने दिखाया है.

फिल्म में कई छोटी-छोटी चीज़ें है जिनमें दलित परिवार की अर्थव्यवस्था और भावनाओं दोनों में शामिल एक पालतू सूअर (मोटकी) भी है. वहीं बिहार के बच्चे लोहे के पतले छड़ के सहारे एक चक्का नचाते हैं, अगर आपने गांव नहीं देखा तो आपने ऐसे खिलौने की कल्पना भी नहीं कर सकते. मोटी और ये खिलौना इस परिवार का बहुत कुछ हैं. फिल्म में हिंदी स्कूलों में सेक्स एडुकेशन की बदहाली को बॉयलजी के एक चैप्टर के सहारे दिखाया गया है जिसमें हिंदी इतनी कठिन है कि पढ़ने वाले का सर चकरा जाए. चैप्टर में अगर लड़की के ब्रेस्ट की तस्वीर ना हो तो उस ओर किसी पढ़ने वाला का ध्यान कभी ना जाए.

यहां बात टुकड़ों में बताई गई है क्योंकि समीक्षा जैसी किसी चीज़ में फिल्म की कहानी देना एक किस्म की बेईमानी सी लगती है. लेकिन फिल्म में एक मजबूत कहानी है. अगर आपकी ऐसी कोई शिकायत रही है कि हिंदी सिनेमा में कहानी या स्क्रिप्ट नहीं होती तो ये फिल्म आपकी वो शिकायत दूर कर सकती है.

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Web Title: Chauranga movie review
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