खेल हस्तियों पर फिल्मों के पीछे खेल हित या कारोबार?

By: | Last Updated: Friday, 10 October 2014 12:10 PM
film based on sports person

नई दिल्लीः हिंदी फिल्म जगत में यह वर्ष खेल हस्तियों पर बनी कई बेहतरीन फिल्मों का रहा. फिल्म विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी फिल्में दर्शकों में प्रेरणा जगाती हैं और उनसे सीधे जुड़ने में भी सफल रहीं.

 

हाल ही में स्टार अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा अभिनीत देश की स्टार मुक्केबाज मैरी कोम के जीवन पर उन्हीं के नाम वाले शीर्षक से बनी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर मिली सफलता के बाद दर्शकों को खेल से जुड़ी और भी फिल्में देखने को मिल सकती हैं.

 

विशेषज्ञों का हालांकि यह भी मानना है कि दर्शकों से मिले हालिया रुझान आने वाली फिल्मों की सफलता की गारंटी नहीं हो सकते.

 

खेल आधारित आने वाली फिल्मों में ‘ध्यानचंद’ और ‘महेंद्र सिंह धोनी’ प्रमुख हैं.

 

रोमांटिक भव्य फिल्मों के लिए जाने जाने वाले करण जौहर जहां हॉकी के जादूगर ध्यानचंद पर बनने वाली फिल्म के निर्माण के लिए आगे आए हैं, वहीं नीरज पांडेय भारतीय क्रिकेट के मौजूदा कप्तान धौनी पर सुशांत सिंह राजपूत को लेकर फिल्म निर्माण में जुट चुके हैं.

 

पीवीआर पिक्चर्स के सीओओ (चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर) दीपक शर्मा ने कहा, “इसके पीछे कोई बड़ा राज नहीं है. वे ऐसी फिल्में इसलिए बना रहे हैं क्योंकि बॉक्स ऑफिस पर वे अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं.”

 

उन्होंने कहा, “खेल हस्तियों के जीवन पर बनी फिल्में प्रेरणादायक होती हैं. हर वर्ग के लोग उससे खुद को निजी तौर पर जुड़ा महसूस करते हैं. लोगों को पता होता है कि ऐसी फिल्में साफ-सुथरी होती हैं, इसलिए वे परिवार और बच्चों सहित इन फिल्मों को देखने पहुंचते हैं.”

 

जाने माने फिल्म विशेषज्ञ कोमल नाहटा इसे सिर्फ भेड़चाल बताते हैं, हालांकि वह ये भी स्वीकार करते हैं कि कहानी यदि अच्छे से कही गई हो तो दर्शकों का मन जीतने में कामयाब होती है.

 

नाहटा ने कहा, “फिल्म उद्योग भेड़चाल पर चलता है. सभी सफल फिल्मों के फॉर्मूले के पीछे भागते हैं.”

 

नाहटा ने कहा, “अच्छी फिल्में चलती हैं और खराब फिल्में पिटती हैं. ये सारी फिल्में चलीं, क्योंकि उन्हें बेहद खूबसूरती से बनाया गया था. इन फिल्मों को भावप्रधान और दर्शकों से जोड़ सकने वाले अभिनय से पिरोया गया था, इसलिए वे चलीं, न कि इसलिए कि वे किसी के जीवन पर बनी थीं.”

 

नाहटा ने कहा कि ऐसा हर बार जरूरी नहीं है कि किसी अभिनेता या खिलाड़ी के जीवन पर बनी फिल्में सफल ही हों.

 

नाहटा ने कहा, “कई वर्ष पहले एथलीट अश्विनी नाचप्पा पर ‘अश्वनी’ शीर्षक से एक फिल्म बनी थी, लेकिन वह बुरी तरह पिट गई. इसलिए फिल्म की शैली उसकी सफलता की गारंटी नहीं हो सकती, बल्कि निर्माण की शैली और फिल्म की बुनावट से ही उसकी सफलता निर्धारित होती है.”

 

हाल में खेल हस्तियों पर बनी फिल्मों में डिजाइनर से निर्देशक बने उमंग कुमार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मैरी कोम’ दर्शकों के दिल को छूने में सफल रही. ‘मैरी कोम’ के जरिए न सिर्फ हमें उमंग के रूप में एक बेहतरीन निर्देशक मिले, बल्कि फिल्म ने निर्माताओं को भी जमकर फायदा दिलाया.

 

‘मैरी कोम’ फिल्म ने पहले ही सप्ताहांत में 28.32 करोड़ रुपये का कारोबार किया और फिल्म की सफलता ने जीवनी आधारित फिल्मों के प्रति निर्माताओं का विश्वास और बढ़ा दिया.

 

पिछले वर्ष राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित भारत के दिग्गज धावक मिल्खा सिंह के जीवन पर बनी फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ ने न सिर्फ कई अवार्ड जीते, बल्कि 100 करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली फिल्मों की सूची में भी जुड़ गई.

 

मेहरा ने कहा, “दर्शकों की रुचि बदल और विकसित हो रही है. हमारा देश तेजी से बदल रहा है और यह हमारी फिल्मों में भी दिख रहा है.”

 

निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की ‘पान सिंह तोमर’ कम बजट में बनी फिल्म थी, लेकिन इसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की.

 

हिंदी फिल्म उद्योग प्रेम कहानियों की काल्पनिक दुनिया से कहीं आगे निकल आया है और अब वास्तविकता को दर्शाती फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अपने झंडे गाड़ने लगी हैं.

 

नाच-गाने, डायलॉग और मारधाड़ से भरपूर मसाला फिल्में आज भी लोगों की पसंद बनी हुई हैं, लेकिन आम जीवन को दर्शाती सादगीपूर्ण फिल्में भी खूब पसंद की जा रही हैं.

 

इससे पहले भी खेल पर बनी कई फिल्मों ने सफलता हासिल की है, जिसमें आशुतोष गोवारिकर निर्देशित और आमिर खान अभिनीत ‘लगान’, शिमित अमीन निर्देशित और शाहरुख खान अभिनीत ‘चक दे इंडिया’, नागेश कुकनूर निर्देशित ‘इकबाल’ शामिल हैं. हालांकि तब ऐसी फिल्में वर्षो के अंतराल पर आती थीं.

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