फिल्म रिव्यू: 'हंटर'- एक Sex Addict की दास्तान

By: | Last Updated: Saturday, 21 March 2015 8:35 AM
Film review: Hunter by yasser usman

रेटिंग: दो स्टार

 

बॉलीवुड में पिछले कुछ सालों में ‘मस्ती’ और ‘क्या कूल हैं हम’ जैसी फूहड़ सेक्स कॉमेडीज़ बनी हैं और बेहद कामयाब भी हुई हैं. ‘हंटर’ भी एक सेक्स कॉमेडी है लेकिन इन फूहड़ फिल्मों से अलग है. निर्देशक हर्षवर्धन कुलकर्णी की ‘हंटर’ एक Sex Addict की कहानी बयां करती है. ये विषय हिंदी सिनेमा के लिए नया और बोल्ड है. लेकिन परेशानी ये है कि अच्छी शुरुआत के बाद फिल्म अपने विषय से भटक कर बंधे-बंधाए ढर्रे पर आ जाती है और एक मामूली रोमांटिक कॉमेडी बनकर रह जाती है.
 

लव और सेक्स में कंफ्यूज़ नहीं करना चाहिए!

 

मुंबई का रहने वाला मंदार (गुलशन देवाइया) वासु यानि एक Sex Addict है जिसकी ज़िदगी का मक़सद सेक्स है. बचपन से लेकर 30 साल तक उनकी ज़िदगी में सविता भाभी (रेचेल डिसूजा), पारुल (वीरा सक्सेना) और ज्योत्सना (साइ तमहंकर) जैसी कई लड़कियां आती हैं. लेकिन धीरे-धीरे मंदार के सब दोस्तों की शादी हो जाती है. अकेलापन दूर करने के लिए उसे भी शादी का ख़याल आता है. उसकी मुलाक़ात तृप्ति (राधिका आप्टे) से होती है और उसे तृप्ति से प्यार हो जाता है. मगर चूंकि मंदार को सेक्स की लत है, तो उसकी ‘वासुगीरी’ बंद नहीं होती. आख़िर में जब तृप्ति को मंदार का सच पता चलता है तो क्या होता है?

एक Sex Addict किस तरह अपने किसी भी रिश्ते के साथ इंसाफ़ नहीं कर पाता, कैसे उसे क़दम-क़दम पर शर्मिंदा होना पड़ता है, ‘हंटर’ के कुछ सीन इस पसोपेश को बख़ूबी दर्शाते हैं लेकिन बात सिर्फ़ कुछ सीन तक ही सिमट कर रह जाती है.

 

ये बात तो समझ में आती है कि ये फिल्म पूरी तरह से मंदार के दृष्टिकोण से है, लेकिन इसमें सभी महिलाओं के किरदार इतने कमज़ोर क्यों लिखे गए हैं? फिल्म में जिस तरह लड़कियों की सोच, उनके किरदार को दिखाया गया है, वो समाज में मौजदू पुरुषों के घिसे-पिटे नज़रिए पर ही मुहर लगाता है. ख़ासतौर पर फिल्म के अंत में राधिका आप्टे का रिएक्शन हो या फिर एयरपोर्ट में अकेले बैठी महिला क्यों बिना सोचे-समझे हीरो के साथ होटल में जाने का फैसला करती है? और सबसे ज़रूरी बात- समाज में मंदार जैसे नज़रिए को कैसे स्वीकार किए जाते हैं और महिलाओं का अपमान करने वाली उसकी ऐसी हरकतों को कॉमेडी कब तक कहा जाता रहेगा?

 

मंदार के रोल में गुलशन देवाइया ने किरदार में जान फूंक दी है. फिल्म की तमाम कमज़रियों को गुलशन अपने अभिनय के दम पर छुपाते नज़र आते हैं. गुलशन यक़ीननन और ज़्यादा और बेहतर फिल्में डिज़र्व करते हैं. राधिका आप्टे ने बदलापुर के बाद इस फिल्म में भी बहुत अच्छी एक्टिंग की है लेकिन यहां उनका किरादर बेहद सपाट लिखा गया है.

निर्देशक हर्षवर्धन कुलकर्णी ने बड़ी हिम्मत के साथ एक मुश्किल सब्जेक्ट चुना है. उनकी तारीफ़ होनी चाहिए कि फिल्म में ज़बर्दस्ती के एडल्ट सीन या फूहड़ता दिखाने की कोशिश नहीं की है. लेकिन अंत तक आते-आते फिल्म कुछ ख़ास नहीं कह पाती. कहानी की रफ़्तार धीमी है और सबसे ज़्यादा परेशानी बार-बार आते फ्लैशबैक से होती है. फिल्म नॉन-लीनियर अंदाज़ में आगे बढ़ती है और कुछ समय बाद ये बेहद कन्फ़्यूज़ करता है. साथ ही कहानी में हीरो के बाई की मौत का ट्रैक भी ज़बरदस्ती ठूंसा हुआ लगता है.

 

हंटर उन फिल्मों में से है जिसके ट्रेलर ने बहुत उम्मीद जगाई थी, लेकिन फिल्म उन उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती.

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