एबीपी न्यूज विशेष : अन्ना के कुनबे में महाभारत!

By: | Last Updated: Saturday, 31 January 2015 2:57 PM
एबीपी न्यूज विशेष : अन्ना के कुनबे में महाभारत!

नई दिल्ली: किताबों के पन्नों में दबी महाभारत एक ऐसे भीषण युद्ध की दास्तान हैं जिसमें अपनों ने ही अपनों के खिलाफ हथियार उठाए हैं. महाभारत की इस कहानी में खून के रिश्तों से जुड़े किरदार सत्य के लिए लड़ते तो कहीं सत्ता के लिए जीते और मरते नजर आते हैं. सत्ता की बिसात पर रिश्तों के धागों से बुनी हुई महाभारत की ये कहानी सदियों से लोगों को प्रेरित करती रही है जिसमें सत्ता के लिए जंग और रिश्तों का मार्मिक अंत दर्ज है. कहते हैं महाभारत की ये जंग हस्तिनापुर में लड़ी गई थी. जो आज के हरियाणा में मौजूद है और हरियाणा से सटे दिल्ली में ही लड़ी जा रही है आज की महाभारत. यूं तो दिल्ली की इस चुनावी महाभारत के किरदार अलग है. इस जंग का स्वरुप भी अलग है लेकिन इस चुनावी जंग में वो लोग ही एक दूसरे के खिलाफ सीना ताने खड़े हैं जो महज दो साल पहले एक थे. ये वो लोग है जो एक ही मंच से अपनी आवाज बुलंद कर रहे थे लेकिन बदले हालात में आज अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी दिल्ली की चुनावी महाभारत में आमने – सामने खड़े हैं और इनसे अलग वो अन्ना हजारे भी अपनी ताल ठोंक रहे हैं. जिन्होंने साल 2011 में अपने आंदोलन से पूरे देश को हिला कर रख दिया था.

 

दिल्ली का चुनावी संग्राम अब किरन बनाम केजरीवाल बन चुका है लेकिन चुनावी  मैदान में मौजूद ये दोनों नेता भ्रष्टाचार विरोधी उस जनलोकपाल आंदोलन से निकले हैं जिसने एक वक्त देश के जनमानस को झकझोर कर रख दिया था. वक्त गुजरा, हालात बदले औऱ गुजरते वक्त के साथ ही टीम अन्ना के इन दो सिपहसालारों के विचार भी बदल गए. अरविंद केजरीवाल ने जहां अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई तो वहीं किरण बेदी ने बीजेपी में अपनी जगह बनाई. और इन बदले हालात में अन्ना हजारे आंदोलन के दृश्य से ही गायब हो गए. लेकिन एक बार फिर अन्ना हजारे भी जनआंदोलन के लिए हुंकार भर रहे हैं.

 

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने बताया कि जनलोकपाल पर कानून बन गया, कानून बन गया राष्ट्रपति जी ने उसके ऊपर साइन भी कर दिया अभी उसपर अमल करना है उस कानून का अमल करना है..लेकिन ये सरकार अमल ही नहीं कर रही है. समझ नहीं आता कि पुरा देश खड़ा हो गया लोकपाल के बिल पर देश में लोकपाल जैसा कानून बनना चाहिए. पूरा देश खड़ा हो गया और आज ये सरकार मैंने तीन लैटर लिखा. तीन लैटर लिखा और ये पंत प्रधान उसका जबाब ही नहीं दे रहे हैं. एक लैटर के लिए उन्होंने खत  भेजा  कि आपका पत्र मिला बस.

 

अन्ना हजारे के मंच पर अरविंद केजरीवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी होने वाली किरन अब उन्हीं अरविंद केजरीवाल के खिलाफ चुनावी मैदान में कूद चुकी हैं. बीजेपी ने उन्हें केजरीवाल की काट के तौर पर जब दिल्ली के चुनावी दंगल में उतारा तो इसी के बाद से दिल्ली का चुनाव किरण बनाम केजरीवाल हो गया है.

 

दिल्ली की चुनावी बिसात पर शह और मात का खेल जारी है. किरण वर्सेज केजरीवाल की इस चुनावी जंग की चर्चा भी हम करेंगे. आगे लेकिन उससे पहले आपको दिखाते है उस चेहरे का मौजूदा हाल जिसकी वजह से राजनीति की दुनिया में इन दो चेहरो ने मुकाम बनाया है.

 

अन्ना हजारे का गांव रालेगण सिद्धी साल 2012 में उस वक्त दुनिया भर में मशहूर हो गया था जब जन – लोकपाल बिल को लेकर अन्ना हजारे ने देश में जबरदस्त आंदोलन छेड़ दिया था लेकिन आज अन्ना हजारे का नाम कभी कभार ही सुनाई पड़ता है जबकि उन्हीं के टीम के दो सदस्य अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी मीडिया में छाए हुए हैं. ऐसे में ये सवाल हर किसी के जहन में आता है कि आखिर अन्ना हजारे कहां है और वो क्या कर रहे हैं.

 

महाराष्ट्र में एक छोटा सा गांव है रालेगण सिद्धी. ये अन्ना हजारे का गांव है. जहां अन्ना एक मंदिर के छोटे से कमरे में आज भी पहले की तरह ही रहते हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अन्ना हजारे आज फिर अकेले खड़े है. क्योंकि साल 2012 में उन्होंने अपनी वो टीम उस वक्त भंग कर दी थी जब अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में उतरने का फैसला किया था और फिर इसी के बाद से अन्ना हजारे खबरों से गायब होते चले गए और केजरीवाल बन गए मीडिया की आंखों का तारा. बदलते घटनाक्रम के बीच दो साल तक अन्ना हजारे खामोश रहे लेकिन अब एक बार फिर उन्होनें अपनी जुबान खोल दी है.

 

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने कहा कि नई सरकार सत्ता में आई और हम फिर से आंदोलन करने लगे तो ठीक नहीं. समय तो देना पड़ेगा तो इसलिए हम लोग पिछले 8  महीनों तक कुछ बात नहीं किया. उसके ऊपर कुछ बोला नहीं उनके विरोध में भी हमारा कोई शब्द नहीं है. उल्टा हम ये कहने लगे कि पंत प्रधान देश में प्रधानमंत्री जी को सोच बड़ी अच्छी है. इसमें ये सोच के मुताबिक देशचला तो अच्छे दिन आ जाएंगे. लेकिन कहां, अभी ये तो बताए थे कि  लेकिन हुआ नहीं ना. इन्होंने जो बोला था कि अच्छे दिन आएंगे पर अब करप्शन पर कोई प्रश्न नहीं है. आज भी करप्शन इतना बढ़ गया है सामान्य लोगों को जीना मुश्किल हो रहा है.

 

पिछले दो सालों में देश की राजनीति में बहुत कुछ बदल चुका है. केंद्र में अब बीजेपी की सरकार है. दिल्ली की राजनीति में भी बहुत बदलाव आए हैं. कभी कंधे से कंधा मिला कर चलने वाले टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी आज एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में खड़े हैं लेकिन इन सब के बीच अन्ना हजारे के लिए जनलोकपाल का मतलब आज भी नहीं बदला है और इसीलिए जनलोकपाल को लेकर एक बार फिर एक्शन में आ गए है अन्ना.

 

अन्ना हजारे ने कहा कि पंत प्रधानमंत्री जी को हम बार बार लेटर लिखकर ये रिक्वेस्ट किया है  और वो अभी उसको साथ नहीं दे रहे हैं तो अभी जनता के दरबार में जाएंगे.  और जनता को बताएंगे कि अभी क्या करना है. अगर जनता कहती है कि फिर से आंदोलन करना है तो फिर से आंदोलन करेगें. अन्ना हजारे बोलते नहीं अगर जनता ये कह देती कि भ्रष्ट्राचार के विरोध में एक आंदोलन खड़ा होना बहुत जरुरी है. भूमि अधिग्रहण बिल उसके विरोध में आंदोलन खड़ा करना जरूरी है. अगर जनता करती है तो हम आगे खड़े रहेंगे. और सबका कहना यही है कि आप हां करो..आप आगे खड़े रहो हम आपके पीछे चलने के लिए तैयार हैं. ऐसा कई लोग अभी कह रहें हैं. तो वो मैं देख रहा हूं.

 

अन्ना हजारे इन दिनों अपने गांव रालेगण सिद्धी से कम ही बाहर निकलते हैं हांलाकि गांव में उनसे मिलने दूर – दूर से लोग आते रहते हैं. 77 साल की उम्र में आज भी अन्ना हजारे का जोश और जूनून कायम है और इसीलिए वो जन-लोकपाल और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों को लेकर एक बार फिर आंदोलन छेड़ने की तैयारी में जुटे हैं. लेकिन इस बार अन्ना के मंच पर केजरीवाल और किरण बेदी जैसे उनके सहयोगी नजर नहीं आएंगे. इसीलिए ये सवाल भी बड़ा है कि क्या अन्ना का आंदोलन इस बार भी पहले की तरह रफ्तार पकड़ सकेगा. शायद इस बात का अहसास अन्ना हजारे को भी है लेकिन वो एकला चलो की अपनी नीति पर आज भी कायम हैं.

 

अन्ना हजारे कहते हैं कि मैं कभी होकर कोई टीम बनाने का कोशिश नहीं किया.एकला चलो रे. मैं अपने जीवन में एकला चलो रे फूर्ती से चलते गया कारवां बनता गया लोग जुड़ते गए आंदोलन खड़े होते गया. अभी भले ही किरन बेदी अरविंद और बाकि के लोग कहां कहां गए…जाने दो. मैं एकला चलो रे चलते रहूंगा. फिर से कारवां बनते जाएगा लोग आते रहेगें और जुड़ते रहेगें और फिर से आंदोलन खड़ा होगा.

 

आम आदमी पार्टी के नेता योगेंद्र यादव ने कहा कि ये तो पहली बार नहीं है 2 साल में ये प्रकरण तीन चार बार हो चुका है और हमनें हमेशा कहा है कि जब भी अन्ना कोई सही चीज करेगें भ्रष्ट्राचार के विरोध में तो हम लोग हमेशा उनका साथ देगें. वो चाहें हमारा साथ दे या न दें. भ्रष्ट्राचार के खिलाफ उनकी लड़ाई मैं हम लोग हमेशा उनका साथ देगें.

 

नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे अब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की तैयारी में है लेकिन इस आंदोलन में अन्ना हजारे को टीम केजरीवाल का साथ मंजूर नहीं है. वही दूसरी तरफ टीम अन्ना की सदस्य रहीं किरन बेदी बीजेपी का दामन थाम चुकी है साफ है कि इन बदले हालात के बीच अन्ना हजारे के कुनबे में महाभारत छिड़ चुकी है और यही वजह है कि दिल्ली की चुनावी जंग में आमने – सामने खड़े है किरन बेदी और अरविंद केजरीवाल.

 

भारत की पहली महिला IPS अधिकारी किरन बेदी ने बीजेपी में शामिल होने के साथ ही ये भी साफ कर दिया है कि वो दिल्ली की कमान संभालने के लिए पूरी तरह से तैयार है और इस तरह कभी अन्ना की ताकत रही किरन बेदी अब बीजेपी की ताकत बन चुकी हैं.

 

बीजेपी के लिए दिल्ली के चुनाव में किरन बेदी क्या अहमियत रखती हैं इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पार्टी में शामिल होने से पहले उन्हें बाकायदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिलने के लिए बुलाया था. लेकिन यहां सवाल ये भी है कि दिल्ली में अपने बड़े नेताओं की मौजूदगी और ताकतवर संगठन के बावजूद भी बीजेपी की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उसे चुनाव के ठीक पहले किरण बेदी को लाकर मैदान में उतारना पड़ा है. 

 

केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी किरण बेदी पर अवसरवादी होने का आरोप लगा रहे हैं लेकिन किरण बेदी के मुताबिक उन्हें बीजेपी में लाने की कोशिशे पहले भी हो चुकी है लेकिन तब उन्होने बीजेपी में शामिल होने से इंकार कर दिया था. लेकिन बदले हालात में अब वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व से प्रभावित होकर बीजेपी में शामिल हुई हैं.

 

लेकिन ये भी एक सच है कि किरन बेदी को राजनीति से कभी इतनी चिढ़ रही है कि नई राजनीतिक पार्टी बनाने के नाम पर उन्होंने जनलोकपाल आंदोलन के अपने सहयोगियों का साथ तक छोड़ दिया था. लेकिन राजनीति में अब उनकी ऐसी रुचि जागी है कि उन्हीं साथियों के खिलाफ वो चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहीं हैं.

 

दिल्ली की चुनावी जंग अपने शबाब पर है. अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी एक दूसरे पर  लगातार तीखे हमले बोल रहे हैं. लेकिन सवाल ये भी है कि कभी दोस्त रहे ये दोनों नेता आखिर क्यों और कैसे बन गए राजनीतिक दुश्मन. किरन और केजरीवाल के इस अपोजिट कनेक्शन को समझने के लिए हमें झांकना होगा उस जनलोकपाल आंदोलन में जहां कभी एक ही मंच पर मौजूद रहते थे किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल.

 

5 अप्रैल 2011… जब महाराष्ट्र के गांधीवादी नेता अन्ना हजारे के नेतृत्व में एक आंदोलन की शुरुवात हुई. दिल्ली के जंतर मंतर पर अन्ना, अनशन पर बैठे थे. कहा गया कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सरकार मजबूत लोकपाल कानून बनाए. अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी ये आंदोलन देश भर में तेजी से फैला और इसने एक बड़े जन आंदोलन का रुप ले लिया था. इस आंदोलने को चलाने के लिए तब टीम अन्ना हुआ करती थी. अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी उस टीम के सबसे खास सदस्य थे. टीम अन्ना एक बेहद ताकतवर लोकपाल कानून की मांग कर रही थी जबकि केंद्र सरकार इस तरह की व्यवस्था के पक्ष में नहीं थी.  

 

अंजलि भारद्वाज कहती हैं कि साल 2011 में जनआंदोलन के दौरान अन्ना के एक तरफ अरविंद केजरीवाल नजर आया करते थे तो उनके दूसरी तरफ किरन बेदी. उन दिनों केजरीवाल और किरन बेदी की भाषा भी एक थी और हमलों के तेवर भी एक जैसे ही थे. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुण गाने वाली किरन बेदी तब अन्ना हजारे के गीत गाती थीं.

 

अन्ना हजारे के मंच पर किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल की दोस्ती और उनकी जुगलबंदी सारी दुनिया देख चुकी है. साल 2011 में जब किरण बेदी पर हवाई यात्रा के लिए ज्यादा किराया वसूलने का आरोप लगा था तो बीजेपी ने भी किरन बेदी पर सवाल उठाये थे लेकिन तब अरविंद केजरीवाल समेत पूरी टीम अन्ना किरन बेदी के बचाव में खड़ी नजर आई थी. खुद किरन बेदी भी उन दिनों अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी की कसमें खाया करती थीं. 

 

अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन के दौरान किरन बेदी और केजरीवाल की दोस्ती हुई थी लेकिन ये दोस्ती अगले ही साल टूट कर बिखर भी गई. अरविंद केजरीवाल के राजनीति में एंट्री के साथ ही दोनों के रास्ते अलग हो गए थे. अगस्त 2012 में जब केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान किया तो किरन बेदी ने अन्ना हजारे की तरह राजनीति से दूर रहने का विकल्प चुना था. अब आगे देखिए अन्ना, केजरीवाल और किरन बेदी के अलगाव की ये पूरी दास्तान.

 

दिल्ली के जंतर – मंतर से शुरु हुआ अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन करीब एक साल तक चलता रहा. इस दौरान टीम अन्ना की केंद्र सरकार से बातचीत भी होती रही और टकराव भी चलता रहा. अरविंद केजरीवाल इस आंदोलन के सूत्रधार बन कर उभरे थे लेकिन टीम अन्ना की रणनीति को उस वक्त झटका लगा जब अन्ना हजारे ने दिल्ली से बाहर मुंबई में अनशन का फैसला किया था. क्योंकि मुंबई में अन्ना का वो आमरण अनशन फ्लॉप हो गया था. वहीं दूसरी तरफ 28 दिसंबर 2011 को लोकसभा में लोकपाल बिल भी पास करा दिया गया और इसके अगले ही महीने राज्यसभा ने भी इस बिल को स्टैंडिंग कमेटी को सौंप दिया. मुंबई में मिली नाकामी ने टीम अन्ना के सामने आंदोलन को लेकर तब एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया था.

 

मुंबई में मिली नाकामी ने अऱविंद केजरीवाल को नया रास्ता खोजने के लिए विवश कर दिया था और इसी के बाद से केजरीवाल और उनके साथी एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने के बारे में सोचने लगे थे. टीम केजरीवाल का तर्क था कि राजनीति का कीचड़ साफ करने के लिए कीचड़ में ही उतरना पड़ेगा. जबकि अन्ना हजारे राजनीति में जाने के खिलाफ थे और यहीं से पहली बार टीम केजरीवाल की बात भी होने लगी थी.

 

जनलोकपाल आंदोलन की आग ठंडी पड़ने के बाद अन्ना हजारे अपने गांव रालेगण सिद्दी वापस चले गए इधऱ अरविंद केजरीवाल बिना आंदोलन के अपने दिन काटने लगे. उन्ही दिनों सीएजी ने केन्द्र सरकार पर कोयला खदानों को मुफ्त में बांटने का आरोप लगाया. सीएजी का कहना था कि एक लाख 86 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का संभावित नुकसान सरकार को हुआ. कांग्रेस के साथ बीजेपी नेताओं के नाम भी कोयला खदान लेने वालों में शामिल थे. अरविंद केजरीवाल ने इस नए मुद्दे को फौरन लपक लिया था. 

 

अरविंद केजरीवाल ने अपनी जिंदगी का पहला आमरण अनशन करने का फैसला किया. भ्रष्टाचार के खिलाफ वो 25 जुलाई से तीन अगस्त तक अनशन पर बैठे. इस दौरान उनके साथी तत्तकालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के घर के बाहर प्रदर्शन करते रहे लेकिन इस पूरी मुहिम में अन्ना हजारे कहीं नजर नहीं आए. केजरीवाल का अनशन अभी चल ही रहा था कि दो अगस्त 2012 को अन्ना ने एक बड़े फैसले का ऐलान किया. फैसला था उस कोर टीम को भंग करने का जिसने जनलोकपाल के लिए आंदोलन किया था.

 

 

लेकिन साल 2012 में जब अन्ना हजारे ने अपनी कोर टीम भंग की तो टीम केजरीवाल ने इस पर ज्यादा ध्यान ना देते हुए राजनीतिक पार्टी बनाने की दिशा में आगे बढ़ना शुरु कर दिया था 17 सिंतबर को टीम केजरीवाल ने जनता से राजनीति में उतरने पर उनका मत मांगा और इसके अगले ही दिन अन्ना हजारे ने खुद को केजरीवाल से अलग कर लिया था.

 

राजनीति में कदम रखते ही केजरीवाल ने एक तीर से तीन निशाने साधे. बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी पर आरोप लगा कर उन्होंने बीजेपी और संघ का समर्थन लेने के आरोप से निजात ले ली. केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा को को भी नहीं बख्शा. उद्योगपति मुकेश अंबानी पर आरोप लगा कर उन्होंने दिखा दिया कि वो किसी से डरते नहीं है और फिर इसके बाद कांग्रेस, बीजेपी और कॉरपोरेट जगत …सभी के निशाने पर केजरीवाल थे और शायद केजरीवाल भी खुद यही चाहते थे. आम आदमी के बीच केजरीवाल का नाम और काम दोनों पहुंच रहा था. इस बीच 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी का गठन भी कर दिया गया था. 

 

केजरीवाल ने अपने राजनीतिक दल का नाम आम आदमी पार्टी रखा और चुनाव चिन्ह झाडू. पार्टी गठन के बाद वो और उनकी आम आदमी पार्टी दूसरे दलों के नेताओं के लिए भ्रष्टाचारी, चोर और घोटालेबाज का नारा लगाते हुए दिल्ली के चुनावी दंगल में कूद पड़े थे.

 

राजनीति के अपने पहले सफर में केजरीवाल ने हर चुनौती में एक संभावना तलाशी और सामने आने वाले हर मौके का फायदा उठाते चले गए. निर्भया गैंग रेप का मामला हो या फिर बिजली – पानी के बढ़े हुए बिलों पर दिल्ली की जनता की नाराजगी हो. केजरीवाल हर जगह सबसे आगे नजर आए. इस दौरान उन्होंने कांग्रेस और बीजेपी को करप्ट बताते हुए जनता से ये वादा भी किया कि वो दिल्ली में सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी का समर्थन नहीं लेंगे. दरअसल केजरीवाल लोगों को एक नई तरह की राजनीति का यकीन दिला रहे थे.

 

साल 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव  के जब नतीजे आए थे तो केजरीवाल ने सबकी बोलती बंद कर दी थी. आम आदमी पार्टी 70 में से 28 सीटें जीतीं थी लेकिन किसी से समर्थन लेने और ना देनें की कसमें खाने वाले केजरीवाल को आखिरकार कांग्रेस की बैसाखी के सहारे सरकार बनानी पड़ी. लेकिन सत्ता हासिल करने के बाद भी अरविंद केजरीवाल ने सड़क की राजनीति को नहीं छोड़ा. दरअसल उनकी नजरें लोकसभा के चुनावों पर जमी थी. केजरीवाल ने जनलोकपाल का मुद्दा उठाया और इस जिद्द पर अड़ गये कि जनलोकपाल बिल को विधानसभा में पेश कर के ही रहेंगे फिर चाहे लेफ्टिनेंट गवर्नर की रजामंदी मिले या ना मिले.

 

अरविंद केजरीवाल के ऐसे तीखे तेवरों से साफ था कि उनकी सरकार ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है. और 14 फरवरी 2014 को दिल्ली विधानसभा की बैठक शुरु होने से पहले ही ये लगभग तय हो गया था कि केजरीवाल मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे. और ऐसा  हुआ भी.

 

राजनीति के इस सफर में केजरीवाल से जुड़े लोकपाल आंदोलन के उनके कई साथी एक एक कर उनसे अलग हो गए. जहां अन्ना हजारे से उन्होने मुंह मोड़ लिया तो  वहीं किरण बेदी ने अपना रुख बदल लिया. यही वजह है कि केजरीवाल पर अपने साथियों के साथ यूज एंड थ्रो की नीति अपनाने का आरोप भी लगाता रहा है.

 

केजरीवाल को लेकर सवाल ये भी उठता रहा है कि क्या वो इतने तानाशाह और अराजक हैं कि लोग खुद ही उनसे किनारा कर लेते हैं. हांलाकि केजरीवाल ये दावा भी करते रहे है कि 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने किरन बेदी को आम आदमी पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का ऑफर दिया था. लेकिन किरन बेदी ने केजरीवाल का ये ऑफर मंजूर नहीं किया बल्कि उल्टे उनकी केजरीवाल से तकरार और बीजेपी से प्यार बढ़ता चला गया.

 

दिसंबर 2013 में जब आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बनाने की घोषणा की थी तब किरन बेदी ने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन को लेकर तमाम सवाल खड़े किए थे. इसी के बाद से किरन बेदी ने ना सिर्फ केजरीवाल का साथ छोड़ दिया था बल्कि वो अन्ना हजारे से भी दूर होती चली गई थी. अन्ना हजारे का कहना है कि एक लंबे समय से किरन बेदी उनके संपर्क में नहीं है.

 

अन्ना हजारे से सवाल- लेकिन अन्ना इल लोगों ने तो पुछा भी नहीं आपको? अरविंद केजरीवाल ने पुछा तो था कम से कम कि वो पार्टी निकाल रहे हैं. किरने बेदी ने तो पुछा भी नहीं आपसे कि वो पार्टी निकाल रहें है? अन्ना- उससे मेरा कोई तालुक्कात नहीं है. पूछते हैं न पूछते हैं उससे क्या तालुल्क है. सवाल-आपको कुछ बुरा नहीं लगता है ? अन्ना- बिल्कुल नहीं, बुरा कब लगता है जब किसी आदमी का स्वार्थ होता है और स्वार्थ में जब धक्का पहुंचता है तब बुरा लगता है. और अगर स्वार्थ हैं नही तो कर्म करते रहना ये मेरा कर्तव्य है..तो बुरा लगने का कोई सवाल ही नहीं है. दुख होने का कोई सवाल नहीं है.

 

रालेगण सिद्दी में अन्ना हजारे का दिन योग करने के साथ शुरु होता है और फिर इसके बाद वो दिन भर गांव में आने वाले मुलाकातियों से मिलते हैं लेकिन अन्ना हजारे से मिलने वालों में वो चेहरे गायब हैं जिन्होंने उनके साथ मिलकर जन-लोकपाल आंदोलन को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी. बावजूद इसके अन्ना हजारे ने हार नहीं मानी है औऱ यही वजह है कि जनलोकपाल बिल को लेकर इस बार अन्ना हजारे आर-पार की जंग की तैयारी में जुटे हैं.

 

अन्ना हजारे ने बताया कि मैं कई बार ये बोला कि आज जो पंतप्रधान नरेंद्र मोदी के कदम सही दिशा में जा रहे हैं…उनकी सोच बढ़ी अच्छी है…देश के बारे में समाज के बारें में ये मुझे लग रहा था इसलिए मैंने पत्र में लिखा शुरू शुरू में आपकी जो सोच है वो मुझे बहुत प्रभावित करती है. आपने नेपाल गए नेपाल में जो भाषण दिया अमेरिका गए और अमेरिका में जो भाषण दिया कई जगहों पर जो आपने भाषण दिया. इससे मैं बहुत प्रभावित हुआ. और हमारी देश की जनता भी बहुत प्रभावित हुई. ऐसा लगा था कि अभी अच्छे दिन आ जाएंगे ऐसा हमें लगात था लेकिन 8 महीनें के बाद जब मैं देख रहा हूं इसलिए मैं उनको ये लैटर लिखा की आपके भाषण बहुत अच्छे लगे…मैं बहुत प्रभावित हुआ लेकिन 7 महीनों के बाद कथनी और करनी में अंतर पड़ रहा है.

 

जनलोकपाल आंदोलन से पूरे देश को झकझोर कर रख देने वाले अन्ना हजारे आज अपने गांव में तन्हा खड़े हैं. उनकी टीम भी बिखर चुकी है. और उनकी टीम के दो खास रत्न किरन बेदी और केजरीवाल भी उनसे अब जुदा हो चुके हैं. राजनीति के खेल ने अन्ना हजारे के कुनबे का खेल बिगाड़ दिया है और उनके दो खास सिपहसालारों को एक ऐसे रणक्षेत्र में लाकर खड़ा कर दिया है जहां वो एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं चुनावी जंग.

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