‘लव स्टोरी-सीज़न 2’: राज कपूर से शादी करने के लिए मोरारजी देसाई से मिलीं थीं नरगिस

By: | Last Updated: Saturday, 6 September 2014 1:49 PM
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नई दिल्ली : हर शनिवार की तरह आज हम एक बार फिर आपको बताएंगे खास हस्ती की स्टोरी, जिसमें प्यार हुआ. इकरार भी हुआ लेकिन प्यार से दिल कभी डरा नहीं . बेपनाह प्यार , दर्द, तड़प और फिर जुदाई से भरी इस लव स्टोरी का असर कुछ ऐसा है कि इतने साल बीत जाने के बाद, आज भी जब जब सुपर स्टार्स की प्रेम कहानियों का जिक्र होता है तो सबसे पहले याद आते हैं यही दो नाम. राज कपूर और नरगिस . 

 

ये राज कपूर और नर्गिस की लव स्टोरी ही है . वो साल था 1946… राज कपूर ने अपने निर्देशन में फिल्म आग की शुरुआत कर दी थी. इसी फिल्म की शूटिंग के लिए राज कपूर एक स्टूडियो ढूंढ रहे थे . उन्हे पता चला कि नरगिस की मां जद्दन बाई बंबई के फेमस स्टूडियो में रोमियो एंड जूलियट बना रही हैं .

 

फेमस स्टूडियो के बारे में जानकारी लेने राज कपूर जद्दन बाई के घर पहुंच गए . वह इस बात से पूरी तरह बेखबर थे कि अगले कुछ पलों में उनकी जिंदगी पूरी तरह बदलने वाली है . उस दिन जद्दन बाई घर में नहीं थीं और घर का दरवाज़ा खोला उनकी बेटी नर्गिस ने.

 

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राज कपूर के दिल पर नरगिस के साथ इस पहली मुलाकात का असर बेहद गहरा था. इस मुलाकात का राज कपूर की जिंदगी में इतना बड़ा मुकाम था कि 1946 में हुई इस मुलाकात को उन्होने 27 साल बाद अपनी फिल्म बॉबी में हूबहू पर्दे पर उतार दिया .

 

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राज तो नरगिस के दीवाने हो चुके थे लेकिन पहली मुलाकात में राज के बारे में नरगिस ने क्या सोचा था? लेखक टीजेएस जार्ज की किताब द लाइफ एंड टाइम ऑफ नरगिस के मुताबिक इस पहली मुलाकात का ज़िक्र करते हुए नरगिस ने अपनी दोस्त नीलम को बताया- नीली आंखों वाला एक मोटा सा ‘पिंकी’ घर आया था .

 

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उस रोज़ राज कपूर नरगिस को अकेले घर में पाकर घबरा गए और फौरन वापस लौट आए . लेकिन नरगिस से मुलाकात का असर ये था कि नरगिस के घर से वह सीधे इंदर राज आनंद के घर पहुंचे जिन्होंने फिल्म आग की स्क्रिप्ट लिखी थी . स्क्रिप्ट पूरी हो चुकी थी लेकिन राज कपूर ने अपने लेखक से कहा कि उस स्क्रिप्ट में वह किसी तरह नरगिस का रोल भी जोड़ दें क्योंकि वही अब उनकी फिल्म की हीरोइन बनेंगी  .

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राज कपूर ने किसी तरह नरगिस को फिल्म आग की हीरोइन बनने के लिए मना ही लिया . 1949 में रिलीज़ हुई फिल्म आग, बॉक्स ऑफिस पर तो ज्यादा कामयाब नहीं रही लेकिन इस फिल्म ने राज कपूर और नरगिस के रूप में फिल्म इंडस्ट्री को एक बेहद कामयाब जोड़ी दे दी .

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इस फिल्म की शूटिंग के दौरान नरगिस और राज एक दूसरे के बेहद करीब हो गए . नरगिस भी राज को पसंद करने लगीं थी . उन्होंने अपनी दोस्त नीलम से कहा था कि पिंकी अब मेरे साथ तरोताजा दिखने लगा है.

 

राज कपूर के शादीशुदा होने के बावजूद नरगिस के साथ उनका रिश्ता फिल्मी पर्दे से निकल कर, उनकी असली जिंदगी का अहम हिस्सा बनने लगा था . इन खबरों से नरगिस और राज कपूर के परिवारों में खलबली मची हुई थी . राज कपूर और नरगिस को मिलने से रोकने की हर कोशिश की जा रही थी . लेकिन प्यार के पंछियों की उड़ान अब कहां रुकने वाली थी . ये वक्त तो बरसात की ठंडी फुहारों में भीगने का था.

 

अगली फिल्म बरसात की शूटिंग के दौरान राज कपूर और नर्गिस और करीब आ गए . इस समय तक नरगिस ने सोच लिया था कि उनका भविष्य अब पूरी तरह राज कपूर के साथ ही है . लेखिका मधु जैन की किताब द कपूर्स के मुताबिक – जब बरसात बन रही थी , नरगिस पूरी तरह से राज कपूर के लिए समर्पित हो चुकी थीं . यहां तक कि जब स्टूडियो में पैसे की कमी हुई तो नरगिस ने अपनी सोने की चूड़ियां बेची. उन्होंने दूसरे निर्माताओं की फिल्मों में काम करके आर.के फिल्म्स की खाली तिजोरी को भरने का काम किया . आर. के वाकई नरगिस-राजकपूर का एक बैनर था . वह एक साझेदार थीं .

 

लेकिन जब इस फिल्म की शूटिंग चल रही थी उसी दौरान नरगिस की मां जद्दन बाई की मौत हो गई . अपनी मां की मौत के बाद बेहद अकेली पड़ चुकीं नरगिस को राज कपूर में ही अपना सहारा नजर आया . वह ज्यादा से ज्यादा वक्त राज कपूर के साथ गुजारने लगीं .

 

10 मार्च 1950 को फिल्म बरसात रिलीज़ हुई और जबरदस्त हिट रही  . और इसी फिल्म के इस बेहद रोमैंटिक सीन ने आर के फिल्म्स को उनका मशहूर लोगो दिया . नर्गिस से मुलाकात होने से पहले ही राज कपूर की शादी हो चुकी थी . राज कपूर और नर्गिस के रिश्ते से उनकी पत्नी कृष्णा कपूर भी पूरी तरह वाकिफ थीं . शुरुआत में इसे लेकर राज कपूर के घर में काफी हंगामा रहा. लेकिन कहते हैं राज कपूर ने अपने परिवार से ये कह दिया था कि कुछ भी हो जाए वह अपनी पत्नी कृष्णा को कभी नहीं छोड़ेंगे . मधु जैन की किताब द कपूर्स के मुताबिक- कृष्णा राज कपूर पलंग पर लेट जाती, रेडियो चलाती और उस पर गीत बजता “आजा रे अब मेरा दिल पुकारे”. वह कहती “मैं वो थी जिसके लिए ये गाना होना चाहिए था. मैं पलंग पर लेट जाती और यही सोचती रहती कि शायद आज वो घर आएंगे.” 

 

राज कपूर और आर के स्टूडियोज़, नर्गिस की जिंदगी में सबसे अहम हो चुके थे . नर्गिस का सारा कामकाज उनके बड़े भाई अख्तर हुसैन संभालते थे . कहते हैं नर्गिस की कमाई से ही उनक परिवार का खर्च चलता था . लेकिन जब नर्गिस अपनी ज्यादातर कमाई आर के स्टूडियोज़ में लगाने लगीं तो उनके घर में हंगामा हो गया . राज कपूर के प्यार डूबी नर्गिस निर्माताओं के सामने ये शर्त भी रखने लगीं कि उनकी फिल्मों में हीरो राज कपूर को ही बनाया जाए .

 

नरगिस पर लिखी गई, लेखिका किश्वर देसाई की किताब डार्लिंग जी के मुताबिक अख्तर हुसैन बार-बार नरगिस से कहा करते थे- बेबी तुम अपनी जिंदगी बर्बाद कर रही हो . राज कपूर को भूल जाओं, अपना कामकाज करो, अपनी मेहनत करो. शादी करके अपना घर संसार बसाओ . क्यों इस चक्कर में बैठी हो?

 

इस बात को लेकर अख्तर हुसैन और नर्गिस के बीच कई बार जबरदस्त बहस हुई . लेकिन नर्गिस को राज कपूर के अलावा जैसे कुछ नजर नहीं आ रहा था . ऐसे हंगामों से परेशान होकर नरगिस ने एक नया घर ले लिया और उनके कामकाज में अब उनके भाई के हाथ में नहीं रहा .

 

वहीं राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर ने भी उन्हे समझाने की काफी कोशिश की लेकिन राज कपूर और नर्गिस का रिश्ता जारी रहा . साल 1951 में आवारा रिलीज़ हुई और ब्लॉकबस्टर साबित हुई . ये वह फिल्म थी जिसने एक निर्देशक और अभिनेता के तौर पर राज कपूर को ना सिर्फ देश में बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त शोहरत दिलाई .

 

फिल्म आग और बरसात के वक्त तक नर्गिस राज कपूर से बड़ी स्टार थीं लेकिन आवारा की कामयाबी ने इंडस्ट्री में राज कपूर का क़द भी बेहद ऊंचा कर दिया . वहीं इस फिल्म की ज्यादातर समीक्षाओं में ये लिखा गया कि राज कपूर और पृथ्वीराज कपूर के रोल के सामने नर्गिस का किरदार दबा हुआ नज़र आया .

 

इसके बाद तो नर्गिस ने राज के लिए अपना करियर भी दांव पर लगा दिया जब उन्होने फैसला किया कि वो सिर्फ आरके बैनर की फिल्मों में ही काम करेंगी . लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ नर्गिस और राज कपूर के रिश्ते में दरार आ गई ? क्या हुआ जब ये दोनों एक साथ सोवियत संघ पहुंचे ?

 

आवारा के बाद ये दोनों  फिल्म 1953 में फिल्म आह में भी नजर आए . लेकिन कहते हैं राज कपूर ने ये फैसला कर लिया था कि फिल्म आह के बाद नर्गिस किसी भी बाहर के निर्माता की फिल्म में काम नहीं करेंगी . इस फैसले से नर्गिस के भाई और फिल्म इंडस्ट्री में उनके करीबी लोग बेहद नाराज़ हुए . लेकिन राज कपूर के प्यार में दीवानी हो चुकी नरगिस ने किसी की नहीं सुनी .

 

1953 में रिलीज़ हुई फिल्म आह ज्यादा नहीं चली . और इसी दौरान नर्गिस ने उस दौर के जाने-माने निर्देशक महबूब खान की फिल्म आन में काम करने से भी इंकार कर दिया क्योंकि वो सिर्फ आर के बैनर की फिल्मों में काम करने का फैसला कर चुकीं थीं . इस अजीब से फैसले के बाद नर्गिस ना सिर्फ अपनी निजी जिंदगी में बल्कि अपने करियर में भी पूरी तरह राज कपूर पर निर्भर हो गईं .

 

काम के नाम पर नर्गिस के पास अब सिर्फ फिल्म श्री 420 थी जिसकी शूटिंग शुरू होने में अभी वक्त था . कुछ समय पहले तक जहां इंडस्ट्री में नर्गिस के नाम का डंका बजता था, वही नर्गिस अब आर के स्टूडियो में बैठी इंतजार करतीं कि कब उनकी फिल्म की शूटिंग शुरू हो . मधु जैन की किताब द कपूर्स के मुताबिक- नर्गिस के करीबी लोग भी ये कहने लगे थे कि अब राज कपूर की फिल्मों में हीरो का रोल ज्यादा बड़ा और अहम होने लगा है . और हीरोइन सिर्फ नाच-गाने तक ही सीमित रह गई है .

 

राज कपूर के अभिनय और उनके अंदाज के खास तौर पर तत्कालीन सोवियत संघ में लाखों फैन बन गए थे . 1954 में राज कपूर और नर्गिस साथ में सोवियत संघ गए . मधु जैन को दिए अपने एक बयान में अभिनेता देव आनंद ने उस दौर को याद करते हुए कहा- मैं राज कपूर को ज्यादा अच्छी तरह तब जान पाया जब हम लोग छ हफ्तों के लिए सोवियत संघ में रहे थे . वो 1954 का पहला शिष्ट मंडल था . हम साथ साथ पार्टियों में गए, हमने साथ खाया-पिया . राज कपूर और नर्गिस एक ही कमरे में ठहरे थे . जहां कहीं भी हम गए, लोग पियानो पर ‘आवारा हूं’ बजाते . कई बार राज कपूर जरूरत से ज्यादा पी लेते और उन्हे बिस्तर से खींचकर निकालना पड़ता . हम सब उनका इंतजार करते रहते और फिर दौड़ भाग करके नरगिस उन्हे तैयार करतीं .

 

सोवियत संघ में राज कपूर की तो जमकर आवभगत हुई लेकिन उनके साथ गई नरगिस को झटका लगा क्योंकि उनका स्वागत वैसा नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था . मधु जैन की किताब द कपूर्स के मुताबिक- नर्गिस के भाई उन्हें ये मनवाने की कोशिश करते कि राज कपूर उन्हे छोटे किरदार दे रहे हैं जबकि वो खुद सबकी नजरों में चढ़ रहे हैं . लेकिन जब नर्गिस का मॉस्को जाना हुआ तो उन्होंने ये मानना शुरू कर दिया कि वो ठीक कह रहे हैं . वहां वाकई उनके बारे में किसी ने पूछा तक नहीं . असल में कई लोगों ने तो ये सोचा कि वो राज कपूर की पत्नी यानि मिसेज कपूर हैं . उनके स्वाभिमान को काफी ठेस पहुंची और ये एक अंत की शुरुआत साबित हुई .

 

राज कपूर से शादी करने का रास्ता ढूंढने के लिए नर्गिस क्यों गई थी मोरारजी देसाई के पास? और फिर राज कपूर से रिश्ता तोड़कर कैसे बनी नर्गिस. मदर इंडिया ?

 

अपने भविष्य को लेकर अब नर्गिस को बेहद डर सताने लगा था. वह राज कपूर के साथ अपने रिश्ते को नाम देना चाहती थीं . उन्होने सिमी ग्रेवाल से कहा – मैं किसी और के बच्चों को अपना बच्चा मानते-मानते थक चुकी हूं . मुझे अपना घर चाहिए . मैं अपनी गोद में अपना बच्चा खिलाना चाहती हूं .

 

इस बारे में सोचकर नर्गिस बदहवास सी रहने लगी थीं . और फिर इस उलझन का हल ढूंढने के लिए नर्गिस उस वक्त बॉम्बे के मुख्यमंत्री रहे मोरारजी देसाई के पास पहुंच गईं . वही मोरारजी देसाई जो बाद में भारत के प्रधानमंत्री भी बने . कहते हैं उस समय मोरारजी देसाई हिंदू मैरिज एक्ट पर काम कर रहे थे .  नर्गिस ने उनसे मिलकर ये सलाह मांगी कि क्या कोई तरीका है जिसके जरिए पहले से शादीशुदा हिंदू शख्स दोबारा शादी कर सके ? कहा जाता है कि मोरारजी देसाई ने नर्गिस को डांटा कि वो ऐसा सोचें भी नहीं . कुल मिलाकर इस मीटिंग से नरगिस की परेशानी का कोई हल नहीं निकला .

 

नर्गिस बेहद बेचैन रहने लगी थीं. वो राज कपूर के साथ घर बसाने के सपने देख चुकी थीं . राज कपूर उनसे कहते रहते कि वो उनसे शादी करेंगे लेकिन 9 साल के लंबे रिश्ते के बाद धीरे धीरे नर्गिस को शायद ये अहसास हो चुका था कि राज कपूर अपनी पत्नी कृष्णा को कभी नहीं छोड़ेंगे . और फिर 1955 में रिलीज़ हुई राज कपूर-नर्गिस की अगली फिल्म के बाद तो इस दोनों के रिश्ते में दरारें सबको नज़र आने लगीं . फिल्म का नाम था….श्री चार सौ बीस .

 

साल 1955 फिल्म श्री 420 रिलीज़ हुई और राज कपूर-नरगिस की सबसे कामयाब फिल्म बन गई . लेकिन लेखिका किश्वर देसाई की किताब डार्लिंग जी के मुताबिक- इस फिल्म में एक बिना ग्लैमर वाले, मजबूर लड़की के रोल से नर्गिस काफी नाराज़ रही. साथ ही फिल्म में उनका रोल भी ज्यादा बड़ा नहीं था . नर्गिस को अब ये महसूस होने लगा था कि बाहर की फिल्में साइन ना करके उन्होने अपना करियर दांव पर लगाया और राज के साथ निजी जिंदगी में भी उनका रिश्ता किसी अंजाम तक पहुंचता नज़र नहीं आ रहा था . वो समझ चुकीं थीं कि अब फैसले का वक्त आ चुका है .  

 

इसके बाद नरगिस अपने बड़े भाई अख्तर हुसैन के पास पहुंची और उनसे कहा- भैया मुझे काम दिलवाइए . भाई की कोशिशों से आखिरकार उन्हें नरगिस को कुछ फिल्में मिल गईं और इन फिल्मों को साइन करने से पहले उन्होंने राज कपूर से पूछा तक नहीं जैसे कि वो अब तक पूछती आई थीं . राज कपूर को जब इस बात का पता चला तो उन्हे बहुत झटका लगा . लेकिन नर्गिस जैसे नींद से जाग उठी थीं .

 

आखिरकार 1956 में रिलीज़ हुई आरके बैनर की फिल्म जागते रहो नर्गिस और राज कपूर की जोड़ी की आखिरी फिल्म साबित हुई . इस फिल्म में नर्गिस सिर्फ फिल्म के आखिरी सीन में नजर आती हैं . और पानी के लिए भटक रहे प्यासे राज कपूर को पानी पिलाकर उनकी प्यास बुझाती हैं .

 

नरगिस राज कपूर को भूल कर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना चाहती थीं और इन्हीं कोशिशो के दौरान उनके सामने आया उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा और यादगार रोल. वो फिल्म जिसका नाम था मदर इंडिया . वो फिल्म जिसकी शूटिंग के दौरान नरगिस का करियर और जिंदगी दोनों बदलने वाले थे .

 

लेकिन राज कपूर इस बात को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं थे नरगिस उन्हें छोड़ कर आगे बढ़ चुकी हैं . उन्होने मशहूर लेखक राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानी फागुन खरीद ली . वो इस फिल्म को नरगिस के साथ बनाना चाहते थे . इस फिल्म में नरगिस को एक बूढ़ी औरत का किरदार निभाना था . लेकिन नर्गिस ने ये रोल निभाने से मना कर दिया. और उनका इंकार सुनकर राज कपूर सन्न रह गए. 

 

सन 1980 में पत्रकार सुरेश कोहली को दिए एक इंटर्र्व्यू में राज कपूर ने इस घटना को याद करते हुए कहा- उसने मुझे दोबारा धोखा दिया. जो स्क्रिप्ट में राजेन्द्र सिंह बेदी से लेकर आय़ा था उसमें बूढ़ी औरत का किरदार करने से… उसने कहा ये मेरी इमेज को खराब कर देगा और अगले दिन गई और मुझे बताए बगैर मदर इंडिया साइन कर ली . आप इसके लिए क्या कहेंगे सर?

 

पत्रकार सुरेश कोहली के मुताबिक जिस समय राज कपूर ने उनसे ये बात कही. नर्गिस को उनकी जिंदगी से गए तकरीबन बीस साल हो चुके थे लेकिन वो ऐसे बात कर रहे थे जैसे ये कल की बात हो . 1974 में कोहली को दिए एक और इंटर्व्यू में राज कपूर ने नरगिस पर और भी कई आरोप लगाए- वो चुपचाप कोल्हापुर चली गई जहां मदर इंडिया की शूटिंग चल रही थी . जब मैंने ये बात उसके सामने रखी तो बोली कि मुझे पता नहीं था कि कहानी क्या है . वाह, पिक्चर का नाम मदर इंडिया है और उसे पता नहीं था . 

 

राज कपूर यहीं नहीं रुके. इसी इंटर्व्यू में किसी दिलजले आशिक़ की तरह वो एक जुड़ी हुई चिठ्ठी निकाल लाए . ये चिठ्ठी कई टुकड़ों को जोड़ कर चिपकाई गई थी. इतनी ये चिठ्ठी दिखाकर वो पत्रकार सुरेश कोहली से बोले- दुनिया कहती है मैंने नरगिस को नाउम्मीद किया . ये तो वो थी जिसने मुझे धोखा दिया. साहिब, इसने वो किया था. हमें एक पार्टी के लिए बाहर जाना था . हम लोगों को देर हो गई थी . मैं उसके पास गया तो उसके हाथ में एक कागज़ था . मैंने उससे पूछा कि वो क्या था, वो बोली. कुछ नहीं, कुछ नहीं . उसने चिठ्ठी फाड़ दी और वापस चली गई . जब हम कार तक पहुंचे तो मैंने कहा रूमाल भूल गया हूं और वापस गया . नौकरानी ने तब तक सफाई करके टुकड़े कूड़ेदान में डाल दिए थे. मैंने वो रद्दी कागज़ों की टोकरी उठाई और अपनी अलमारी में रख दी . अगले दिन मैंने उन फटे टुकड़ों को एक साथ रखा , जोड़ा और देखा कि वह एक निर्माता की ओर से शादी का पैगाम था . उसने मुझे इसके बारे में नहीं बताया . ये उसकी ओर से धोखेबाजी की पहली हरकत थी . मैंने इस वाक्ये को हूबहू जैसा हुआ था फिल्म संगम में रखा .

 

जिस तरह नर्गिस से हुई अपनी पहली मुलाकात को उन्होने अपनी फिल्म बॉबी में दिखाया था, उसी तरह इस चिठ्ठी से मिला जख्म भी इस कदर गहरा था कि कई साल बाद उनकी फिल्म संगम में असली जिंदगी का वो जख्म पर्दे पर उभर आया .    

 

ये प्यार में चोट खाए एक प्रेमी का गुस्सा ही था जो अपनी प्रेमिका से जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था . इधर राज कपूर का ये हाल था और उधर मदर इंडिया की शूटिंग पर नर्गिस की किस्मत बदलने वाली थी . कई साल पहले फिल्म आग के दौरान उनकी जिंदगी में राज कपूर आए थे. अब 11 साल बाद एक और आग लगी और नरगिस की जिंदगी में आए सुनील दत्त .

 

वो दिन था 1 मार्च 1957 का दिन. मदर इंडिया के एक खास सीन शूटिंग एक हफ्ते से चल रही थी . नर्गिस की डुप्लीकेट भी जब इस सीन को करते हुए घायल हो गई तो नर्गिस ने इसे खुद करने का फैसला किया . सीन के मुताबिक नर्गिस आग में फंसी हुई हैं . शूटिंग के दौरान सुरक्षा का पूरा इंतजाम था लेकिन तेज़ हवा चलने लगी और हवा का रुख बदल गया . नर्गिस आग में फंस चुकी थीं .

 

इससे पहले कि कोई दुर्घटना हो पाती सुनील दत्त भागते हुए आए और आग में कूद पड़े. सुनील दत्त ने किसी तरह नरगिस को आग से बाहर निकाल लिया . दोनों काफी जल चुके थे . लेकिन उस दिन अगर सुनील दत्त नहीं आते तो कुछ भी हो सकता था . सुनील दत्त ने ना सिर्फ 28 साल की नर्गिस की जान बचाई बल्कि उनका दिल भी जीत लिया . 

 

राज कपूर ज्य़ादा लंबे कद के नहीं थे . वो करीब पांच फीट सात इंच के थे .  नर्गिस उनके साथ कभी भी ऊंची हील्स वाली सैंडल नहीं पहनती थीं. लेकिन नर्गिस की जिंदगी में सुनील दत्त के आने के बाद , उन्होने ऊंची हील्स वाली सैंडल पहनना शुरू कर दिया. क्योंकि सुनील दत्त की लंबाई करीब छ फीट की थी .

 

राज कपूर नर्गिस की ऊंची हील्स वाली सैंडल्स को कभी भूल नहीं पाए.  कई साल बाद उन्होने अभिनेत्री सिमी ग्रेवाल से कहा था- मुझे पता था कि उसकी जिंदगी में कोई ऊंचे क़द का शख्स आ गया है . मुझसे मिलने आई थी और हील में . मैं उसकी ऊंची हील्स को बीस मिनट तक घूरता रहा और फिर वो चली गई . 

 

राज कपूर के जेहन में ऊंची हील वाले सैंडल की सितम इतना ज्यादा था कि 1974 में पत्रकार सुरेश कोहली को दिए एक और इंटर्व्यू में राज कपूर ने नर्गिस के ऊंची हील वाले सैंडल का जिक्र करते हुए कहा- कोल्हापुर में मदर इंडिया की शूटिंग चल रही थी . वहां से नरगिस का ड्राइवर आया और बोला, बेबी ने अपने सैंडिल मंगवाए हैं . मैंने कहा ले जाएं . ड्राइवर फिर आया, इस बार हारमोनियम के लिए . तब मुझे समझ में आया कि सब खत्म हो चुका है . ऊंची एड़ी की सैंडल, बाजा…और सुनील दत्त छह फिट लंबे थे .

 

सुनील दत्त ने धीरे धीरे नर्गिस की जिंदगी के खालीपन को भर दिया . लेकिन राज कपूर अभी भी नर्गिस को भुला नहीं पा रहे थे . और नर्गिस को भी डर था कि उनका पुराना रिश्ता कहीं उनके नए रिश्ते पर असर ना डाल दे . इस बात को लेकर सुनील और उनके रिश्ते में भी काफी उतार-चढ़ाव आए . लेकिन दोनों एक दूसरे को बेहद प्यार करते थे और जल्द ही शादी करना चाहते थे.

 

इस दौरान राज कपूर नर्गिस से मिलने की लगातार कोशिश करते रहे . जुलाई 1957 में नर्गिस अपनी फिल्म परदेसी की शूटिंग से लौटते समय बर्लिन में थीं . उस समय बर्लिन में चल रहे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में शामिल होने के लिए राज कपूर भी वहां पहुंच गए . 6 जुलाई 1957 को लंबे समय के बाद नर्गिस और राज कपूर की मुलाकात हुई . राज कपूर ने उन्हे मनाने और उनके साथ वापस लौटने की गुज़ारिश की लेकिन नर्गिस ने उनसे साफ कह दिया कि अब वो अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुकी हैं और राज कपूर को भी अपनी पत्नी और बच्चों के पास वापस लौट जाना चाहिए . डिनर के बाद जब नर्गिस जाने लगीं तो राज कपूर ने उनसे कहा-ये साथ में हमारा आखिरी डिनर था . अब हम दोनों अपने अपने रास्ते चले जाएंगे .

 

और फिर 7 जुलाई 1957 को जब नर्गिस ने वापस लौटने के लिए फ्लाइट लेने वाली थी तो नम आंखो के साथ राज कपूर उनसे मिलने एयरपोर्ट पहुंच गए . इस घटना का जिक्र करते हुए नर्गिस दत्त ने सुनील को एक ख़त लिखा- राज कपूर बहुत चुप थे और मैं भी . मैं समझ सकती हूं कि उन्हें बुरा लग रहा होगा . मैं भी बहुत तनाव में थी . फ्लाइट का अनाउंसमेंट हुआ और हमने हाथ मिलाए . उन्होंने मुझे आने वाली जिंदगी के लिए शुभकामनाएं दीं . मैं फ्लाइट की तरफ बढ़ गई . मैंने देखा कि काफी समय तक वो मुझे देखकर हाथ हिलाते रहे . मैंने उनकी आंखों में आंसू भी देखे. मुझे भी तकलीफ हुई लेकिन जो हुआ अच्छा हुआ . मुझे इस बात खुशी है कि ये बिना किसी हंगामे के हो गया . 

 

इस घटना के करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 1958 को नर्गिस और सुनील दत्त ने शादी कर ली . जिस परिवार के सपने नर्गिस ने हमेशा देखे थे, वो सपने मिसेज़ दत्त बनकर पूरे हो गए . 

 

नर्गिस और सुनील दत्त की शादी की खबर जब राज कपूर तक पहुंची तो सबको जाहिर हो गया कि राज कपूर कभी नर्गिस को भूले ही नहीं थे . मधु जैन की किताब द कपूर्स के मुताबिक तो राज कपूर जैसे बर्बाद हो गए थे . जब उन्हें पता चला कि नरगिस ने सुनील दत्त से शादी कर ली है तो वो आपे से बाहर हो गए . वह अपने दोस्तों के सामने ही फूट-फूटकर रोने लगे . अफवाह तो ये भी थी कि उन्होंने जलती हुई सिगरेट से खुद को जलाकर ये जानने की कोशिश की कि कहीं वो कोई सपना तो नहीं देख रहे .

 

पत्रकार बनी रूबेन द्वारा लिखित राज कपूर की जीवनी में राज कपूर की पत्नी कृष्णा राज कपूर उस बुरे वक्त को याद करते हुए कहती हैं- हर रात के बाद अगली रात को वो पीकर आते रहे. वो आते और नशे में धुत्त होकर बाथटब में ढेर हो जाते और बहुत बुरी तरह रोते . रात दर रात . आपको लगता है कि मुझे लगा होगा कि वो मेरे लिए रोते थे ? नहीं बिलकुल नहीं . मुझे पता था कि वो उसके लिए रोते थे .

 

इस वाक्ये के कुछ साल बाद एक पार्टी में कृष्णा राज कपूर की मुलाकात नर्गिस से हुई . पत्रकार बनी रूबेन की किताब के मुताबिक नर्गिस उनके पास गई और उनसे माफी मांगी . इस किताब में कृष्णा कपूर कहती हैं- नर्गिस खुद इन सब बातों के साथ मेरे सामने आईं, कहने लगीं कि जो कुछ भी हुआ उसके लिए उन्हें कितना रंज है . वह सारी तकलीफों और बेइज्जती के लिए जो मुझे उनकी वजह से झेलनी पड़ी, उसके लिए अब उन्हे कितना खेद है . मैंने उन्हें बीच में ही रोका और कहा- भगवान के लिए, अब इसके बारे में और कुछ ना बोलें . अब सब खत्म हो चुका है और इसके लिए रंज करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि ये सब आपके साथ ना होता तो किसी और के साथ होता .

 

राज कपूर की जिंदगी में नर्गिस के बाद भी कुछ लव स्टोरीज़ हुईं . वहीं नर्गिस सुनील द्त के साथ अपनी जिंदगी में बेहद खुश थीं लेकिन शादी के कई साल बाद खबर आई कि नर्गिस को कैंसर है . नर्गिस की बीमारी ने पूरे दत्त परिवार को हिलाकर रख दिया . सुनील दत्त ने दुनिया के बेहतरीन डॉक्टरों से उनका इलाज करवाया लेकिन 3 मई 1981 को नर्गिस जिंदगी की जंग हार गईं .

 

3 मई 1981 को नर्गिस नहीं रहीं . उनके आखिरी सफर पर अंतिम विदाई देने वालों में राज कपूर भी थे . मधु जैन की किताब द कपूर्स में लिखा है- नरगिस की अंतिम यात्रा में राज कपूर के साथ रश्मि शंकर गईं थीं, वो याद करती हैं कि वहां बेहद भीड़ थी . हर कोई राज जी से कह रहा था कि सामने की ओर चले जाइए लेकिन वो पीछे ही रहे . कहने लगे- “यहीं से तो गुजरेंगे” फिर कहने लगे “मेरे सभी दोस्त जा रहे हैं”. उन्होने अपना काला चश्मा लगा रखा था और वो भीड़ का हिस्सा ही बने रहे . ये बेहद जज्बाती पल थे.

 

आर के स्टूडियोज़ में राज कपूर की मशहूर कॉटेज के पीछे की तरफ एक कमरा है जो कभी नरगिस का कमरा हुआ करता था . कहते हैं जब नर्गिस आरके स्टूडियो और राज कपूर की जिंदगी से निकल गई थीं तब भी कई सालों तक इस कमरे को वैसे ही रखा गया जैसा कि वो छोड़ गई थीं. उनकी याद हमेशा राज कपूर के साथ रही . ऐसी थी ये लव स्टोरी.

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मुंबई : बॉलीवुड की धक-धक गर्ल व डासिंग क्वीन के नाम से मशहूर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित ने उनके...

धर्मेंद्र ने ट्विटर पर की शुरुआत
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मुंबई : दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र ने सोशल मीडिया वेबसाइट ट्विटर पर शुरुआत की है, जिस पर बेटे...

Watch : रिलीज हुआ 'भूमि' का पहला गाना 'ट्रिप्पी ट्रिप्पी', दिखा सनी का बोल्ड अंदाज
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नई दिल्ली : संजय दत्त की आने वाली फिल्म ‘भूमि’ का पहला गाना ‘ट्रिप्पी ट्रिप्पी’ रिलीज हो...

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