Film Review: जानें कैसी है फिल्म ‘मांझी-द माउंटेन मैन’

By: | Last Updated: Friday, 21 August 2015 7:09 AM
manjhi movie review

रेटिंग-  साढ़े तीन स्टार (***1/2)

‘शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद!’ फिल्म मांझी-द माउंटेन मैन के हीरो दशरथ मांझी का तकिया कलाम है. वो जब भी ख़ुश होता है या किसी चुनौती को स्वीकार करता है तो कह उठता है ‘शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद!’ फिल्म में दशरथ का किरदार निभा रहे नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के अभिनय को सही-सही बयां करने के लिए भी यही तीन शब्द काफ़ी हैं- ‘शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद!’

 

एक कमज़ोर और बोझिल स्क्रीनप्ले में नवाज़ुद्दीन ने जान फूंकने की भरपूर कोशिश की है. अगर फिल्म के सभी पक्ष नवाज़ के परफॉरमेंस जितने मज़बूत होते तो मांझी किसी और ही स्तर की फिल्म बन सकती थी.

 

‘मांझी-द माउंटेन मैन’ दशरथ माझीं की सच्ची कहानी पर आधारित है. फिल्म की शुरुआत 1960 से होती है. बिहार के गया में दुनिया से तक़रीबन कटा हुआ गहलौर नाम का एक छोटा सा गांव है. इस गांव से बाज़ार, अस्पताल, स्कूल, यहां तक कि पीने का पानी लेने के लिए भी एक पूरा पहाड़ चढ़कर पास के वज़ीरपुर जाना पड़ता है. कई किलोमीटर की लंबी चढ़ाई वाला ये पहाड़ इनकी ज़िंदगी की सारी परेशानियों का प्रतीक है. परेशानी यहीं ख़त्म नहीं होती. उस ज़माने के दूसरे भारतीय गांवों की तरह यहां के समाज में जातीय समीकरण अपनी पैठ जमाए हैं. मांझी समाज के लोग इस समीकरण में सबसे नीचे पायदान पर आते हैं. ऊंची ज़ात वालों के लिए उनकी ज़िंदगी को कोई मोल नहीं. दशरथ (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) भी इसी मांझी समाज का हिस्सा है.

 

दशरथ अपनी पत्नी फगुनिया (राधिका आप्टे) से बेपनाह प्यार करता है. दोनों इस गांव से निकल कर शहर में नई ज़िंदगी शुरू करने का सपना संजोए हैं. लेकिन एक रोज़ पत्नी फगुनिया उसी पहाड़ से गिर जाती है. अस्पताल पहुंचते पहुंचते उसकी मौत हो जाती है. ये घटना दशरथ की झकझोर कर रख देती है. वो अपीन पत्नी की मौत का ज़िम्मेदार उस पहाड़ को मानता है और फैसला करता है कि वो इस पहाड़ को तोड़ कर इसके बीच से एक रास्ता बनाएगा ताकि गांव में किसी को भी अस्पाताल पहुंचने में देरी ना हो. अगले बाइस साल तक दशरथ मांझी अकेले छैनी-हथौड़ा लेकर उस पहाड़ से टक्कर लेता है और आख़िरकार रास्ता निकलता है.

 

एक इंसान की ज़िद और हौसले की ये सच्ची कहानी अपने आप में रोंगटे खड़े करना वाली है. ऐसा वाक़ई एक इंसान हुआ था जिसने ये कर दिखाया था, इस पर यक़ीन करना आज भी मुश्किल है. बॉलीवुड में बनने वाले बायोपिक अक्सर अपने मुख्य किरदार को सुपरहीरो सरीखा बनाकर पेश करते हैं. मांझी इस मायने में अलग है. इसमें हीरो को आम इंसान ही रहने दिया है. फिल्म में कई लम्हे हैं जो आपके साथ रह जाते हैं. फिल्म के एक सीन में दशरथ कहता है, ‘भगवान के भरोसे मत बैठो, क्या पता वो हमारे भरोसे बैठा हो’. या जब वो बड़ी उम्मीद के साथ सरकारी अफ़सर से कहता है, ‘बस, अब सब बदल जाएगा’या फिर दशरथ-फगुनिया के रोमांस वाले सीन. नवाज़ फिल्म के मामूली से मामूली सीन को भी ग़ैर-मामूली बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं. राधिका आप्टे का रोल ज़रूर छोटा है लेकिन नवाज़ुद्दीन के साथ उनकी केमेसट्री कमाल की है. फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट में तिग्मांशु धूलिया, अशरफ़ुल हक़ और प्रशांत नारायरण ने भी बहुत अच्छा काम किया है.

हालांकि यहां कहानी एक इंसान के बेमिसाल हिम्मत की है लेकिन केतन मेहता ने स्क्रीनप्ले में कई उस दौर के समाज की कई अहम बातें जोड़ने की कोशिश की हैं. जात-पात, राजनीतिक अवसरवादिता और सरकारी भ्रष्टाचार पर भी चोट की गई है.  फिल्म के एक अच्छे सीन में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गहलौर में चुनावी सभा करने पहुचीं हैं. जिस समय वो बड़े जज़्बात के साथ अपना ग़रीबी हटाओ का नारा लगा रही हैं, उसी पल स्टेज टूट जाता है. दशरथ मांझी समेत कई गांववाले आगे बढ़कर फौरन अपने कंधों पर स्टेज संभालते हैं. प्रधानमंत्री अब भी लगातार ग़रीबों का दर्द दूर करने के आश्वासन दिए जा रही हैं, और स्टेज के वज़न से गांववालों के कंधे का दर्द बढ़ता जा रहा है.

 

लेकिन ऐसे सीन कम हैं. जातीय समस्या और भ्रष्टाचार दिखाने वाले कई दूसरे सीन बेहद कमज़ोर और घिसे-पिटे हैं. फिल्म बोझिल रफ़्तार से चले जाती है, आपको पहले से अंदाज़ा होता जाता है कि अगले सीन में क्या होगा. कोई भी सीन चौंकाता नहीं. इतनी बेहतरीन कहानी के बावजूद ऐसा ना कर पाना फिल्म के लेखकों और निर्देशक की हार है. इन कमज़ोर सीन्स को नवाज़ के अभिनय के भरोसे छोड़ देना उनकी प्रतिभा के साथ नाइंसाफ़ी है. यही नहीं नवाज़ के रोल को भी बेहद सपाट लिखा गया है. पहाड़ तोड़ने के अलावा उसकी ज़िंदगी क्या थी? शुरुआत में पहाड़ तोड़ने का फैसला गुस्से में लिया गया था लेकिन बाइस साल में उसके और पहाड़ की दुश्मनी में क्या क्या बदला? अपने बच्चों के साथ उसके कैसे रिश्ते थे? रास्ता बनने के बाद क्या हुआ? कई सवाल अधूरे छूट जाते हैं.

मांझी-द माउंटेन मैन की कहानी में बहुत संभावनाएं छुपी थी, उनका पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया. लेकिन फिर भी दशरथ मांझी के असाधारण हौसले को सलाम करने के लिए और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के शानदार अभिनय के लिए इस वीकेंड मांझी देखना बुरा सौदा नहीं है. 

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