देखिए- असली मांझी की कहानी जो आपको झकझोर कर रख देगी

By: | Last Updated: Wednesday, 19 August 2015 6:05 PM
Meet the man who carved out a mountain to make a road!

नई दिल्ली: ये कहानी है एक मामूली से मजदूर दशरथ मांझी की जिसने सिर्फ दो हाथों से उस पहाड़ का सीना चीर कर रख दिया जो उसकी मोहब्बत की राह में आ खड़ा हुआ था. दशरथ मांझी का किरदार अब नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ फिल्मी दुनिया के पर्दे पर उतरने जा रहा है. फिल्म तो शुक्रवार यानी 21 अगस्त को रिलीज हो रही है लेकिन आज एबीपी न्यूज आपको असली दशरथ मांझी को सुनने-देखने और समझने का मौका दे रहा है. एक सच्ची कहानी के असली हीरो दशरथ मांझी.

‘मांझी’ एक आम फिल्म नहीं है, एक हकीकत है, एक ऐसी सच्ची कहानी है जो आज आप उस शख्स की जुबां से सुनेंगे जो खुद इस कहानी का हीरो था, असली दशरथ मांझी.  दशरथ मांझी की जुबानी उनकी ये कहानी सुनाने से पहले देखिए दशरथ मांझी कैंसर से हुई मौत के 8 बरस बाद फिर चर्चा में क्यों आ गए हैं.

 

पहाड़ का सीना पर मोहब्बत की दास्तान लिख देने की जिद इतिहास के पन्नों में खामोश पड़ी रह जाती अगर नवाजुद्दीन सिद्दीकी हाथ में छेनी और हौथड़ा लेकर उस किरदार की कहानी को दोबारा जीने की जिद ना पाल लेते. बिहार के एक मामूली मजदूर की प्रेम कहानी अखबार की चंद कतरनों में सिमट कर कहीं खो गई थी. लेकिन रुपहली दुनिया की इस बेहतरीन कोशिश ने दशरथ मांझी की भूली बिसरी कहानी को बिहार के गया जिले में फिर से तलाशने की वजह दे दी है.

 

असर ये है कि दशरथ मांझी का नाम सिर्फ फिल्मी दुनिया में ही नहीं बल्कि राजनेताओं और राजनैतिक समीकरणों के बीच भी जगह बनाता दिख रहा है.

 

तो क्या वाकई दशरथ मांझी बिहार के डीएनए का प्रतीक बन गए हैं. इसके लिए आपको बिहार के गया जिले के गहलौर गांव लिए चलते हैं जहां दशरथ मांझी ने अपनी मामूली सी जिंदगी को ऐसी कामयाबी में बदल दिया था. जिसकी कल्पना तक हम और आप नहीं कर सकते.

 

गया जिले के गहलौर गांव के करीब पहाड़ के बीचों बीच से गुजरता यही रास्ता दशरथ मांझी की पहचान है. ना बड़ी बड़ी मशीनें थीं और ना ही लोगों का साथ – दशरथ मांझी अकेले थे और उनके साथ थे बस ये छेनी, ये हथौड़ा और 22 बरस तक सीने में पलता हुआ एक जुनून. दशरथ का वो जुनून अटारी ब्लाक के गहलौर गांव के लिए एक तोहफे में बदल गया.

 

दशरथ मांझी का ये काम कितना बड़ा था ये समझने के लिए जरा इस नक्शे पर गौर कीजिए. गहलौर की जरूरत की हर छोटी बड़ी चीज, अस्पताल, स्कूल सब इस वजीरपुर के बाजार में मिला करते थे लेकिन इस पहाड़ ने वजीरपुर और गहलौर के बीच का रास्ता रोक रखा था. लोगों को 80 किलोमीटर लंबा रास्ता तय करके वजीरपुर तक पहुंचना पड़ता था. दशरथ मांझी ने इस पहाड़ को अपने हाथों से तोड़ दिया और बना दिया एक ऐसा रास्ता जिसने वजीरपुर और गहलौर के बीच की दूरी को महज 2 किलोमीटर में समेट दिया

 

लेकिन दशरथ मांझी ने ऐसा क्यों किया?  इसे समझने के लिए आपको दिखाते हैं उनकी मोहब्बत की वो कहानी जो उनके इस लंबे चौड़े परिवार में उनकी मौत के बाद भी जिंदा है.

 

1934 में जन्मे दशरथ मांझी की शादी बचपन में ही हो गई थी लेकिन दशरथ मांझी की मोहब्बत तब परवान चढ़ी जब वो 22 साल की उम्र में यानी 1956 में धनबाद की कोयला खान में काम करने के बाद अपने गांव वापस लौटे और गांव की एक लड़की से उन्हें मोहब्बत हो गई. लेकिन किस्मत देखिए ये वही लड़की थी जिससे दशरथ मांझी की शादी हुई थी.

 

दशरथ मांझी ने ये पहाड़ तोड़ने का फैसला अपनी उसी मोहब्बत यानी फाल्गुनी के लिए किया था. एबीपी न्यूज से 8 बरस पहले दशरथ मांझी ने खुद बताया था कि आखिर उनकी तकदीर में पहाड़ की दुश्मनी कैसे आ जुड़ी थी.

 

दशरथ मांझी पर बनी इस फिल्म के प्रमोशन में भी दशरथ मांझी की वो जिद नजर आती है. उनकी पत्नी फाल्गुनी का पांव फिसलता है. और फिर दशरथ पहाड़ तोड़ने के लिए निकल पड़ते हैं. जो ख्याल ही हार मान लेने को मजूबर कर देता है वो दशरथ मांझी का जुनून बन गया. दशरथ मांझी अपने जीते जी उस रात को कभी नहीं भूले.

 

दशरथ मांझी ने साल 2007 में खुद अपने इस करिश्मे की कहानी एबीपी न्यूज को सुनाई थी. तब हमने दशरथ मांझी आपके जहन में इस वक्त उठ रहे उस सवाल का जवाब भी मांगा था कि आखिर एक अकेले शख्स के लिए पहाड़ को बीच से तोड़ देना मुमकिन कैसे हुआ

 

दशरथ मांझी ने हमें बताया था कि वो हर रोज सुबह चार बजे उठते थे और 8 बजे तक पहाड़ तोड़ते थे. खेतों में मजदूरी करने के सिवा उनकी जिंदगी का सारा वक्त पहाड़ तोड़ने में ही बीतता था. लोगों ने उन्हें पागल तक कहना शुरू कर दिया था.

 

लेकिन दशरथ मांझी को उस पल का इंतजार था जब उनका ख्वाब पूरा होगा और वो वजीरपुर से गहलौर के बीच राह रोक कर खड़े पहाड़ को तोड़ नहीं देंगे.  मांझी की ये कोशिश अब कुछ ऐसी दिखती है लेकिन इसने मांझी से बहुत कुछ छीन लिया था.

 

1975 में इमरजेंसी के दौर में इंदिरा गांधी गया के दौरे पर आई थीं. दशरथ मांझी किसी तरह इंदिरा गांधी तक पहुंच गए और पहाड़ के बीच से नया रास्ता बनाने की गुहार की. कौन सुनता लेकिन तब मांझी को इंदिरा के साथ अपनी एक तस्वीर जरूर मिल गई. गांव के मुखिया को एक मामूली मजदूर की ये हिमाकत पसंद नहीं आई. उसने बदला लिया. सड़क बनाने के नाम पर सादे कागज पर अंगूठा लगवाया और उनका घर मकान सब हड़प लिया गया.

 

मांझी ने सब कुछ गंवा दिया था. उस दौर का जिक्र भी मांझी फिल्म में नजर आता है जहां मांझी आधी रात को पहाड़ की गोद में नजर आते हैं. शायद ये वही मोड़ था जब मांझी ने मदद की उम्मीद छोड़ी और खुद अपने ख्वाब को पूरा करने में जुट गए.

 

दशरथ मांझी के हथौड़े ने पहाड़ को दो हिस्सों में बांट दिया. पच्चीस फुट ऊंचा पहाड़ दशरथ मांझी के हौसले के आगे हार गया. मांझी ने 30 फुट चौड़ी और 365 फुट लंबी सड़क पर अपनी विजय गाथा लिख दी.

 

मांझी को अपने साथ हुए धोखे का मलाल रहा. उन्होंने इसकी शिकायत प्रधानमंत्री से करने की ठानी थी लेकिन दिल्ली जाने के लिए टिकट के बीस रुपये वो जुटा नहीं पाए. टीटी ने उन्हें ट्रेन से उतार दिया और तब मांझी पैदल ही दिल्ली के लिए चल पड़े. मांझी प्रधानमंत्री से तो नहीं मिल पाए लेकिन एक वो वक्त भी आया जब सत्ता उनके सम्मान में जुट गई.

 

नीतीश कुमार साल 2007 में बिहार मुख्यमंत्री थे और पहाड़ के बीच पक्की सड़क बनाने की मांग को लेकर नीतीश खुमार से मिलने पहुंचे थे. नीतीश ने उन्हें अपनी ही कुर्सी पर बिठा दिया.

 

लेकिन दशरथ मांझी के लिए ऐसे सम्मानों की अहमियत कभी नहीं रही. दशरथ मांझी के नसीब में अपने जीतेजी अपने गांव की इस नई जीवनरेखा को पूरा होते देखना नहीं लिखा था.

 

देखिए असली मांझी की कहानी

 

दशरथ मांझी ने जिस पत्नी के लिए पहाड़ तोड़ने का करिश्मा किया था वो उसे देखने के लिए जीवित नहीं थी. साल 2007 में गॉल ब्लैडर के कैंसर से जूझते हुए दशरथ मांझी ने भी 73 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन उनकी कहानी पत्थर पर लिखा इतिहास है जिसे बार बार दोहराया जाता रहेगा.

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Web Title: Meet the man who carved out a mountain to make a road!
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