मूवी रिव्यू: अच्छे सब्जेक्ट पर बनी कमज़ोर फिल्म है बदलापुर बॉयज़

By: | Last Updated: Friday, 12 December 2014 8:08 AM
Movie Review: Badlapur Boys

रेटिंग  ** (दो रेटिंग)

 

नई दिल्ली: बदलापुर बॉयज़ एक छोटे से गाव की कबड्डी टीम के संघर्ष पर आधारित है. ये फिल्म 2009 की तमिल हिट फिल्म ‘वेन्निला कबडी कुज़ू’ की रीमेक है. एक फिल्म के तौर पर बदलापुर बॉयज़ में कई खामियां हैं लेकिन जिस दौर में ‘एक्शन जैक्सन’ जैसी फिल्में बन रही हैं और बेहिसाब प्रोमोट की जा रही हैं, ऐसे समय में ऐसे विषय को चुनकर फिल्म बनाने की कोशिश की भी तारीफ़ होनी चाहिए.

 

फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के एक गांव बदलापुर की है. बदलापुर में सालों से सूखे की मार है और किसानों का बुरा हाल है. सालों तक कोशिश के बावजूद जब कोई सुनवाई नहीं होती तो एक किसान राम प्रवेश आत्मदाह कर लेता है. लेकिन शुरुआती खबरों के बावजूद नहर की बात आगे नहीं बढ़ती. इस किसान का बेटा विजय कबड्डी का बेमिसाल खिलाड़ी है. शुरुआती संघर्ष के बाद उसे राष्ट्रीय कबड्डी कोच सूरजभान सिंह (अनु कपूर) की मदद मिलती है. टीम राज्य स्तर के टूर्नामेंट में दाखिल होती है. फिर अंत तक आते-आते इस टीम को क्या-क्या कुर्बानी देनी पड़ती है और क्या इनकी मेहनत रंग लाती है?

 

फिल्म की कहानी ‘लगान’, ‘चक दे’ या ‘मैरी कॉम’ जैसी कई स्पोर्ट्स फिल्मों जैसी ही है. फिल्म के निर्देशक शैलेश वर्मा की ये पहली फिल्म है. इससे पहले वो सलमान खान की फ्लॉप फिल्म ‘वीर’ लिख चुके हैं. यहां बनी-बनाई तमिल फिल्म सामने होने के बावजूद शैलेश ने कहानी को उलझा दिया है. अच्छी शुरुआत के बाद कबड्डी के असली विषय पर आने में ये फिल्म बहुत समय लेती है. बेहिसाब भटकती कहानी में समझ में नहीं आता कि ये सामाजिक फिल्म है, लवस्टोरी या स्पोर्ट्स फिल्म. फिल्म का संगीत बहुत खराब है और पता नहीं क्यों बार-बार रोमैंटिक गीत आ जाते हैं जो बहुत अखरते हैं.

 

फिल्म के जो हिस्से अच्छे हैं वो कबड्डी और अनु कपूर के सीन हैं. सूरजभान सिंह के किरदार में अनु कपूर नैचुरल लगे हैं. ‘चक दे इंडिया’ के शाहरुख की तरह उन्हें यहां कई मिलते-जुलते सीन दिए गए हैं और वहीं सीन फिल्म का मज़बूत पक्ष हैं. विजय के लीड किरदार में निशान ने अच्छी शुरुआत की है लेकिन निर्देशक ने उनका किरदार बेहद खराब लिखा है.

 

अगर किसी बात की तारीफ़ होनी चाहिए तो वो ये हैं कि कबड्डी जैसे भारतीय और बिना ग्लैमर वाले खेल को एक फिल्म का सब्जेक्ट बनाया गया. जिस दौर में बड़े स्टार्स अपनी खराब मसाला फिल्मों को हर जगह प्रमोट करके करोड़ों की ओपनिंग लेते हैं, उस दौर में सीमित साधनों, छोटी स्टारकास्ट और कम बजट में शूट करके ‘बदलापुर बॉयज’ को रिलीज़ किया गया.

 

ये कोशिश बड़ी है, काश अच्छे सब्जेक्ट पर बनी ये फिल्म भी अच्छी होती. एक फिल्म के तौर पर ये निराश करती है.

 

 

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