मूवी रिव्यू: थ्रिलर कहानी और तब्बू की शानदार परफार्मेंस के लिए देखें ‘दृश्यम’

By: | Last Updated: Friday, 31 July 2015 6:53 AM

रेटिंग: *** (तीन स्टार)
 

‘दृश्यम’ इस बात पर मुहर लगाती है कि अच्छी कहानी फिल्म की बड़ी-बड़ी ख़ामियों को छुपा लेती है. फिल्म का फर्स्ट हाफ बेहद बोरिंग और कमज़ोर होने के बावजूद ये फिल्म कुछ अच्छे परफार्मेंस और कहानी में ट्विस्ट की वजह से सेकेंड हाफ में बेहतर और दिलचस्प हो जाती है. ये एक अलग तरह की सस्पेंस फिल्म है जहां सस्पेंस ये नहीं है कि क़त्ल किसने किया? सवाल ये है कि जुर्म किस तरह छुपाया गया और क्या सच आख़िर में सबके सामने आएगा? अंत तक आते आते ‘दृष्यम’ अलग और दिलचस्प हो जाती है.

 

फिल्म की कहानी के केन्द्र में है एक चौथी फेल, मध्यम वर्गीय मराठी शख़्स विजय सालगॉंवकर (अजय देवगन), जो अपनी पत्नी नंदिनी (श्रिया सरन) और दो बेटियों के साथ गोवा में रहता है. एक रात विजय के घर में एक हादसा होता है. दूसरी तरफ़ शहर की आई.जी मीरा देशमुख (तब्बू) का बेटा सैम अचानक गुम हो जाता है और दो हफ़्ते तक घर नहीं आता. शक की सूई विजय सालगॉंवकर और उसके परिवार की तरफ़ घूम जाती है. अब ये लड़ाई विजय और मीरा देशमुख के बीच है जहां विजय अपने परिवार को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है. दोनों के बीच चालाकियों से भरा दिमाग़ी खेल शुरू होता है और कहानी एक अनोखे अंत पर ख़त्म होती है.

जीतू जोज़ेफ़ की लिखी कहानी, दुनियाभर में चर्चित जापानी उपन्यास ‘The Devotion of Suspect X’ से प्रभावित है, हालांकि जीतू इससे इंकार करते हैं. इस पर सबसे पहले मलयालम फिल्म ‘दृष्यम’ बनी थी जिसमें मोहनलाल मुख्य भूमिका में थे. इसके बाद तमिल में ‘पापनासम’ बनी जिसमें कमल हासन की मुख्य भूमिका थी. हिंदी ‘दृष्यम’ की तुलना अगर मोहनलाल की मलयालम ‘दृष्यम’ से की जाए तो हिंदी वाली फिल्म काफ़ी बोझिल और कमज़ोर नज़र आती है.

 

फिल्म के पहले एक घंटे में जो बात सबसे ज़्यादा खलती है वो है एक आम आदमी के रोल में अजय देवगन. जहां मोहनलाल जैसे इस रोल के लिए ही बने थे, वहीं अजय मिसकास्ट नज़र आते हैं. अजय अपने ट्रेडमार्क डायलॉग डिलीवरी छोड़कर अपने किरदार को अंडरप्ले करने की काफ़ी कोशिश करते हैं. मगर चौथी-फेल केबिल ऑपरेटर और दो बच्चों के पिता के रूप में वो मिसफ़िट नज़र आते हैं. उनको लेने की वजह शायद फिल्म को अच्छी ओपनिंग दिलाना ही था.

 

दबंग आई जी अफसर के रोल में तब्बू फिल्म की जान हैं. हालांकि कई सीन में ज़बरदस्ती लाउड म्यूज़िक के साथ उनके स्लो-मोशन शॉट्स डाले गए हैं जिनकी कोई ज़रूरत नहीं थी. एक मां जिसका बेटा ग़ायब हो गया है और फिर सख़्त पुलिस अफ़सर जो हर हाल में मामले की तह तक जाना चाहती है, इन दोनों जज़्बातों के बीच जिस ख़ूबी और आसानी से तब्बू स्विच करती हैं, वो कमाल का है. हैरत है कि ऐसे परफॉरमेंस के बावजूद तब्बू के लिए ज़्यादा रोल क्यों नहीं लिखे जाते.

 

फिल्म में भ्रष्ट पुलिस अफ़सर गायतोंडे के रोल में कमलेश सावंत ने भी अच्छा अभिनय किया है. रजत कपूर का रोल छोटा है लेकिन हर सीन में वो अपनी मौजूदगी का अहसास कराते हैं. इनके अलावा श्रिया सरन, इशिता दत्ता और थोटी बच्ची मृणाल के बेहद कामचलाऊ अभनिय किया है. ऐसा लगता है कि मलयालम स्क्रीनप्ले में कई एक्टर ज़बरदस्ती फिट किए गए हैं.

 

यहां गीत गुलज़ार के हैं और संगीत विशाल भारद्वाज का और इस जोड़ी ने हमेशा की तरह अच्छे गीत दिए हैं. लेकिन यहां इन गीतों का इस्तेमाल फिल्म को दिलचस्प नहीं बनाता बल्कि ये फिल्म की धीमी रफ्तार को और धीमा करते नज़र आते हैं.

 

सिवाय सेटिंग के फिल्म का स्क्रीनप्ले पूरी तरह मलयालम ‘दृष्यम’ को फॉलो करता है. यहां नायक का परिवार एक ईसाई परिवार ना होकर एक मराठी परिवार है. इसी बदलाव के वजह से लेखक उपेन्द्र सिधए (ऐडेप्टेड स्क्रीनपेल और डायलॉग) और निर्देशक निशिकांत कामत ने कुछ नए बदलाव करने की कोशिश की है. लेकिन मूल कहानी से ज़रा भी भटके नहीं हैं.

 

किसी भी फिल्म को रीमेक करते वक़्त निर्देशक के पास पुरानी फिल्म की कुछ कमज़ोरियों को दूर करने और अपने स्टाइल की कुछ नई चीज़ें जोड़ने का मौक़ा होता है. निर्देशकर निशिकांत कामत ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की है बल्कि वो कई बार फिल्म का प्लॉट ज़रूरत से ज़्यादा समझाने की कोशिश करते हैं. मानो दर्शक खुद कुछ समझ ही नहीं सकते. उनका निर्देशन औसत है.

 

‘दृश्यम’ को इसकी कहानी के लिए देखा जाना चाहिए. पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड में बनी अच्छी सस्पेंस फिल्मों से ये एक है.

 

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Web Title: Movie Review: Drishyam
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