मूवी रिव्यू: मसान इतनी खूबसूरत है कि दो बार देखनी चाहिए

By: | Last Updated: Friday, 24 July 2015 8:43 AM

रेटिंग: **** (चार स्टार)
 

‘मसान’ शब्द के मायने श्मशान घाट के हैं. काशी (बनारस) के घाटों पर बने वो मसान जहां अंतिम संस्कार किए जाते हैं. धूं-धूं करती कई जलती चिताओं को देखकर कहा जाता है कि मरनेवाले को आख़िरकार मुक्ति मिल गई. मगर इसी आध्यात्मिक शहर में जो ज़िंदा हैं उनका क्या? जो रोज़ ज़िंदगी और उसकी जद्दोजहद से रूबरू होते हैं. जिनके साथ हादसे हुए है, जो माफ़ी मांगना चाहते हैं, पश्चाताप करना चाहते है लेकिन ग्लानि उन्हें जीने नहीं देती और इस पूरी दास्तान के बीच सपने भी हैं जो किसी भी तरह आज़ाद होना चाहते हैं. निर्देशक नीरज घेवन और लेखक वरुण ग्रोवर ने जिस मेहनत के साथ काशी का स्केच पर्दे पर उतारा है वो अब की फिल्मों में दिखाई गई काशी से बिलकुल अलग है, असलियत के बेहद क़रीब है और कौन कहता है असलियत ख़ूबसूरत नहीं होती.

फिल्म में दो कहानियां साथ में चलती हैं और अंत में एक मोड़ पर इनका संगम होता है. पहली कहानी में हैं देवी (रिचा चड्डा) जो अपने दोस्त पीयूष के साथ एक होटल के कमरे में है. अचानक पुलिस उस होटल में छापा मारती है. इस हादसे में पीयूष की मौत हो जाती है. ये हादसा देवी और बनारस के घाटों पर कर्मकांड कराने वाले उसके पिता विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) की ज़िंदगी बदल कर रख देता है. ‘छोटे शहर’ और अपने अंदर की ग्लानि से भरी देवी आखिरकार आज़ाद होने का फैसला करती है. 

 

दूसरी कहानी है बनारस में रहने वाला लड़के दीपक (विक्की कौशल) की. उसकी जाति और परिवार के लोग गंगा के घाटों पर मृत शरीर को जलाने और क्रिया कर्म का काम करते हैं. दीपक यूं तो सिविल इंजीनिरयिंग की पढ़ाई कर रहा है लेकिन वो इस काम में अपने पिता और भाई का हाथ बंटाता है. हालांकि वो भी इस ज़िंदगी से आज़ाद होकर आगे बढ़ना चाहता है. उसकी मुलाकात शालु (श्वेता त्रिपाठी) से होती है. प्यार होता है, दोनों अलग जातियों से हैं और ये मिलन आसानी से मुमक़िन नहीं है. मगर फिर भी नई ज़िंदगी के ख़्वाब सिर उठाने लगते है. और फिर अचानक…ख़्वाब चकनाचूर हो जाते हैं.

 

बेहद सरलता से निर्देशक नीरज घेवन गंभीर मुद्दों की बात करते हैं, बिना बहस के सिर्फ़ इसांनी जज़्बातों को छू जाते हैं. बनारस का जौ माहौल वो पर्दे पर उतारते हैं उसकी डीटेलिंग कमाल की है. चाहे वो चिता से आग लेकर घर का चूल्हा जलाने का छोटा सा सीन हो, या फिर प्रेमिका को खोने के बाद जब दीपक ये कहता है कि ‘हमको शायरी बहुत पसंद है…तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूं.’ कवि दुष्यंत कुमार की इस पंक्ति को फिल्म में कई बार अलग-अलग मायने मिल जाते हैं.

 

एक दृश्य में देवी अपने साथ काम करने वाले शख़्स से पूछती है, ‘आप अकेले रहते हैं?’ वो जवाब देता है, ‘मैं तो पिताजी के साथ रहता हूं, पिताजी अकेले रहते हैं’ या फिर बनारस में रहने वाला शख़्स जब अपने अंदाज़ में कहता है, ‘जो खीर नहीं खया, उसने मनुष्य योनि में होने का पूरा फायदा नहीं उठाया.’

 

वरुण ग्रोवर ने फिल्म के डायलॉग में बनारसी रंग ख़ूब भरा है लेकिन उनकी ख़ासियत ये है कि वो फिल्मी नहीं लगते. यही बात उनके गढ़े किरदारों को अलग बनाती है. फिल्म की गति धीमी है लेकिन आप इसके किरदारों के साथ जैसे उन जज़्बातों से गुज़रते हैं. फिल्म के गीत भी वरुण ने ही लिखे हैं और इनके बारे में इतना कहना काफ़ी है कि जब चार्टबस्टर और सौ करोड़ वाली फिल्मों के आइटम गीतों का शोर ज़ेहन से उतर जाएंगा तो भी मसान के गीतों का सुकून और गहराई आपको छूती रहेगी. ‘मन कस्तूरी रे…जग दस्तूरी रे…बात हुई ना पूरी रे’ ऐसे गीतों की ज़रूरत बॉलीवुड में बहुत ज़्यादा है. 

 

एक और बात इसे दूसरी फिल्मों से अलग करती है कि ये फिल्म बॉलीवुड के हीरो-हीरोइन के बंधे-बंधाए ढांचे को तोड़ देती है. ये उन चुनिंदा फिल्मों में से है जिसमें हर एक किरदार अहम है. यहां तक कि गंगा में कूद कर सिक्के निकालने वाले बच्चा झोंटा.

 

हालांकि फिल्म देखते हुए कई बार महसूस हुआ कि रिचा चढ्ढा के किरदार को और उभरकर आना चाहिए था. लेकिन उनके अभिनय में कोई कमी नहीं है. एक मजबूर पिता के रूप में संजय मिश्रा कई कमाल के सीन कर गए है. लेकिन बाज़ी मार ले गए हैं दीपक के रोल में विकी कौशल. अपने परिवार का काम, ऊंची जाति की लड़की से प्यार और एक नई ज़िंदगी के उलझनों में उलझे नौजवान के किरदार में उन्होंने जान फूंक दी है. लगता ही नहीं कि वो एक्टिंग कर रहे हैं.

 

इस फिल्म को इसलिए मत देखिए क्योंकि इसे बेहद प्रतिष्ठित कान फिल्म फेस्टिवल में अहम अवॉर्ड मिले हैं, इसलिए भी नहीं कि पूरे पांच मिनट तक लोग फिल्म ख़त्म होने के बाद वहां तालियां बजाते रहे थे, ना ही इसलिए कि फिल्म कोई ऐसी ‘आर्ट’ फिल्म है जैसी पहले कभी नहीं बनी. इसे देखिए क्योंकि सरलता से गहरी और दिलचस्प कहानी कहने की कला आजकल कम नज़र आती है. इसलिए क्योंकि ये फिल्म ‘फिल्मी’ नहीं हैं.

 

‘मसान’  में एक डायलॉग है- ‘संगम दो बार जाना चाहिए- एक बार अकेले, और दूसरी बार किसी के साथ.’

 

मसान दो बार देखनी चाहिए.

 

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Web Title: Movie Review: Masaan
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