फिल्म रिव्यू: ‘मिस्टर एक्स’ घिसी-पिटी और बकवास फिल्म है

By: | Last Updated: Friday, 17 April 2015 9:24 AM
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समीक्षक: यासीर उस्मान, सीनीयर प्रोड्यूसर

रेटिंग: एक स्टार

 

विक्रम भट्ट निर्देशित ‘मिस्टर एक्स’ के हीरो इमरान हाशमी के पास अदृश्य होने शक्ति है लेकिन इस फिल्म को झेलने वाला शायद हर दर्शक शायद यही सोचता है कि काश ये शक्ति उसके पास होती और वो थिएटर से ग़ायब हो जाता. ‘मिस्टर एक्स’ घिसी-पिटी और बकवास है. ढाई घंटे तक बिना-सिरपैर की घटनाएं आपके सब्र का बेइंतेहा इम्तिहान लेती है. फिल्म ख़त्म होने पर आप गहरी सांस लेकर कहेंगे- शुक्र है फिल्म ख़त्म हुई. 

 

रघु राठौड़ (इमरान) और सिया वर्मा (अमायरा दस्तूर) आतंकवादी विरोधी दस्ते में पुलिस अफसर हैं और एक दूसरे से प्यार करते हैं. रघु अपने डिपार्टमेंट की ही साजिश का शिकार हो जाता है और एक बम ब्लास्ट में उसे मारने की कोशिश होती है. ख़ास बात ये है कि भयानक बम ब्लास्ट में सिर्फ रघु के बाल जलते है और पास रखा फोन भी सलामत रहता है. ख़ैर रघु बच जाता है और बुरी तरह घायल अवस्था में वो एक फार्मास्यूटिकल रिसर्च सेंटर में पहुंचता है.

 

यहां उसे कोई अजीबोगरीब दवाई पिलाई जाती है जिसके बाद वो अदृश्य हो जाता है. इसके बाद उसका बदला लेने का मिशन शुरू होता है.  फिल्म का हर पक्ष इतना कमज़ोर है कि ज़ेहन में बार-बार यही सवाल आता है कि ये फिल्म आख़िर बनाई क्यों गई? हॉलीवुड के बेहतरीन स्पेशल इफेक्ट्स वाली साइंस फिक्शन फिल्में देख चुके भारतीय दर्शकों को ये फिल्म और इसकी कहानी बचकानी, सस्ती और सीग्रेड लगेगी.

 

फिल्म के डायलॉग शगुफ़्ता रफ़ीक़ ने लिखे हैं. फिल्म की हीरोइन अमायरा दस्तूर एक अहम सीन में कहती हैं- “क़ानून को अपने हाथ में मत लो” तो आप वाक़ई सोचते हैं कि क्या बोलने को कुछ भी नया नहीं था. या फिर हीरो की मौत के बाद जब वो कहती हैं “मेरा काम ही मुझे इस सदमे से बचा सकता है.” सब कुछ किसी 1970 की किसी बकवास बॉलीवुड एक्शन फिल्म के जैसा है.

 

बदले की कहानी के बीच में जब निर्देशक को कुछ समझ नहीं आता तो ज़बरदस्ती के किसिंग-सीन और बेकार के गाने ठूंस दिये जाते हैं. आमतौर पर भट्ट परिवार की फिल्मों में संगीत अच्छा होता है लेकिन ये फिल्म संगीत के मामले में भी मार खाती है. फिल्म का 3डी भी बेहद साधारण है.

 

इमरान हाशमी की तारीफ़ करनी होगी कि ऐसी फिल्म में भी वो बेहद गंभीरता से अभिनय करने की कोशिश करते नज़र आते हैं. लेकिन करने को शायद कुछ था ही नहीं. अमायरा दस्तूर का रोल काफ़ी बड़ा और अहम है लेकिन वो बिलकुल उम्मीद पर खरी नहीं उतरतीं.

 

विलेन की भमिका में अरुणोदय सिंह है लेकिन वो पुलिस अफ़सर होते हुए भी ये काम क्यों करते हैं, कहानी में समझाया ही नहीं गया. अगर आप इमरान हाशमी के दीवाने फैन हैं तो ये फिल्म देख लीजिए. वरना दूसरों के अनुभव से सबक़ लीजिए. आप काफ़ी समझदार हैं.

 

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