मूवी रिव्यूः 'फैंटम'

By: | Last Updated: Friday, 28 August 2015 6:57 AM

रेटिंग : तीन स्टार (***)

 

फिल्म ‘फ़ैंटम’ के क्लाईमैक्स में RAW के अफ़सर (ज़ीशान अयूब) कुछ नेवी अफ़सरों से पूछता है, “क्या आपको याद है 26/11 की वो रात जब कुछ लोगों ने पूरे देश को घुटनों के बल गिरा दिया था. उस रात हम सबने ख़ुद को कितना लाचार और बेबस महसूस किया था.” निर्देशक कबीर ख़ान की फिल्म फ़ैंटम का सार यही है कि अगर कुछ लोग हमारे देश में घुसकर आतंक मचा सकते हैं तो हमारे देश का सिपाही उनके देश में घुसकर इंसाफ़ क्यों नहीं दिला सकता?  अगर अमेरिका पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन को ख़त्म कर सकता है, तो भारत पाकिस्तान में जाकर वैसी कार्रवाई क्यों नहीं कर सकता?

 

दुश्मन देशों में घुसकर ख़ुफ़िया कार्रवाई के स्टोरी आयडियाज़ पर दुनियाभर में थ्रिलर फिल्में बनती रही हैं. ‘फ़ैंटम’ के स्क्रीनप्ले में कई ख़ामियां, फिल्म की रफ्तार कई जगह सुस्त है, लेकिन इन ढाई घंटों में कबीर ख़ान पाकिस्तान में छुपे 26/11 के गुनहगारों को बड़े फिल्मी अंदाज़ में सज़ा दिलवा देते हैं.

 

सैयद हुसैन ज़ैदी के उपन्यास ‘मुंबई एवेंजर्स’ पर आधारित ‘फ़ैंटम’ में भारतीय एजेंसी RAW के अधिकारी फैसला करते हैं कि एक ख़ुफ़िया एजेंट को पाकिस्तान में भेजा जाएगा ताकि वो 26/11 के ज़िम्मेदार आतंकी हारिस सईद (हाफ़िज़ सईद पर आधारित किरदार), उमवी (ज़कीउर्रहमान लखवी) और डेविड कोलमेन हेडली को ख़त्म कर दे.

 

ये तलाश पूरी होती है भारतीय सेना से निकाले जा चुके अफ़सर दानियाल ख़ान (सैफ़ अली ख़ान) पर. दानियाल अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पाना चाहता है और किसी तरह इस मिशन के लिए तैयार हो जाता है. इस काम में उसकी मदद करती है एजेंट नवाज़ मिस्त्री (कटरीना कैफ़). किस तरह एक-एक करके दानियाल देश के दुश्मनों को ख़त्म करता है और पाकिस्तान में किन मुश्किलों से उसका सामना होता है? ‘फ़ैंटम’ यही दिखाती है.

 

बड़े बजट पर खड़ी की गई इस फिल्म की शूटिंग भारत के अलावा लंदन और बेरूत में की गई है. सीरिया के सिविल वॉर की दृश्य बहुत अच्छे फिल्माए गए हैं. फिल्म में बेकार के गाने नहीं ठूसें गए हैं जिससे गंभीरता तो बनी रहती है लेकिन बड़ी ख़ामी ये है कि कई सीन जो मज़बूत हो सकते थे उन्हें बेहद मेलोड्रैमैटिक और ‘फिल्मी’ बना दिया गया है. जहां जहां भी दानियाल का प्लान फेल होता नज़र आता है वहां बड़ी आसानी से बॉलीवुड के अंदाज़ में कुछ ऐसा हो जाता कि जो उस सीन को बेहद मामूली बना देता है.

 

हॉलीवुड में ‘मिशन इंपॉसिबिल’ और ‘जेम्स बॉन्ड सीरीज़’ की कहानियां भी बेहद फिल्मी होती हैं लेकिन उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे लेखकों और निर्देशक ने हर सीन के बारे में कुछ सोचा है. इन फिल्मों के एक्शन सीन भी कमाल के होते हैं. ‘फ़ैंटम’ के एक्शन सीन्स में कुछ भी नया नहीं है. यहां तक कि क्लाईमैक्स में भी निर्देशक कुछ नया नहीं सोच पाए और हारिस सईद का ख़ात्मा बिलकुल किसी घिसी-पिटी बॉलीवुड फिल्म की तरह कर दिया.

 

कबीर ख़ान की तारीफ़ की जानी चाहिए कि फिल्म कहीं भी ‘ग़दर’ के अंदाज़ में लाउड नहीं होती, ना ही भारत-पाकिस्तान के खिलाफ़ बड़ी डायलॉगबाज़ी होती है. हालांकि फिल्म में ज़ीशान अयूब का किरदार जिस तरह बार-बार पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों को ख़त्म करने की बात करता है, वो हास्यास्पद है. लेकिऩ शायद दर्शकों की तालियों के लिए ये ज़रूरी था. फिल्म का एक ख़ास पहलू ये भी है कि यहां फिल्म का नायक एक भारतीय मुस्लिम आर्मी अफ़सर है जो पाकिस्तान में छुपे मुस्लिम आतंकियों का सफ़ाया करता है.

 

 फिल्म दोनों के नागरिकों के बेबसी की बात करती है. एक पाकिस्तानी मां (सोहेला कपूर) के बेटे को भी लश्कर के आतंकियों के साथ जिहाद में शामिल होता है और मारा जाता है.

 

दानियाल के रोल में सैफ़ अली ख़ान काफ़ी अच्छे लगे हैं. कटरीना कैफ़ अपने ‘एक था टाइगर’ के किरदार को आगे बढ़ाती नज़र आती हैं. कम से कम वहां उनके ग्लैमर की गुजाइश तो थी, यहां तो रोल की गंभीरता के लिए फिल्म में उनका कोई गीत नहीं रखा गया है. उनके किरदार और बोलने के अंदाज़ को विश्वस्नीय बनाने के लिए उन्हें इस बार पारसी बनाया गया है.

 

फिल्म में बाक़ायदा एक किरदार (सोहेला कपूर) उनसे पूछती है कि उनका लहजा अलग क्यों है? ताकि उनके साथ-साथ दर्शकों को भी जवाब मिल जाए. फिल्म में विलेन का रोल निभा रहे किसी भी शख़्स को ज़्यादा स्क्रीन टाइम या डायलॉग नहीं दिए गए हैं. उनका काम सिर्फ मरने भर का है.

 

‘फ़ैंटम’ सबसे ज़्यादा अपने स्टोरी आयडिया पर स्कोर करती है. एक फैंटेसी कि मुंबई हमले के गुनहगारों को उनके घर में घुस कर ख़त्म कर दिया गया और भारत को इंसाफ़ मिल गया अपने आप में दर्शकों को संतुष्टि देने वाला है. एक विशुद्ध, मेनस्ट्रीम, मसाला फिल्म के तौर पर कबीर ख़ान की ‘फ़ैंटम’ निराश नहीं करती लेकिन फिर भी कबीर ख़ान की पिछली सभी फिल्मों से ‘फ़ैंटम’ कमज़ोर है.

 

 

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Web Title: movie review: phantom
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