मूवी रिव्यू: रिश्तों की गर्माहट से भरी खूबसूरत फिल्म है ‘पीकू’

By: | Last Updated: Friday, 8 May 2015 8:38 AM

समीक्षक: यासिर उस्मान, सीनियर प्रोड्यूसर

रेटिंग: चार स्टार

 

शूजित सरकार की ‘पीकू’ इस साल की शायद सबसे ख़ूबसूरत हिंदी फिल्म है. ये स्क्रिप्ट राइटर जूही चतुर्वेदी और निर्देशक शूजित सरकार की हिम्मत ही कही जाएगी कि किसी भी हिंदी फिल्म में पहली बार कहानी के केन्द्र में ‘क़ब्ज़’ और ‘मोशन’ जैसी बातें रखी हैं. लेकिन फिर भी इसके किरदार, उनके जज्बात, आपसी जुड़ाव और इंसानी रिश्तों की गर्माहट आपके दिल को छू जाती है. 

 

ये कहानी है पीकू (दीपिका पदुकोण) की जो अपने पिता भासकौर बनर्जी ( जी हां वो ख़ुद को भास्कर नहीं भास्कौर कहलवाना पसंद करते हैं) के साथ दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहती है. पीकू एक कंपनी में नौकरी करती है. लेकिन उसका पूरी दुनिया अपने पिता के आस-पास घूमती है क्योंकि पिता को ना सिर्फ़ क़ब्ज़ की शिकायत है बल्कि वो चौबीसों घंटे सिर्फ इसी के बारे में बात करते हैं.

 

सुबह का नाश्ता हो या फिर डिनर टेबल की बातचीत, विषय हमेशा पेट, क़ब्ज़ और मोशन ही रहता है. एक बार बीमारी से उठने के बाद भासकौर बनर्जी अपने पैतृक शहर कलकत्ता जाना चाहते हैं, वो भी सड़क के रास्ते. हिमाचल टैक्सी सर्विस का मालिक राना चौधरी (इरफ़ान) उन्हें लेकर जाता है. फिर शुरू होता है दिल्ली से कलकत्ता का सफ़र इन दिलचस्प किरदारों के साथ.

 

ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की तरह ये फिल्म ऊपर से सरल लगती है लेकिन इसमें इंसानी भावनाओं में लिपटी हुई कई पर्तें हैं जो एक के बाद एक बस यूंही खुलती चली जाती हैं. लेखिका जूही चतुर्वेदी और शूजित सरकार ने बंगाली परिवार का सेटअप और परिवार के मुखिया के रूप में भासकौर बनर्जी का जो ख़ाका खींचा है वो कमाल का है.

 

पेट की समस्याएं और बार –बार क़ब्ज़, ईसबगोल, ‘प्रेशर’ जैसे निजी मसले किसी भी फिल्म का हिस्सा हों, ऐसा कम होता है या फिर ऐसी कॉमेडी अक्सर सस्तेपन की तरफ़ मुड़ जाती है. मगर पीकू में ना फूहड़ता है, ना सस्ता ह्यूमर. यहां ये मसले निजी नहीं हैं बल्कि लोगों को बुला बुलाकर इन मुद्दों पर बाक़ायदा डिबेट होती है और ज़िंदगी के दूसरे मसलों को इसने बड़ी चुटीले अंदाज़ में जोड़ दिया जाता है. 

 

कलाकारों में हाइपोकॉनड्रिऐक शख़्स के रूप में अमिताभ बच्चन इपने किरदार को जी गए हैं. ऋषिकेश मुखर्जी  की फिल्मों इस तरह के रोल करने में उत्पल दत्त को महारत हासिल थी लेकिन अमिताभ बच्चन ने इसे अपना आयाम दिता है. एक ऐसा किरदार जो पुरानी पीढ़ी का होते हुए भी  महिलाओं को लेकर अपनी एक अलग और बेहतर सोच रखता है और जो पुराने टेलीग्राफ़ अख़बार पढता है क्योंकि उसमें उसके शहर की खबरें हैं. 

 

चाहे मोशन ना होने पर बेचैनी का सीन हो, इरफ़ान के साथ बहस या फिर साइकिल पर कलकत्ता घूमते हुए उनका चेहरा, अमिताभ हर सीन में लाजवाब लगे हैं. टाइटल रोल में जो परिपक्वता दीपिका पदुकोण ने दिखाई है, वो नई उम्मीद जगाती है. दीपिका को शायद इसीलिए बॉलीवुड की वंबर वन अभिनेत्री कहा जाता है.

 

इरफ़ान इतनी आसानी से रोल निभाते हैं कि लगता ही नहीं कि अभिनय कर रहे हैं. छोटे से रोल में मौसमी चटर्जी भी बहुत अच्छी लगी हैं.  पीकू में कोई भारी भरकम ड्रामा नहीं है. यही सादगी इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत है. फिल्म के तीनों मुख्य किरदारों के डायलॉग और अभिनय फिल्म की जान है.

 

शूजित सरकार ने बढ़िया फिल्म बनाई है. इसे ना देखने की एक भी वजह नहीं है. इस वीकेंड सलमान ख़ान और उनके केस की चर्चाओं को भूल कर पीकू के साथ दिल्ली-कोलकाता के सफ़र पर जाइए.

 

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Web Title: Movie Review: PIKU
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