मूवी रिव्यू: साला खड़ूस

Movie Review: Saala Khadoos

रेटिंग: *** (तीन स्टार)

स्पोर्ट्स पर बनी फिल्मों में आमतौर पर हर बार खेल बदल दिया जाता है, मूल कहानी आमतौर पर एक ही रहती है बॉक्सिंग के खेल पर आधारित निर्देशिका सुधा कोंगरा की फिल्म ‘साला खड़ूस’ में भी कहानी के नाम पर कुछ भी नया नहीं है मगर आर माधवन और ख़ासौतर पर नई अभिनेत्री रितिका सिंह के ईमानदार परफॉरमेंस ने फिल्म को संभाल लिया है. उपेक्षा और राजनीति के जिन पहलुओं से भारतीय महिला बॉक्सिंग जूझ रही है, उन पहलुओं ये फिल्म छूती तो है लेकिन फिर दूसरे फिल्मी फॉर्मूलों में उलझ कर बेहद साधारण बन जाती है.


saala-khadoos3

आदी तोमर (आर. माधवन) एक चैंपियन बक्सर था जिसका करियर अपने ही कोच (ज़ाकिर हुसैन) के धोखे की वजह से ख़त्म हो गया था. अब उसे महिला बॉक्सिंग टीम का कोच बनाया जाता है. लेकिन फिर से राजनीति होती है और उसका ट्रांसफर बॉक्सिंग के मामले में कमज़ोर माने जाने वाले शहर चेन्नई में कर दिया जाता है. यहां उसे एक बॉक्सर लक्ष्मी (मुमताज़ सरकार) की बहन मधी (रितिका सिंह) में टेलेंट नज़र आता है और वो उसे बॉक्सिंग ट्रेनिग देता है. मधी और लक्ष्मी के रिश्ते में भी इस बात को लेकर दरार पड़ जाती है. लेकिन सारी मुसीबतों और विरोध के बावजूद आदी मधी को चैंपियन बनाता है.

saala-khadoos
कहानी सुनकर ही आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि ये फिल्म चक दे इंडिया, इक़बाल, मैरी कॉम जैसी ‘अंडरडॉग’ की कहानी के टेम्पलेट पर बनी है. आपको पहले से ही पता है कि अगले सीन, यहां तक कि फिल्म के अंत में क्या होने वाला है. इस फिल्म को ख़ास बना सकता था फिल्म का ट्रीटमेंट जो बेहद सपाट है. दरअसल एक स्पोर्ट्स फिल्म से शुरू होकर ये फिल्म एक लव स्टोरी बन जाती है. ये बचकाना लगता है. इसके अलावा हर स्पोर्स्टस फिल्म में खेल फेडेरेशन या असोसिएशन का अध्यक्ष ही क्यों भ्रष्ट होता है? खेल पर बनी कोई भी फिल्म उठा लीजिए, हर फिल्म में खलनायक अध्यक्ष को ही बना दिया जाता है. कई और पर्तें भी हैं जिन्हें खोला जाना चाहिए.

saala khadoods

फिल्म का मज़बत पहलू है आर माधवन और रितिका के बीच की केमेस्ट्री. माधवन का वजन बहुत ज़्यादा लगता है लेकिन अभिनय के मामले में वो बाज़ी मार गए हैं. बढ़ी हुई दाढ़ी और बालों के साथ एक सनकी कोच के रोल में वो फिट हैं. रितिका एक किकबॉक्सर हैं इसलिए जब फिल्म में बॉक्सिंग करती हैं तो अभिनय नहीं लगता. उनके अभिनय में ईमानदारी झलकती हैं. रितिका की बहन के रोल में मुमताज़ सरकार ने भी कुछ अच्छे सीन किए हैं.

saala-khadoos7

इसके अलावा नासेर और एम के रैना अपने छोटे छोटे रोल्स में छाप छोड़ते हैं. ज़ाकिर हुसैन के किरदार को बेहद एकतरफा और पूरी तरह नेगेटिव दिखा दिया है. एक पूर्व बॉक्सिंग चैंपियन और अर्जुन पुरस्कार विजेता क्यों ऐसा बन गया इसके बारे में बताने की कोई ज़रूरत नहीं समझ गई है. बॉलीवुड में बनने वाली लगभग सभी स्पोर्ट्स फिल्में इस मामले में मार खा रही हैं.

दुनिया में जितने भी चैंपियन बॉक्सर्स हुए हैं उनमें से ज़्यादातर अभावों और कड़े संघर्षों में पल कर चैंपियन बने. ‘साला खड़ूस’ की कहानी में भी किरदार और उसकी शुरुआत बिलकुल सटीक हैं मगर फिर ये फिल्म पुराने ट्रीटमेंट से ऊपर नहीं उठ पाती.

Bollywood News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: Movie Review: Saala Khadoos
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017