मूवी रिव्यू: ‘ये आवाज़ तो एक कुत्ते के मुंह से भी अच्छी लगेगी’, अमिताभ की आवाज को सलाम है शमिताभ

By: | Last Updated: Friday, 6 February 2015 7:16 AM
Movie Review: Shamitabh

रेटिंग:    *** (तीन स्टार)

 

‘ये आवाज़ तो एक कुत्ते के मुंह से भी अच्छी लगेगी’. ये डायलॉग फिल्म में अहंकार से भरा हुआ अमिताभ सिन्हा (अमिताभ बच्चन) अपनी आवाज़ की तारीफ़ में बोलता है. कुल मिलाकर फिल्म शमिताभ इसी बुलंद और खूबसूरत आवाज़ को एक ट्रिब्यूट है. निर्देशक आर. बल्कि अपनी पिछली दोनों फिल्मों (चीनी कम और पा) की तरह यहां भी एक ज़बरदस्त आयडिया तो लाए हैं, लेकिन दो लाइन के आयडिया पर दो घंटे की फिल्म बनाने के लिए जो सामान चाहिए (स्क्रिप्ट, स्क्रीनप्ले) वो कम पड़ा गया है. यही वजह है कि अमिताभ, धनुष और अक्षरा के बढ़िया परफॉरमेंस के बावजूद फिल्म औसत दर्जे से ऊपर नहीं उठ पाई है.   

 

दानिश (धनुष) अपने गांव से एक सुपरस्टार बनने की चाहत लिए बॉलीवुड आता है लेकिन अच्छा एक्टर होने के बावजूद परेशानी ये है कि वो बोल नहीं सकता. एक असिस्टेंट डायरेक्टर अक्षरा (अक्षरा हासन) उसकी मदद करने का फैसला करती है. दूसरी तरफ़ शहर के कब्रिस्तान में एक शराबी अमिताभ सिन्हा (अमिताभ बच्चन) रहता है जो सालों पहले एक्टर बनने का सपना लिए बंबई आया था. मगर उसकी आवाज़ की वजह से उसे हर जगह रिजेक्ट कर दिया गया था. अब वो दिन-रात शराब में डूबा रहता है. क़िस्मत दानिश और अमिताभ को मिलाती है और अमिताभ दानिश की प्लेबैक आवाज़ बन जाता है. दोनों के नाम को मिलाकर एक नया नाम शमिताभ बनता है. लेकिन जैसे ही शमिताभ सुपरस्टार बनता है, दोनों के अहं में ज़बरदस्त टकराव होता है.

अमिताभ को लगता है कि दानिश को कामयाबी सिर्फ़ उसकी आवाज़ की वजह से मिली है, जबकि दानिश का मानना है कि उसके चेहरे और एक्टिंग की वजह से अमिताभ की आवाज़ को पहचान मिली है. अपनी आवाज़ को व्हिस्की और दानिश को को पानी बताते हुए अमिताभ कहता है ‘Paani needs whiskey, whiskey को ज़रूरत नहीं किसी की’. ये टकराव ही फिल्म शमिताभ की जान है.

 

फिल्म में अमिताभ बच्चन ज़बरदस्त फॉर्म में हैं. ख़ासतौर पर जब अपनी आवाज़ की बात करते हुए वो कहते हैं ‘मेरे बेस (आवाज़) के साथ इसका फेस नहीं चलेगा’ या फिर जब वो म़ुगले-ए-आज़म का डायलॉग बोलते हैं तो एक बार फिर साबित हो जाता है कि वाक़ई इतनी बेहतरीन आवाज़ हिंदी सिनेमा में दूसरी नहीं है. लेकिन क्या इस फिल्म का मक़सद सिर्फ़ अमिताभ की आवाज़ सुनाना है? ये काम तो उनकी अनगिनत फिल्में पहले ही कर चुकी हैं. अमिताभ फिल्म के कई सीन में शराबी और अग्निपथ की याद दिलाते हैं. शमिताभ उनकी पिछले कुछ सालों में रिलीज़ हुई उन चंद फिल्मों में से है जो उनकी कॉमेडी टाइमिंग का सही इस्तेमाल करती है.

 

अब बात धनुष की जो फिल्म में एक शब्द तक नहीं बोलते लेकिन किसी भी सीन में वो अमिताभ के सामने कमज़ोर नहीं पड़े. ये अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. यही बात अक्षरा हासन पर भी लागू होती है. हालांकि उनका किरदार बेहद कमज़ोर लिखा गया है. वो क्यों दानिश की मदद करने का फैसला करती हैं? उनका किरदार चाहता क्या है? ये सब बताया नहीं गया लेकिन फिर उन्होंने अपने सीन्स को ख़ास बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. 

 

निर्देशक आर.बाल्कि पहले भाग में तो स्टोरी आयडिया के तार को ही खींचते रहते हैं. लेकिन इंटरवल के बाद ये तार टूट जाता है और जब कहानी के केन्द्र में दोनो का अहंकार आता है तो स्क्रिप्ट पूरी तरह बहक जाती है. कई सीन रिपीट लगते हैं और कहानी आगे नहीं बढती. फिल्म में दोनों मुख्य किरदारों के बीच के जज़्बाती सीन कमज़ोर लिखे गए हैं और ख़ासतौर पर इन सीन में पूरा ध्यान सिर्फ अमिताभ की आवाज़ पर लगा रहता है. फिर अंत भी काफ़ी नीरस और प्रिडिक्टेबिल है और मनोज कुमार की मशहूर फिल्म ‘शोर’ से प्रेरित लगता है.

 

फिल्म में फिनलैंड के डॉक्टर दानिश की आवाज़ के लिए जो तकनीक बताते हैं वो बेहद बचकानी है. लेकिन अमिताभ और धनुष की केमेस्ट्री बाल्कि की कई ख़ामियों को छुपा लेती है. फिल्म में अमिताभ का गाया गीत ‘पिडली’ काफ़ी अच्छा लगता है और इसका फिल्मांकन भी काफी नया है जो अपने आप में बॉलीवुड के गीतों के फिल्मांकन पर स्पूफ़ है.

 

फिल्म के एक सीन में सुपरस्टार शमिताभ (धनुष) को अवॉर्ड देने अभिनेत्री रेखा मंच पर आती है. अवॉर्ड देते हुए वो बड़े प्यार से धनुष को देखती हुई कहती हैं, ‘मुझे तुमपर गर्व है, इस खूबसूरत आवाज़ को बचा कर रखना…तुम वाक़ई भगवान का दिया तोहफ़ा हो…’ फिर रेखा एक सेकंड के लिए रुकती हैं… ‘सिनेमा के लिए’. फिर अमिताभ बच्चन की आवाज़ गूंजती हुई रेखा को थैंक्यू कहती है.

 

दर्शकों को रेखा-शमिताभ के इस पूरे सीन का मतलब समझ में आ जाता है और थिएटर में तालियां बज उठती हैं. ऐसे ही कुछ और सीन हैं जो अमिताभ बच्चन के टैलेंट को अपने तरीक़े से सलाम करते हैं. काश फिल्म स्टोरी आयाडिया के अलावा भी स्क्रिप्ट भी मेहनत हुई होती तो ये अमिताभ की बेहतरीन फिल्मों में शुमार होती. मगर फिर भी अमिताभ बच्चन के फैन्स को एक बार ये फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए.

 

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