मूवी रिव्यू: फिल्म कम और टीवी सीरियल ज़्यादा लगती है 'दि शौकीन्स'

By: | Last Updated: Saturday, 8 November 2014 8:29 AM
movie review the shaukeens

फिल्म का नाम: ‘दि शौकीन्स’

रेटिंग: दो स्टार

समीक्षक: यासिर उस्मान

 

दि शौकीन्स 1982 में रिलीज़ हुई बासु चटर्जी की मज़ेदार फिल्म शौकीन की रीमेक है. उस फिल्म में अशोक कुमार, उत्पल दत्त और ए के हंगल बुढ़ापे के अकेलेपन से निपटने के लिए गोवा की रंगीनियों में जाते हैं जहां उनका मक़सद खूबसूरत रति अग्निहोत्री के साथ वक़्त बिताने का होता है. फिल्म दि शौकीन्स में भी कहानी बिलकुल यही है बस बदलते दौर के साथ खुलापन बढ़ गया है. पुरानी शौकीन की कॉमेडी में थोड़ी-बहुत मासूमियत बरक़रार थी, यहां हास्य ज्यादा है और कहानी की रफ्तार धीमी.

 

 

कहानी

दिल्ली में तीन दोस्त लाली (अनुपम खेर), पिंकी(पीयूष मिश्रा) और के.डी (अन्नू कपूर) 60 की उम्र पार कर चुके हैं. उनके बच्चे भी अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हैं. ऐसे में अकेलापन उन्हें परेशान करता है. वो अपनी जवानी फिर से जीना चाहते हैं. दिल्ली में उनके परिवार के रहते ऐसा मुमकिन नहीं. इसलिए तीनों मॉरीशस पहुंचते हैं जहां उनकी मुलाकात बिंदास आहना (लीज़ा हेडन) से होती है. आहना फिल्म स्टार अक्षय कुमार की दीवानी है और अक्षय भी शूटिंग के लिए मॉरीशस में ही है. लिहाज़ा तीनों बुढ्ढे तिकड़म भिड़ा कर किसी भी तरह आहना की मुलाक़ात अक्षय से करवाने की कोशिश करते हैं. उन्हें लगता है कि अगर वो ऐसा कर पाए तो आहना उनकी कोई भी तमन्ना पूरी करने को तैयार हो जाएगी. इस चक्कर में तीनों दोस्तों में आपस में भी मुक़ाबला शुरू हो जाता है.

 

ख़ास बात ये है कि अच्छी कहानी के बावजूद फिल्म देखने की वजह तीनों मुख्य अभिनेता नहीं बल्कि छोटे से रोल में अक्षय कुमार हैं. अक्षय आते हैं तो फिल्म में मज़ा आ जाता है. अक्षय एक ऐसे सुपरस्टार के रोल में जो अपनी मसाला इमेज से परेशान है और नेशनल अवॉर्ड जीतना चाहता है. इस रोल में अक्षय कुमार ने अपनी ही इमेज का भरपूर मज़ाक उड़ाया है और उनके सीन ही फिल्म की जान हैं. फिल्म में उनपर तीन गीत भी फिल्माए गए हैं जिनका फिल्म कहानी से कोई लेना-देना नहीं है. बेहतर होता कि उनका रोल ही बढ़ा दिया जाता.

 

बुढ़ापे में रंगरेलियों का आस लगाए तीनों किरदारों के पास हंसाने के लिए कई सीन थे. लेकिन अनुपम खेर ने ऐसा कुछ नहीं किया है जो वो पहले नही कर चुके हैं, अन्नू कपूर ओवरएक्टिंग का शिकार हुए हैं. कहीं कहीं वो अपने विकी डोनर वाले किरदार को ही आगे बढ़ाते नज़र आए हैं. सबसे अच्छा काम पीयूष मिश्रा का है जिन्होंने दिल्ली के मसाला व्यापारी की भूमिका में जान डाली है. लीज़ा हेडेन बहुत अच्छी लगी हैं हालांकि अभिनय के नाम पर उन्होंने कुछ किया नहीं है. पुरानी शौकीन की हीरोइन रति अग्निहोत्री को भी एक छोटा सा रोल दिया गया है जो समझ में नहीं आता.

 

कुल मिलाकर रफ़्तार और कॉमेडी के स्तर पर दि शौकीन्स फिल्म कम और टीवी सीरियल ज़्यादा लगती है. फिल्म के डायलॉग और स्क्रीनप्ले तिग्मांशु धूलिया ने लिखे हैं और कहीं कहीं ये हंसाते भी हैं लेकिन ह्यूमर के मामले में ये रीमेक पुरानी शौकीन से आगे नहीं बढ़ पाई.

 

निर्देशक अभिषेक शर्मा ने इससे पहले एक बढ़िया फिल्म तेरे बिन लादेन निर्देशित की थी. उनकी तारीफ़ करनी होगी कि दि शौकीन्स में उन्होंने इस बात का ख़याल रखा है कि फिल्म के ट्रीटमेंट में कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता ना ज़ाहिर हो. लेकिन इतने रंगीन सब्जेक्ट और लीज़ा हेडेन के बावजूद फिल्म कई जगह नीरस हो जाती है. अच्छे अभिनेताओं के बावजूद ये एक कमज़ोर फिल्म है जिसमें देखने लायक सिर्फ अक्षय कुमार का 15-20 मिनट का रोल ही है.

 

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