मूवी रिव्यू: अच्छे स्टारकास्ट के बावजूद बकवास फिल्म है 'उंगली'

By: | Last Updated: Friday, 28 November 2014 7:58 AM

रेटिंग:      ** (दो स्टार)

 

उंगली सिर्फ़ एक बात बताती है कि अच्छी फिल्म बनाने के लिए सिर्फ़ अच्छा आयडिया काफ़ी नहीं है. भ्रष्टाचार पर आधारित इस फिल्म का कॉन्सेप्ट काफी प्रासंगिक औक सामयिक है, लेकिन फिल्म बहुत बचकानी बनाई गई है. निर्देशक रेंज़िल डिसिल्वा इससे पहले क़ुर्बान जैसी बेहूदा फिल्म बना चुके हैं. तय करना मुश्किल है कि कुर्बान और उंगली में से ज़्यादा बकवास कौनसी फिल्म है.

 

अभय (रणदीप हुडा), माया (कंगना रानौत),  तीस्ता (नेहा धूपिया) और कलीम (अंगद बेदी) चार दोस्त हैं जिन्होंने करप्शन से लड़ने के लिए अपना गैंग बनाया है. इस गैंग का नाम है उंगली और इस गैंग का पसंदीदा डायलॉग है- ‘जब घी सीधी और टेढ़ी दोनों उंगली से न निकले तो बीच का रास्ता अपनाना पड़ता है.’ दरअसल इस गैंग को बनाने के पीछे इन चारों का मक़सद अपने दोस्त (अरुणौदय सिंह) के साथ हुई नाइंसाफी का बदला लेना है जो एक भ्रष्ट बिज़नेसमैन की वजह से मौत की कगार पर पहुंच चुका है.

 

इस गैंग के काम करने का तरीक़ा बेहद अलग है ये करप्ट लोगों को दिलचस्प सज़ाएं देते हैं. मसलन एक रिश्वतखोर पुलिसवाले को नोट खिलाते हैं और वीडियो शूट करके अलग-अलग चैनलों को भेज देते हैं और वो चैनल उन्हें चला भी देता है. पुलिस डिपार्टमेंट इस गैंग से निपटने के लिए अफ़सर निखिल (इमरान हाशमी) को लगा देता है लेकिन वो भी इस गैंग से प्रभावित होकर उनके साथ हो जाता है. अब इस गैंग को पकड़ने की ज़िम्मेदारी है एसीपी काले (संजय दत्त) की.

 

जैसा कि पहले बताया कि कि कॉन्सेप्ट वाक़ई दिलचस्प था और इसपर बेहतर फिल्म बनाई जा सकती थी बशर्ते कि लेखक और निर्देशक रेंज़िल डिसिल्वा मेहनत कर पाते. कई बार इसमें भ्रष्टाचार पर लेक्चरबाज़ी है तो कई जगह फूहड़ कॉमेडी करने की कोशिश की गई है.

 

फिल्म के डायलॉग्स के बारे में अलग से लिखना ज़रूरी है. करप्शन जैसे सब्जेक्ट पर बनी फिल्म के डायलॉग इतने घटिया और बचकाने हैं कि सुनकर लगता है ज़बरदस्ती दर्शकों को ही उंगली की जा रही है. मिसाल के तौर पर संजय दत्त के किरदार का नाम काले हैं तो डायलॉग है ‘आप काले हैं तो ये दिलवाले हैं.’ या फिर ‘आंसू से सिर्फ़ व्हिस्की डायल्यूट होती है’…फिल्म का कूड़ा करने की बड़ी ज़िम्मेदारी निर्देशक डिसिल्वा के साथ साथ डायलॉग लेखक मिलाप ज़ॉवेरी पर भी आनी चाहिए.

 

फिल्म में इमरान हाशमी वैसे ही लगे हैं जैसे वो हर फिल्म में लगते हैं हैं और हां उनका किसिंग सीन भी है. रणदीप हुड्डा और संजय दत्त को देखकर ऐसा लगता है जैसे उनसे ज़बरदस्ती इस फिल्म में काम करवाया गया हो और वो जल्द से जल्द शूटिंग खत्म करके भागना चाहते हैं. कंगना रानौत कहने को तो फिल्म की हीरोइन हैं लेकिन उनका रोल बहुत छोटा है. नेहा धूपिया के सीन उनसे ज़्यादा हैं. 

 

अच्छे स्टारकास्ट के बावजूद ये फिल्म असर नहीं छोड़ती. करण जौहर ने भी स्टोरी आयडिया सुनकर उंगली के निर्माण की रज़ामंदी दी होगी. काश वो फिल्म बनते वक्त भी इसपर ध्यान दे देते तो आज इस बकवास फिल्म पर उंगली ना उठती.

 

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Web Title: Movie Review: Ungli
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