मेरी कलम के साथ ही शुरू होती है मेरी सोच: गुलज़ार

By: | Last Updated: Thursday, 21 May 2015 7:48 AM

कोलकाता: बीते पचास से भी ज्यादा वर्ष से शायरी और फिल्मी गीत लिख रहे गुलज़ार वैसे तो आधुनिक पीढ़ी के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि वह कलम से कागज पर लिखने की अपनी पुरानी आदत को नहीं बदल सकते.

 

गुलज़ार से जब पूछा गया कि क्या उन्होंने कंप्यूटर और टैबलेट पर लिखना शुरू किया है, तो उन्होंने बताया, ‘‘मेरी सोच मेरी कलम के साथ ही शुरू होती है. इसलिए दूसरे लोगों से पीछे छूटे बिना, मैं कागज-कलम वाले अपने तरीके का ही इस्तेमाल करता हूं.’’ कोलकाता की यात्रा के दौरान अपने हाथों से लिखी नोटबुक दिखाते हुए 80 वर्षीय गुलज़ार ने कहा, ‘‘मैं उर्दू में लिखता हूं और सबकुछ मेरे अपने हाथ का लिखा है. आप लोग कंप्यूटर पर लिखते हो . मैं उसका सम्मान करता हूं.’’

 

संपूर्ण सिंह कालरा के रूप में जन्मे गुलज़ार ने 60 के दशक में एक हिंदी फिल्म के गीतकार के तौर पर अपने करियर की शुरूआत की थी. समय बीतता गया लेकिन नई पीढ़ी के लोगों की संवेदनाओं पर उनकी पकड़ मजबूत बनी रही. यहां तक कि उन्होंने बॉलीवुड के लिए ‘कजरारे’ और ‘बीड़ी जलाई ले’ जैसे आइटम नंबर भी लिखे. हॉलीवुड की फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के लिए उनके लिखे गीत ‘जय हो’ ने उन्हें और ए आर रहमान को ऑस्कर और ग्रैमी पुरस्कार दिलवाया. गुलजार कहते हैं, ‘‘मैं इस पीढ़ी के साथ चल रहा हूं और इस पीढ़ी के साथ मेरा एक ताल्लुक है. मैं बीते दौर में नहीं जीता.’’

 

हालांकि गुलज़ार ने अपनी रचनात्मकता को व्यक्त करने के लिए कभी डिजीटल उपकरणों के इस्तेमाल की कोशिश नहीं की लेकिन वह तकनीकी रूप से बिल्कुल ही अक्षम किसी अन्य बुजुर्ग व्यक्ति की तुलना में कहीं आगे हैं. गुलज़ार कहते हैं, ‘‘मिसाल के तौर पर, चिट्ठी-पत्र का जो काम आप कंप्यूटर पर करते हैं, मैं उसे जानता हूं. मैं अपने ईमेल पढ़ता हूं और उनका जवाब भी देता हूं. मैं जो कुछ कर सकता हूं, वो मैं करता हूं. कंप्यूटर के अस्तित्व से मुझे इंकार नहीं है.’’

 

जब पढ़ने की बात आती है, तब भी गुलजार वास्तविक किताब (ई-बुक नहीं) को ही पढ़ना पसंद करते हैं. वह कहते हैं, ‘‘मैं किताबें पढ़ता हूं, वास्तविक किताबें. मैं उनके साथ सहज महसूस करता हूं. मैं उन्हें अपने साथ रख सकता हूं. यह मेरी आदत है. मैं आपसे यह उम्मीद नहीं कर रहा कि आप भी ऐसा ही करें. मुझे इसकी :ई-बुक पढ़ने की: आदत नहीं है लेकिन यह शायद ज्यादा आसान है.’’ ‘आंधी’, ‘खुशबू’, ‘मौसम’ और ‘अंगूर’ जैसी हिंदी फिल्मों का निर्देशन कर चुके गुलज़ार बदलते दौर के साथ समकालीन बने रहने के लिए युवा पीढ़ी का हाथ थामते हैं और उनका अनुसरण करते हैं.

 

वह बताते हैं कि उन्होंने किस तरह अपने पोते से मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना सीखा. गुलज़ार कहते हैं, ‘‘युवा पीढ़ी मेरा नेतृत्व कर रही है. एक समय था, जब मैं उनका हाथ पकड़ता था, आज वे लोग मेरा हाथ थाम रहे हैं.’’ वर्ष 1934 में झेलम :अब पाकिस्तान: में जन्मे गुलज़ार का परिवार बंटवारे के बाद भारत आ गया था. बीते दौर की यादें सोच पर हावी होने की बात पूछे जाने पर गुलज़ार ने कहा, ‘‘बंटवारा मेरी जिंदगी में हुआ लेकिन क्या आपको लगता है कि मुझे बंटवारे के दौर में ही जीते रहना चाहिए? मैंने उसे देखा है लेकिन चूंकि भारत आगे बढ़ गया है, एक पूरी पीढ़ी आगे बढ़ गई है, मैं भी आगे बढ़ रहा हूं. मेरे बीते दौर में जीते रहने का कोई मतलब नहीं है लेकिन उस बीते दौर से इंकार भी नहीं किया जा सकता.’’

 

अंत में विदा लेते हुए गुलज़ार कहते हैं, ‘‘आप अपने बीते दौर को अपने साथ रखते हैं क्योंकि आपका मौजूदा दौर बीते दौर से आता है लेकिन आप उस बीते दौर के साथ जी नहीं सकते.’’

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Web Title: My thinking process starts with my pen: Gulzar
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