...तो इसीलिए नरेंद्र मोदी हैं साल 2014 के व्यक्ति विशेष

By: | Last Updated: Wednesday, 31 December 2014 3:31 PM
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जोशीला लहजा, इमोशन में लिपटी हुए जुबान और सधा हुआ बॉलीवुड का अंदाज. नरेंद्र मोदी की डॉयलॉग डिलीवरी हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की याद दिलाती है. बड़ी-बडी बातों और मुद्दों को बेहद आसान शब्दों में जनता तक पहुंचाने की मोदी की महारत ही उन्हें दूसरे नेताओं से आगे ले जाती है. तमतमाए चेहरे के साथ जब वह मंच पर प्रकट होते हैं तो टीवी के कैमरे उनके चेहरे के भावों को लोगों के और नजदीक पहुंचा देते हैं. हाथों के इशारे. चेहरे पर तेजी से बदलते भाव और उनकी भाषा का ठेठ देसी अंदाज सुनने वालों के जहन पर सीधी चोट करता है और मोदी की यही चोट सीधे वोट में तब्दील होती रही है. हाल ही में हुए झारखंड और जम्मू कश्मीर के चुनाव से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव तक नरेंद्र मोदी कामयाबी का सूरज बन कर सत्ता के आसमान पर चमक रहे है और इसीलिए वे बन गए है साल 2014 के व्यक्ति विशेष. 

लोकसभा चुनाव में जीत के बाद से मोदी का विजय रथ राज्यों में भी धूम मचा रहा है. लेकिन अच्छे दिनों की आस के जिस रथ पर सवार होकर मोदी प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे है उन दिनों को लेकर सवाल आज भी बना हुआ है. आज हम आपको बताएंगे मोदी कैसे साल 2014 के बने व्यक्ति विशेष. साथ ही यह भी बताएंगे कि घट रही है या फिर बढ रही है विकास पुरुष मोदी की इमेज.

लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी रैलियों में लोगों से तीन सौ कमल मांग रहे थे. यानी बीजेपी के लिए 300 सीटों का बहुमत. जबकि इस चुनाव में बीजेपी करीब 400 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही थी. ऊपर से एनडीए के पूर्व घटक दल भी बीजेपी के खिलाफ चुनाव में मोर्चा संभाले हुए थे. ऐसे में राजनीति के जानकारों के सामने भी ये सवाल बेहद बड़ा था कि क्या 2014 का लोकसभा चुनाव जीत कर मोदी बन जाएंगे प्रधानमंत्री. वैसे भी मिशन 272 प्लस के सफर में नरेंद्र मोदी की राह में बीजेपी के अंदर और बाहर कई रुकावटें सीना ताने खड़ी थी. लेकिन मोदी ने विकास के मुद्दे को घातक हथियार बना कर सत्ता का सबसे बड़ा किला जीत लिया और वो बन गए साल के व्यक्ति विशेष. 

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मोहन ने बताया कि इस साल जो उनकी उपलब्धियां है और जिस जगह पर वे आए हैं गुजरात से निकल कर पूरे देश में और देश से भी उपर उठ कर हिंदुस्तान के बाहर जो उनकी छवि पहुंची है और जिस तरह की उपलब्धियां हासिल की है उन्होंने चुनाव में इवेन सरकार में पार्टी संगठन में एनडीए में नेशनल पॉलिटिक्स में वह अपने आप में काफी महत्वपूर्ण हैं और किसी भी व्यक्ति के लिए एक साल में इतनी उपलब्धि पाना उसको मैन ऑफ इयर निश्चित रूप से.

राजनीतिक विश्लेषक कंचन गुप्ता बताते हैं कि लीडशिप क्राइसिस जो है अब नजर में नहीं आता है. मुझे तो लगता है कि इतना दमदार नेता जो अपने प्रजेंस को एसर्ट कर सके. ये सालों के बाद अर्से के बाद भारत में ऐसी स्थिती आई है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजेपी के लिए इन दिनों मसीहा बन चुके हैं. लोकसभा चुनाव में जीत दिलाने के बाद सात राज्यों में हुए चुनावों में बीजेपी पूरी तरह से मोदी के करिश्में पर ही उम्मीद लगाए बैठी थी. महाराष्ट्र और हरियाणा का चुनाव तो खुद नरेंद्र मोदी के लिए भी बेहद खास बन चुका था क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद ये चुनाव उनके लिए सबसे बड़ी परीक्षा था और इस परीक्षा में भी नरेंद्र मोदी पास हो गए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अपनी पार्टी बीजेपी को सत्ता की बुलंदियों पर पहुंचा दिया है लेकिन देश के प्रधानमंत्री के तौर पर उनका इम्तिहान अभी बाकी है. मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से त्रस्त आम जनता ने अच्छे दिनों की आस में मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाया है. औऱ यही वजह है कि आज मोदी सरकार के हर एक कदम पर देश ही नहीं दुनिया भर की निगाहें टिकी हुई हैं.

राजनीतिक विश्लेषक अशोक वानखेड़े ने कहा कि तेल के दाम कम होने के बाद भी इस देश की महंगाई होलसेल प्राइज इंडेक्स कम हो सकता है रिटेल प्राइस इंडेक्स में अभी भी तकलीफ है. आज भी सब्जियां उतनी ही महंगी है आज भी रोजमर्रा की चीजें उतनी ही महंगी है. और ये कोई भी सरकार एक दिन में नहीं कर सकती लेकिन इन्होंने किया. इन्होंने तो 14 लाख रुपये हर आदमी के बैंक में डालने की बात कही थी. ऐसी कई चीजे है जो कही थी लेकिन हीं कर पाए.

राजनीतिक विश्लेषक कंचन गुप्ता ने कहा कि ये कहना कि सरकार कुछ कर नहीं रही है ये मेरे ख्याल से गलत है. महंगाई दर मेरे ख्याल से जीरो पर्सेटं पर आ गई है. अपने यहां पर एक जो बिजनेस का वातावरण होता है. जो एक विश्वास पैदा करना जो निवेशकारी होते हैं उनमें. तो समय लगेगा. दस साल में जो स्थिती बनी है उसको फिर से संवारना, नए रास्ते पर लाना. ये रात भर में नहीं हो सकता है इसको समय लगेगा.

गुजरात में जीत की हैट्रिक लगाने के बाद से ही मोदी देश के आगे विकास का मुद्दा उछालते रहे हैं. खास बात ये है कि ये वो वक्त था जब बीजेपी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनाया था. लेकिन इससे पहले ही मोदी अपना होमवर्क पूरा कर चुके थे. वो जहां गुजरात में सदभावना यात्रा पर निकले वहीं 2012 के गुजरात विधानसभा चनाव में उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों को ज्यादा हवा दी ताकि खुद को राष्ट्रीय नेता के तौर पर पेश कर सकें. गुजरात में तीसरी जीत के बाद मोदी ने जो भाषण दिया था उसमें भी देश को संबोधित करते हुए उन्होंने विकास के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था. हांलाकि उन दिनों अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन ऊफान पर था और देश में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका था. 

मोदी ने कहा था सारे देश में गुड गवर्नेंस और डेवलपमेंट के लिए दबाव पैदा होना चाहिए. देश की सरकारों को देश के राजनीतिक दलों को खोखले वादे से निकलकर के हर किसी के हाथ में जनता की आकांक्षाओं और जरुरतों को पूरा करने के लिए कोशिश करना चाहिए अगर देश के राजनीतिक दल देश के नेता आज जो विकास की भूख पैदा हुई है सामान्य मानवीय सुशासन के लिए लालायित हुआ है. इस समय लोकतंत्र की भलाई इसी में है कि हम जनता की आशाओं और आकांक्षाओं को समझे.

गुजरात में तीसरी जीत के बाद जब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार दिल्ली का रुख किया था तो उन्होंने विकास के अपने मॉडल में सुशासन यानी गुड गवर्नेस के नारे को भी जोड़ दिया था. और यहीं से शुरु हुई थी देश में अच्छे दिनों की बात. जैसे – जैसे लोकसभा चुनाव करीब आते गए नरेंद्र मोदी सबका साथ, सबका विकास के अपने नारे को और ज्यादा हवा देते चले गए. 

मोदी ने कहा था कि मैं जब गुडगवर्नेंस की चर्चा करता हूं तो मैं अपने मॉडल की बात करता हूं तो मैं कहता हूं कि पीटू जीटू. प्रो पीपुल गुड गवर्नेंस. आम तौर पर हमारे यहा शासन फायर फाइटर का काम करता है. समस्याएं हुई शासन उसको फॉलो करता है दौड़ता है रास्ता खोजता है. मित्रों शासन का काम है स्थितियों को विजुलाइज करे. ऩए आयामों की खोज करे. स्थितियां बदलने का संकल्प करे. और उसके अनुकूल नई व्यवस्थाओ को विकसित करे. लेकिन हम पिछले छह दशक से ज्यादा समय से देख रहे हैं. कि हम उन कामों को करने में विफल हुए हैं. और उसका नतीजा ये हुआ है कि आज देश के अंदर एक निराशा का माहौल है.
  
राजनीतिक विश्लेषक कंचन गुप्ता बताते हैं कि आप दिसंबर 2013 का जो आखिरी दिन था उसके बारे में सोचिए. चारो ओर देश में एक निराशा का माहौल था. तब की जो सरकार थी उसमें लोगों का विश्वास उठ चुका था. जो आर्थिक स्थिती थी ऐसा लग रहा था कि किसी भी समय आर्थिक स्थिती बिगड़ सकती है और बिगड़ सकती है. लीडरशिप क्राइसिस जैसा कि कहा जाता है कि हर एक देश को एक लीडर चाहिए होता है. तो उस समय भारत में एक लीडरशिप क्राइसिस थी. और आज अगर देखे तो ये जो एक स्थिती है उसमें एक ड्रमेटिक परिवर्तन आया है.

जून 2013 में नरेंद्र मोदी को बीजेपी ने सेंट्रल इलेक्शन कैंपेन कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया था. बीजेपी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी और बीजेपी के दूसरे कई सीनियर नेता इसके विरोध में थे. लेकिन आडवाणी के विरोध को दरकिनार करते हुए 13 सिंतबर 2013 को बीजेपी ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार भी घोषित कर दिया था.

तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि संसदीय दल ने ये फैसला किया है कि श्री नरेंद्र मोदी को आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट किया जाए.

राजनीतिक विश्लेषक अशोक वानखेड़े ने बताया कि ये मैनेजमेंट बहुत पहले से था उनका कि तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद फिर प्रधानमंत्री की दावेदारी पर आ जाना. ये उनका प्रबंधन था. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में सगंठन में जो चीज उनको शूट करती है उसको रखा जो चीज उनको शूट नहीं करती है उसको नहीं रखा. संजय जोशी उनको शूट नहीं करते संजय जोशी को प्रेस्टीज इश्यू बनाया. गडकरी अगर संजय जोशी को लेकर आते हैं तो गडकरी अध्यक्ष पद से जाए ये निश्चित किया. तो ये सब प्रबंधन के तहत होता है सुबह उठ कर आप प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं होते हैं. ये एक घोषित प्रोग्राम था उनका और उसके तहत सारी चालें चलते गए.

वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह ने कहा कि मोदी लहर बनना जो है मोदी की पर्सनेलिटी का वो सबसे बड़ा व्यक्ति विशेष है. सितंबर 2013 में मैंने राजनाथ सिंह से एक प्रश्न पूछा था कि आप ये बताइए कि आप इस व्यक्ति को आप प्रधानमंत्री पद का दावेदार और आप पार्टी का नॉमिनी बनाने की सोच रहे हैं जिसके खिलाफ दिल्ली के सभी बड़े नेता हैं . मोदी जी के जो पर्सनल मित्र थे वो भी खिलाफ थे. आडवाणी जी तो खिलाफ थे ही. राजनाथ सिंह ने कहा भई अब कुछ भी हो मैं तो करूंगा. क्योंकि उससे बड़ा पॉपुलर नेता देश में इस वक्त कोई नहीं है.

सितंबर 2013 में नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी बीजेपी का किला तो जीत लिया था लेकिन उनकी उम्मीदवारी के ऐलान से पहले ही उनके एक सहयोगी दल जेडीयू ने बीजेपी से नाता तोड़ कर ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की ताकि धर्मनिरपेक्ष ताकतें नरेंद्र मोदी से दूर ही रहे . गठबंधन राजनीति के दौर में नरेंद्र मोदी के लिए ये तगड़ा राजनीतिक झटका था. उधर 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में बीजेपी की हालत खस्ता थी. 2009 में यूपी में बीजेपी को सिर्फ दस सीटें मिली थी. ऐसे मुश्किल हालत के बीच नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के प्रचार की कमान संभाली थी.

नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 15 सितंबर से देश भर में चुनावी रैलियां करनी शुरु की थी और उन्होनें अपने धुंआधार चुनाव प्रचार अभियान से चुनाव प्रचार का एक रिकॉर्ड बना डाला है. बीजेपी का कहना है कि लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान मोदी ने देश भर में करीब तीन लाख किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की थी और उन्होंने 25 राज्यों में 437 चुनावी रैलियों को संबोधित किया था. 15 सितंबर 2013 को हरियाणा के रेवाड़ी से शुरु हुई मोदी की ये चुनाव यात्रा दस मई 2014 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया में जाकर खत्म हुई थी.

और जब चुनाव के नतीजे आए तो बीजेपी ने सहयोगी अपना दल को मिलाकर यूपी के खाते से 73 सीटें झटक ली. नरेंद्र मोदी की सुनामी ने यूपी ही नहीं पूरे हिंदी बेल्ट में जीत की राह का हर ताला तोड़ दिया. मध्यप्रदेश में 27, राजस्थान में 25 बिहार में 22, झारखंड में 12, उत्तराखंड में 5, हरियाणा में 7 और देश के दिल दिल्ली में सात में से सात सीटें जीतकर बीजेपी ने इतिहास रच दिया था. मोदी के पक्ष में आए ऐसे नतीजों ने उनकी बहुमत की राह की सारी रुकावटें एक ही झटके में साफ कर दी. और अपनी चुनावी रैलियों में तीन सौ कमल मांगने वाले मोदी को 336 सीटों के बहुमत के साथ प्रधानमंत्री की कुर्सी मिली. 

वरिष्ठ पत्रकार दिबांग ने बताया कि उनके जो सबसे ज्यादा घोर आलोचक है वो इस बात को मानते हैं कि उन्होंने ये उम्मीद भरी है चुनाव प्रचार के दौरान आप देखिए जिस तरह का माहौल था यानि देश में कुछ काम हो नहीं रहा था. भ्रष्टाचार था प्रधानमंत्री कहीं दिखाई नहीं देते थे. सुनाई नहीं देते थे पता नहीं चलता था कौन नेता है . देश का क्या हाल होगा. वहां उन्होंने कहा कि मैं एक डिसाइसिव नेता हूं. मैं काम करता हूं आपके लिए काम करूंगा. और ये उन्होंने मेसेज दिया और ये उसमें खास तौर से युवाओं को यानि 65 फीसदी युवा हमारे 35 साल से कम के हैं उनमें एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और वो चीज अभी तक लगातार चलती आ रही है मेरे खयाल से एक देश के लिए  एक नेता का ऐसा कर पाना एक बहुत बड़ी बात है और इसलिए वो इस साल के व्यक्ति विशेष हैं.

नरेंद्र मोदी की सरकार को सत्ता में आए हुए सात महीने से ज्यादा का वक्त गुजर चुका हैं. इस दौरान लोकसभा चुनाव के साथ शुरु हुआ बीजेपी की जीत का कारंवा राज्य दर राज्य आगे बढ़ता चला गया और साथ में मोदी सरकार पर लोगों का भरोसा भी बढता चला गया है. पंद्रह अगस्त को जब लाल किले से अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टॉयलेट और कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों को उठाया तो उनकी ये बातें सीधे लोगों के दिलों में उतरती चली गई.

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि मोदी के हाथ में दो तीन चीजे बहुत अच्छी गई हैं . एक तो छ: महीने में करप्शन का कोई भी चार्ज उनपे नहीं आया है. उनकी सरकार पर नहीं आया है और करप्शन एक बड़ा मुद्दा था जब वह आए हैं सत्ता में बल्कि उनके बारे में जो अफवाह कहिए या चाहे वो प्लांटेड हों वो ये ही है कि चोरी पकड़ने की अपने मंत्रियों पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहे हैं. ये उनके लिए अभी तक के लिए अच्छा सिगनल है कि खुद उनपे कोई चार्ज नहीं आया . दूसरों के खिलाफ वो सक्रिय हैं और ज्यादा मेहनत कर रहे हैं इतना आ रहा है.

पिछले सात महीनों में अपने अंदाज, अपनी बात और अपने काम करने के तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सीधे जनता से जुड़ते नजर आए हैं. इस दौरान मोदी ने आसान शब्दों और तरीकों से लोगों को ऐसी तरकीबे सुझाने की कोशिश भी की है जिसने देश के माहौल में बदलाव की एक हरकत पैदा कर दी है. महात्मा गांधी के जन्म जिन 2 अक्टूबर पर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुवात करने वाले मोदी खुद बनारस के घाट पर मिट्टी हटाते भी नजर आए हैं. लीक तोड़ते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कई योजनाओं की शुरुवात भी की है जिनमें आदर्श ग्राम योजना और जनधन योजना जैसी उनकी महत्वकांक्षी योजनाएं शामिल हैं. लेकिन भ्रष्टाचार, महंगाई और काला धन जैसे मुद्दों पर अपने चुनावी वादे निभाने में मोदी अभी तक नाकाम ही नजर आए हैं.    

राजनीतिक विश्लेषक अशोक वानखेड़े ने कहा कि घरेलू मोर्चे पर जो वादे उन्होने किए नरेंद्र मोदी तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके है उन्हें मालूम है जो वादे वो कर रहे हैं वो कर नहीं पाएंगे पूरे. इसमें कई दिक्तते हैं लेकिन चुनाव जीतना भी है. चुनाव जीतना है तो कई वादे करना भी पड़ते हैं. ब्लैक मनी, सारी दुनिया जानती है मीडिया जानता है सब लोग कहते थे कोर्ट भले ही कहे कि ब्लैक मनी का आप बताओं कैसे लाओगे वापस लेकिन वो काला धन विदेशों से कैसे आएगा इसमें बहुत सारे रिस्ट्रक्शन थे. जो यूपीए सरकार लोकसभा में जवाब देती थी कालेधन को लेकर के वही जवाब अब वित्तमंत्री जेटली जी दे रहे हैं. कोई इससे ज्यादा बड़ी बात तो कर नहीं रहे हैं.

काले धन के मुद्दे पर भले ही मोदी यू टर्न मारते नजर आए हैं. लेकिन ये भी सच है कि केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद मंहगाई पर कुछ हद तक लगाम भी लगी है. दिसंबर में थोक मंहगाई दर शून्य तक आ पहुंची है. यानी खाने पीने का सामान साल भर पुरानी कीमत पर ही मिल रहा है. वही दूसरी तरफ पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी ब्रेक लगे है. पिछले सात महीने में पेट्रोल के दाम में करीब 11 रुपये और डीजल के दाम में 7 रुपये की कमी आई है. बावजूद इसके खुदरा बाजार में महंगाई दर अभी भी बेकाबू है और यही वजह है कि देश का आम आदमी आज भी अच्छे दिनों के इतंजार में है.

वरिष्ठ पत्रकार दिबांग ने कहा कि जहां तक मंहगाई का सवाल है मंहगाई दर नीचे आ गई है इसमें आप कह सकते हैं कि मोदी ने किया तो उसमें ये बात भी है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल के दाम जिस तरह से लगातार गिरे हैं जिस तरह से यहां पर और चीजे हुई हैं तो उसमें एक तरीके से मोदी का हाथ आप देख भी सकते हैं नहीं भी देख सकते हैं पर चूंकि मोदी इस समय प्रधानमंत्री हैं तो क्रेडिट उनको जाता है . एक बात जो साफ दिखाई देती है वो ये है कि मोदी अभी भी बहुत ज्यादा कैंपेने मोड़ में हैं . आप लगातार चुनाव प्रचार के मोड में हैं . छोटे चुनाव भी होते हैं तो आप वहां पर सघन प्रचार करते हैं  आपको मेरे ख्याल से एक कैंपेन मोड से गुड गवर्नेंस सुशासन जो कि आपका सबसे बड़ा ट्रूप का पत्ता था उस तरफ भी ध्यान देना पड़ेगा.

मई 2014 में जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने सत्ता संभाली थी तो शेयर बाजार ने उसका जमकर स्वागत किया था. मोदी सरकार के सात महीने के कार्यकाल के दौरान सेंसेक्स 24700 के स्तर से करीब 4000 अंक ऊपर चढ़कर 28600 तक पहुंच चुका है. हांलाकि दिसंबर में इसमें थोड़ी गिरावट जरुर आई थी लेकिन सेंसेक्स 27 हजार के उपर ही रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेक इन इंडिया मुहिम का भी कारोबार जगत में स्वागत हुआ है. उन्होनें मेक इन इंडिया का नारा देते हुए दुनिया भर की कंपनियों से भारत में निर्माण करने की अपील की थी. मोदी का मिशन है कि भारत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दुनिया का एक बड़ा नाम बन सके.

राजनीतिक विश्लेषक शेष नारायण सिंह ने बताया कि मेक इन इंडिया का नारा तो यही है न कि मैनुफैक्टरिंग हब बनेगा भारत..बहुत बड़े कारखाने लगेंगे. बहुत फैक्ट्रियां लगेंगी. लेकिन वैसा कोई माहौल फिलहार बनता नजर नहीं आ रहा. भ्रष्टाचार के बारे में उन्होंने तमाम बाते की थीं. भ्रष्टाचार के बारे में कोई भी विजिबल इम्पैक्ट देखने को नहीं मिल रहा.  आर्थिक सुधारों का जहां तक हवाला है .  तो उसमें भी वो सफल नहीं हो पाए. इंश्योरेंस के क्षेत्र में सुधार कांग्रेस भी करना चाहती थी. बीजेपी ने पिछले दस साल में उसे रोका . और अब ये करना चाहते हैं. तो कांग्रेस ने औऱ लोगों ने मिलकर रोक दिया. जीएसटी वाले मुद्दे में भी . इनकी सरकारें . राज्य सरकारे कें बिना कंसेंट के नहीं होता तो वहां भी मामला बन नही पाया तो एक जो आर्थिक सुधार औऱ जिसके बिनाह पर विदेशी निवेश डॉयरेक्ट लाने की कोशिश थी उसको तो बड़ा झटका लगना ही लगना है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाकर अपनी विदेश नीति का पहला संकेत दिया था. वो नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के अलावा अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का दौरा भी कर चुके हैं. साफ है कि भारत के पड़ोसी मुल्क हो या फिर दुनिया के ताकतवर देश, प्रधानमंत्री मोदी अभी तक अपनी कूटनीति में सबको बराबर की तवज्जोह देते नजर आए हैं. वो ये संदेश देने में भी कामयाब नजर आ रहे हैं कि उन्होनें अपनी पहली पारी में भारत की छवि विदेशों में मजबूत की है.

राजनीतिक विश्लेषक कंचन गुप्ता ने बताया कि भारत की जो अर्थनीति है भारत की जो संस्कृति है जो इतिहास है. विश्व गुरु माना जाता था भारत किसी समय. और आज हम लोग वहां से काफी हट चुके है. भारत को फिर से वो दर्जा दिलाने के लिए उस स्थान पर ले जाने के लिए नरेंद्र मोदी ने छह महीने में जो काम किया है. वो चाहे अमेरिका में हो ऑस्ट्रेलिया में हो जी 20 में हो यूएन में हो. दुनिया अब फिर से भारत की ओर देखने लगी है. ये कोई कम एचीवमेंट नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार दिबांग ने बताया कि पहले हमारी हालात ये थी कि कोई भी पड़ोसी देश ऐसा नहीं था जिससे भारत के दोस्ताना संबंध हों . सब चिढ़े बैठे हुए थे सब दूसरी तरफ देख रहे थे . और इन्होंने एक शुरुआत की . भूटान चले गए नेपाल चले गए. बंग्लादेश से बात कर ली. पाकिस्तान से बात करने की कोशिश की श्रीलंका से बात करने की कोशिश की इस सब को साथ जोड़ने की कोशिश की .  ये भाव दिया कि हम आपसे बात करने को तैयार हैं हम ऐसे नहीं हैं कि हम बड़े सूपर पावर बनने वाले हैं तो हम आपका ख्याल नहीं रखेंगें और इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि वहां एक बहुत बड़ा बाजार है . वहां से हमको बातचीत करनी चाहिए. आप साथ लेंगे जिस तरह का नया इस समय वर्ल्ड ऑर्डर बन रहा है. तो आप अपने लोगों को साथ लेगें तभी आप कहीं आगे जा सकते हैं एक बात ये है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू सिर्फ चुनाव में ही नहीं चला बल्कि विश्व मंच पर भी वो अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित करते हुए उन्होंने जहां पाकिस्तान को करारा जवाब दिया वहीं पूरी दुनिया को योग, आयुर्वेद और वसुधैव कुटुम्बकम का संदेश भी दिया है. प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी हाजिर जवाबी से अमेरिका और विश्व भर के नेताओं को प्रभावित किया है और दुनिया भर में फैले अप्रवासी भारतीयों ने तो उन्हें हाथों हाथ लिया है. न्यूयॉर्क के मेडिसिन स्कवायर में मोदी को सुनने करीब 20 हजार लोग जमा हुए थे.

ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत सत्कार हुआ वैसा किसी भारतीय प्रधानमंत्री के बारे में पहले देखने को नहीं मिला है. और खास बात ये है कि विदेशी मोर्चे पर मिली इस शोहरत का नरेंद्र मोदी ने घरेलू मोर्चे पर भी बखूबी इस्तेमाल किया है.

 

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मोहन ने बताया कि मोदी की पर्सनैलिटी में एक शो मैनशिप है एक बहुत ही तैयारी है एक बहुत ही मैनेजरिल स्किल है ये सब चीजे शामिल हैं तो विदेश वाला जो मामला है उसमें ये चीज सबसे बढ़िया ढंग से दिखाई देती है.  और ऐसा लगता है कि वो दिग्विजय करने निकले हैं और सारा देश उनके पीछे झूम रहा है कि ऐसा पहला नेता आया है जो विदेशों में झंडा गाड़ रहा है उससे क्या मिला डिप्लोमेसी में क्या हुआ . कोनॉमी को क्या लाभ हुआ . पॉलिटिक्स में क्या ये बहुत दिखाई नहीं देता लेकिन उनकी पॉलिटिक्स और उनकी पर्सनेलिटी को इससे बहुत फर्क पड़ा.

राजनीतिक विश्लेषक अशोक वानखेड़े ने कहा कि जब आप विदेश नीति की बात करते हैं तो आपका विदेश मंत्री या प्रधानमंत्री विदेश जाकर क्या लाता है ये महत्वपूर्ण हैं. वहां कितना बड़ा भाषण देता है कितना बड़ा इवेंट करता है ये मायने नहीं रखता.  तो आज अमेरिका में बुहत बड़ा स्वागत हुआ आज ऑस्ट्रेलिया में बुहत बड़ा स्वागत हुआ. पूरे विश्व ने टेलीकास्ट किया बड़े बडे अखबारों में छापा उससे देश को क्या फायदा हुआ, आस्ट्रेलिया से क्या आया देश को. अमेरिका से अल्टीमेटली इस देश को क्या मिला. इस देश के जो अर्थशास्त्री है उनके लिए ये बहुत बड़ा सवाल है कि अल्टीमेटली हमनें अमेरिका से क्या पाया.

प्रधानमंत्री मोदी ने बीते सात महीनों में विदेशी मोर्चे पर एक अलग अंदाज पेश करने की कोशिश की है. उन्होनें कुल नौ विदेशी दौरे किए और पांच अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की शिखर बैठकों में हिस्सा लिया है. इस दौरान मोदी सोशल मीडिया पर भी छाए रहे हैं और उनका स्टाइल भी काफी चर्चित रहा है. यही वजह है कि विदेश में मोदी का मैजिक देश की राजनीति पर भी अपना असर छोड़ता नजर आया है. लोकसभा चुनाव के बाद जब विधानसभा चुनावों में मोदी पार्टी के स्टार प्रचारक के तौर पर मैदान में उतरे तो वहां भी बीजेपी अपनी सरकारें बनाने में कामयाब रही.

इसी साल अक्टूबर में महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव हुए थे. महाराष्ट्र में बीजेपी, शिवसेना से 25 साल पुराना गठबंधन तोड़ कर अकेले चुनाव मैदान में उतरी थी. इन दोनों राज्यो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 35 से ज्यादा चुनावी रैलियां की थी. महाराष्ट्र में जहां बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसकी गठबंधन सरकार बनी वहीं हरियाणा में पहली बार बीजेपी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता हासिल की है. और इन दोनों जीत का सेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर पर ही बंधा है.

राजनीतिक विश्लेषक कंचन गुप्ता ने बताया कि अगर चुनाव होते हैं तो नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना ये ही एक मात्र उपाय रह गया है क्या ये सही है मेरे ख्याल से तो ये सही नहीं है. क्योंकि लीडर को बार-बार एक्सपोज करना ये अच्छी रणनीति नहीं हो सकती है. हर एक चुनाव में सामने लाना ये एक अच्छी रणनीति नहीं हो सकती है. लेकिन अब इसके लिए पार्टी को सोचना पड़ेगा कि वह लोकल लीडरशिप तैयार करे उसे आगे बढाए. अभी भी समय है यूपी बिहार में जब चुनाव होंगे तो उसके लिए अभी से तैयारी करनी होगी.

लोकसभा चुनाव में मोदी के रथ पर सवार होकर बीजेपी ने 282 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी यही हाल इस साल हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों का भी रहा है. मोदी के सत्ता संभालने के बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड में बीजेपी की सरकारें बन चुकी है वही जम्मू कश्मीर में बीजेपी नंबर दो पार्टी बन कर उभरी है. खास बात ये है कि इन सभी राज्यों के चुनाव में लोकल लीडरशिप की बजाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही बीजेपी के स्टार प्रचारक थे. और उन्हीं के नाम पर बीजेपी ने वोट भी मांगे थे. जाहिर है अगर पूरे साल का चुनाव प्रदर्शन देखा जाए तो नरेंद्र मोदी मैन ऑफ द सीरीज रहे हैं. 

राजनीतिक विश्लेषक अऱविंद मोहन ने बताया कि मोदी का सक्सेज पर्सनल लेवल पर बहुत जबरदस्त है कोई आदमी आज की तारीख में बहुत इतने छोटे नीचे से उभर कर यहां आ जाए और सारा मीड़िया…सारा कॉरपोरेट..सारी पार्टी ..पैसे वाला..संगठन..एनडीए ये हर आदमी आपको सपोर्ट करने लगे और बाकि लोग सब धराशाई हो जाए, कांग्रेस पिट जाए बाकि क्षेत्रीय पार्टियां पिट जाएं.  और फिर बीजेपी एब्सलूट जीत पाले. मोदी जो चाहे वो हो जाए . ये अपने आप में बहुत बड़ी चीज है छोटी चीज नहीं है. और ये उन्होंने कैसे हासिल किया है ये अभी भी ठीक से पढ़ने की चीज है.

राजनीतिक विश्लेषक अशोक वानखेड़े ने बताया कि मोदी के पैरो में जो वो विकास की राजनीति लेकर चले है जो सबसे बड़ा रोडा है. वो मुझे लगता है संघ परिवार है. पिछले एक महीने में जो हम देख रहे है मोदी के विकास के एजेंडे के खिलाफ जो लगातार संघ के धर्म को लेकर हमले चल रहे हैं. उससे कहीं ना कहीं मोदी आहत हैं. चाहे घर वापसी का कार्यक्रम हो चाहे हिंदू राष्ट्र की बात करना हो चाहे घोड़से को महिमा मंडित करने की बात हो. ये मोदी नहीं चाहते दिल से अगर व्यक्तिगत रुप से पूछे तो ये मोदी नहीं चाहते. मोदी इस देश का विकास करना चाहते है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करीब 12 सालों तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे है लेकिन जब उन्होनें राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा तो 130 साल पुरानी कांग्रेस को हाशिये पर डाल कर बीजेपी को केंद्र की सत्ता तक पहुंचा दिया. लंबे अर्से से विपक्ष में बैठी बीजेपी को अकेले अपने बल- बूते पर केंद्र और कई राज्यों की सत्ता तक पहुंचाने वाले मोदी ने राष्ट्रीय राजनीति में आज अपना सिक्का जमा लिया है. उन्होने अपनी पार्टी में अपना राजनीतिक कद इतना ऊंचा कर लिया है कि आज कोई उनके आस-पास भी नजर नहीं आता है. देश से लेकर विदेश तक साल 2014 ने मोदी नाम की ही गूंज सुनी है और इसीलिए नरेंद्र मोदी हैं साल 2014 के व्यक्ति विशेष.

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Web Title: pm modi is vyakti vishesh
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