मूवी रिव्यू: 'प्यार का पंचनामा 2'

By: | Last Updated: Friday, 16 October 2015 9:21 AM
Pyaar Ka Punchnama 2 Movie Review

रेटिंग: 2.5 स्टार

 

2011 की सरप्राइज़ हिट “प्यार का पंचनामा” ने रोमैंटिक कॉमेडी को एक नया ट्विस्ट दिया था. इसमें कहानी को पुरुषों के दृष्टिकोण से बड़े आक्रामक अंदाज़ में सुनाने की कोशिश की गई थी. ये अंदाज़ और घटनाएं उस वक़्त नए लगती थे, लेकिन 4 साल बाद ‘प्यार का पंचनामा 2’ में ना तो फिल्म और ना ही इसके किरदारों के सोचने के अंदाज़ में कोई बदलाव आया है. फिल्म का एक-एक सीन यही दिखाता है कि दुनिया में लड़कों की सारी परेशानियों और मुश्किलों की ज़िम्मेदार सिर्फ़ लड़िकयां हैं. लड़कियां चालाक हैं और उनकी ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ लड़कों की ज़िंदगी को मुश्किल बनाना है.

 

ज़ाहिर है ऐसे किरदारों से ज़्यादातर लोग इत्तेफ़ाक़ नहीं रखेंगे. लेकिन थिएटर में बैठे बहुत से दर्शकों की तरह अगर आपको ये विषय मज़ाकिया लगता है तो यक़ीनन आप इस फिल्म को पसंद करेंगे. इसके कई डायलॉग्य पर खिलखिला कर हंसेगे और तालियां भी बजाएंगे. आख़िर आपको कौन रोक सकता है?

 

पिछली फिल्म की तरह यहां भी तीन दोस्त हैं अंशुल (कार्तिक आर्यन), सिद्धार्थ (सनी सिंह) और तरुण (ओंकार कपूर). ये तीनों पढ़े-लिखे हैं, अच्छी जॉब्स करते हैं और एक साथ नोएडा के एक आलीशान फ्लैट में रहते हैं. इनकी जिंदगी में रुचिका (नुशरत भरुचा), सुप्रिया (सोनाली सहगल) और कुसुम (इशिता शर्मा) नाम की लडकियां आती हैं. इसके बाद कैसे इनकी अच्छी-ख़ासी ज़िंदगी दूभर हो जाती है, यही पूरी फिल्म में दिखाया गया है.

 

फिल्म में कार्तिक आर्यन के अलावा दो नए अभिनेता आ गए हैं मगर तीनों लड़कियां वहीं हैं जो पिछली फिल्म में थीं. फिल्म में वाक़ई कुछ मज़ेदार सीन और डायलॉग हैं जिनपर आप मुस्कुराएंगे. किसी भी रोमैंटिक कॉमेडी में ऐसे 4-5 सिचुएशनल सीन वाक़ई बहुत अच्छे लगते हैं लेकिन जब यही मूड पूरी फिल्म में रहे और किरदार कैरिकेचर्स की तरह बर्ताव करें तो हंसी आनी बंद हो जाती है.

 

मसलन उम्र के साथ-साथ किरदारों को मैच्योर दिखाया जा सकता था. कॉमेडी के अंदाज़ में ही सही लड़के-लड़कियों के रिश्तों की ग़लतफहमियां दिखाई जा सकती थीं. लेकिन निर्देशक लव रंजन पुराने ढर्रे पर ही चले और फिल्म के किरदारों को बेहद एकतरफ़ा बना दिया. मसलन रुचिका के लिए उसके पार्टीज़ और दोस्त ही सबकुछ है. बॉयफ्रेंड की कोई अहमियत नहीं है. सुप्रिया फैसला नहीं ले सकती और कुसुम सिर्फ़ पैसे के लिए अपने प्रेमी का इस्तेमाल कर रही है. इन्हें लड़कियों सिर्फ़ शॉपिंग और घूमने से प्यार है और समझदारी जैसी कोई चीज़ तो इनके अंदर है ही नहीं. ये लड़कों का इस्तेमाल होता हैं और बैकग्राउंड में गाना बजता है- ‘बन गया कुत्ता देखो बंध गया पट्टा’

 

पिछली फिल्म में कार्तिक आर्यन का एक लंबा मोनोलॉग था जो वायरल हो गया था. यहां फिर से उसी तर्ज़ पर एक लंबा मोनोलॉग है जिसमें वो जमकर लड़कियों को कोसते हैं और सारी मुसीबत की जड़ उन्हें ही बताते हैं. जिस थिएटर में मैंने ये फिल्म देखी वहां इस डायलॉग पर सबसे ज़्यादा तालियां बजीं.

 

फिल्म काफ़ी लंबी है और बार-बार ऐसे ही ‘आयटम सीन’ ठूंसने की कोशिश की गई है जिनका कहानी से कोई सीदा लेना-देना नहीं है. फिल्म में लड़के भी कई अजीबोग़रीब हरकते करते हैं लेकिन यहां कहानी में परिदृश्य उनका है इसलिए उनपर सवाल नहीं उठाए जाते.

 

अगर महिला किरदारों को सिर्फ़ मतलबी, मक्कार और धोखेबाज़ बताने के बजाय उनका कैरेक्टराइज़ेशन संतुलित करने पर मेहनत की गई होती तो फिल्म बेहतर होती. लेकिन लड़कियों को मुसीबत की जड़ मानने वाले, महिलाओं के ऊपर जोक्स मारने वाले और उस मज़ाक पर हंसने वाले दर्शकों के लिए इस फिल्म में बहुत कुछ है. उन्हें ये फिल्म पसंद करने से आख़िर कौन रोक सकता है?

 

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Web Title: Pyaar Ka Punchnama 2 Movie Review
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