व्यक्ति विशेष : साईं बाबा हिन्दू या मुसलमान!

By: | Last Updated: Saturday, 31 October 2015 12:12 PM
Shankaracharya releases poster against Sai Baba

सबका मालिक एक साईं बाबा का ये पैगाम धर्म की दीवारों को लांघ कर पिछले करीब सवा सौ सालों से शिरडी की फिजाओं में गूंज रहा है. अमीर हो या गरीब, हिंदू हो या मुसलमान या फिर औरत हो या मर्द, इंसान की पहचान का हर फर्क साईं बाबा के दरबार में आकर मिटता रहा है और यही वजह है कि शिरडी का ये साईं धाम देश और दुनिया में आज करोडो़ं भक्तों की आस्था का अहम केंद्र बन चुका है. शिरडी के इस संत को उनके भक्त, भगवान मानते हैं. भगवान की तरह साईं बाबा की पूजा भी करते हैं. साईं भक्तों की ये परंपरा भी करीब सौ साल पुरानी हो चुकी है लेकिन इस पंरपरा पर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे है. शिरड़ी के साईं बाबा की पूजा क्यों? हिंदू धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने एक बार फिर ये सवाल उठाते हुए साईं भक्तों पर इस पोस्टर के जरिए जोरदार प्रहार कर दिया है.

 

साईं बाबा को यूं तो दुनिया से गुजरे 97 साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी शिरडी में उनकी समाधि पर भक्तों का मेला लगा रहता हैं. साईं भक्त बरसों से उनकी पूजा भी करते चले आ रहे हैं लेकिन एक बार फिर हिंदू धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरू शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने साईं भक्तों की भक्ति पर सवाल उठाते हुए साईं बाबा के खिलाफ ये पोस्टर जारी किया है. स्वरुपानंद सरस्वती ने ये पोस्टर भोपाल में जारी किया है जो कई नए विवादों को जन्म भी दे सकता है. क्योंकि इसमें धार्मिक आस्था से जुड़े दो नामों को आमने –सामने खड़ा करने की कोशिश की गई है. पोस्टर में दिखाया गया है कि रामभक्त हनुमान ने एक पेड़ उखाड़ लिया है और उस पेड़ से वो साईं बाबा को मार रहे हैं. पोस्टर में साईं बाबा को अपनी जान बचाकर भागते हुए भी दिखाया गया है. शंकराचार्य इस पोस्टर के बनने के पीछे एक दिलचस्प कहानी भी बताते हैं. उनका कहना है कि एक हिंदू संत ने सपना देखा था और उस सपने के आधार पर ही साईबाबा और बजरंगबली का ये पोस्टर बनाया गया है.

द्वारका और श्रृगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती से सवाल- महराज जी ये जो पोस्टर आपने बनाया है इसकी क्या वजह हैं? जवाब– इसका कारण ये है कि महाराष्ट्र में एक संत आये था मेरे पास उन्होंने मुझे बताया कि हमको स्वप्न में ये दिखायी पड़ रहा कि ये सांई इस समय प्रेत हो गया हैं और उसके द्वारा बहुत से लोगों की छति हो रही हैं और उसको हनुमान जी भगा रहे हैं.

 

साईंबाबा वर्सेस बजरंगबली का ये पोस्टर दरअसल शंकराचार्य बनाम साईंबाबा विवाद की अगली कड़ी भर है. पिछले करीब एक साल से स्वरूपानंद सरस्वती ने साईं बाबा के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है. धर्म संद से लेकर अलग – अलग मंचों से वो साईं बाबा के विरोध में आवाज उठाते रहे हैं लेकिन अभी तक उन्हें कोई बड़ा समर्थन मिलता नजर नहीं आया है. शंकराचार्य क्यों और कब से साईं बाबा का विरोध कर रहे हैं.

 

द्वारका और श्रृगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती से सवाल- आप ने कुछ धर्म संसद की थी इसी साईं विरोध को लेकर जहां आपने बहुत सारी बाते नयी नयी बातें बतायी थीं समाज के लोगों का क्या अब कोई योजना है. जवाब- हमारी योजनाएं तो चल रही हैं और इसका प्रभाव लोगों पर पड़ रहा है लोगों ने ये छोड़ दिया है. हम जहां उनकी मूर्ति हैं जहां उनकी फोटो है हम छेड़ छाड नहीं करते हैं हम तो लोगों के मन जो फालतू की बात बैठी है हम उसे दूर करते हैं विचार से दूर कर रहे हैं हम इतने दिनों ये सब बात कह रहे हैं लेकिन किसी ने भी आकर कहा कि आप जो कह रहे वो तर्क संगति नहीं है कोई विचार के हमारे पास तक नहीं आया वो मुकदमे दायर करते हैं जेल भेजने को कहते पर हम ड़रने वाले नहीं.

 

शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती ने जो पोस्टर जारी किया है उसके ऊपरी हिस्से पर लिखा है. हनुमान जी ने खदेड़ा साईं चांद मियां को, बजरंग बली हुए क्रोधित साईं के साथ राम नाम को जोड़ने पर बजरंग बली ने किया साईं मियां के पाखण्ड का अन्त. इस पोस्टर के नीचे के हिस्से पर दो लाइन में ये भी लिखा गया है कि अब हम सिरडी में नहीं रह सकते, मेरी रूह कांप रही है हम यहां से पाकिस्तान जा रहे हैं. हमें बख्श दो हनुमान जी महाराज हम आपका कोप नहीं सह पायेंगे. इस पोस्टर को लेकर एबीपी न्यूज़ ने साईं बाबा ट्रस्ट से बात करने की कोशिश की लेकिन ट्रस्ट ने इस पर अभी तक कोई बयान नहीं दिया है. वहीं पोस्टर जारी करने वाले शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती ये आरोप भी लगा रहे है कि साईं बाबा के भक्त हिंदू धर्म को बिगाड़ने का काम कर रहे हैं.

 

द्वारका और श्रृगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती बताते हैं कि हमारा जो साईं था जिसका नाम चांद मियां था जो 1838 में पैदा हुआ था जो 1908 में चला गया उससे कोई झगड़ा नहीं है उसके नाम पर जो पाखंड़ फैलाया जा रहा है लोगों को ठगकर जो पैसा कमाया जा रहा वो जन हित मे नहीं खर्च किया जा रहा वो केवल हिन्दू धर्म को बिगाड़ने में किया जा रहा है. लातूर में पानी की कमी है रेल जब वहां पहुंचती है तो लोग बाथरूम से पानी ले जाते हैं.

 

बजरंग बली के साईं बाबा को पीटते हुए इस पोस्टर के अलावा एक और पोस्टर भी जारी किया गया है जिसमें बजरंग बली को साईंबाबा की गर्दन दबा कर उन्हें मारते हुए दिखाया गया है. यहां गौर करने वाला सवाल ये भी है कि इस पोस्टर में किसी दूसरे भगवान की बजाए बजरंग बली को ही क्यों दिखाया गया है? दरअसल देश भर में करोडों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक बजरंगबली को धर्मरक्षक माना जाता है. वो शक्ति के साथ – साथ रामभक्ति के भी प्रतीक माने जाते हैं.

 

साईंबाबा और बजरंगबली को लेकर छिड़े इस नए पोस्टर वॉर की सबसे दिलचस्प बात ये है कि साईं भक्तों ने इंटरनेट पर साईं बाबा और हनुमान को एक साथ दिखाते हुए कई तस्वीरें बनाई हुई हैं. इन तस्वीरों में किसी किस्म का बैर भाव नहीं दिखाया गया है लेकिन शंकराचार्य की तरफ से जारी ये पोस्टर पहली ऐसी तस्वीर है जिसमें हनुमान को साईंबाबा के दुश्मन के तौर पर दिखाया गया है और इस बात को लेकर शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती का अपना तर्क भी हैं.

 

द्वारका और श्रृगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती बताते हैं से सवाल- ये आपको बड़ा आपत्तिजनक नहीं लग रहा जवाब- अच्छा इसमें आपत्ति क्या है? आप सोचिये जब हनुमान जी साईं का चित्र दिखाया गया है. उसको ये दिखाया गया कि वो वंशू वजा रहा जो भगवान ने बजायी थी जो विकट रूप भगवान ने दिखाया था वो साईं दिखा रहा ये आपत्ति जनक नहीं है.

 

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने पोस्टर में साईं बाबा को मुस्लिम बताया है दावा ये भी किया जा रहा है कि साईं बाबा के मंदिर के पास हनुमान मंदिर भी बनाया जाएगा. शंकराचार्य का कहना है कि साईं बाबा के भक्त हिंदू धर्म को बिगाड़ रहे हैं. इसी तर्क को आधार बना कर उन्होंने साईं बाबा के खिलाफ पिछले एक साल से मुहिम छेड़ रखी है और वो साईं भक्तों पर आरोपों की बौछार करते रहे हैं. साईंबाबा की पूजा पर शंकराचार्य सबसे बड़ा सवाल उठाते हैं.

 

सवाल -साईं बाबा की पूजा क्यों?

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती कहते हैं कि हमारे जो भगवान अवतार हैं. वो आज भी हैं. ना उनका जन्म होता है और ना ही मृत्यु होती है. वो साईं मर चुका है असत्य है. दूसरा जो उसकी मूर्ति है हम लोग भगवान का जब आहवान करते हैं तभी उसकी पूजा करते हैं. प्राण प्रतिष्ठा से वो चेतन हो जाती है. मिट्टी के पिंड में जब हम शंकर जी का आहवान करते हैं तो उनका पूजन करते हम विसर्जन कर देते हैं हम मिट्टी फेंक देते हैं. तो हम चेतन की पूजा करते हैं जड़ की नहीं करते हैं. तो उनको चेतन बनाने का कोई मंत्र हमारे शास्त्रों में नहीं है.

 

शंकराचार्य का साईं भक्तों पर ये इल्जाम नंबर एक है. आम आदमी ही नहीं राजनीति से लेकर खेल जगत और फिल्म दुनिया से जुड़ी बेशुमार हस्तियां साईं बाबा के दरबार में सिर झुकाने के लिए शिरडी पहुंचती रही हैं. साईं बाबा की भक्ति का कैसे परवान चढ़ा ये रंग और क्या है साईंबाबा का असली धर्म ये पूरी कहानी भी हम आपको बताएंगे.

 

सवाल – साईं बाबा का मालिक कौन?

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती कहते हैं हमारा ये प्रश्न है कि जिसका आप मंदिर बना रहे हैं उसका कहना था सबका मालिक एक तो सबसे क्या अभिप्राय था, सबसे दो ही अभिप्राय हो सकते हैं या तो सब धर्मों के अनुयायी मनुष्य तो सब धर्मों का अनुयायी एक नहीं हो सकता क्योंकि सब धर्मों में जैन धर्म है जो कि ईश्वर को शृष्टि का कर्ता नहीं मानता और न मालिक मानता . वो तीर्थांकरों को मानता है, बौद्ध लोग सूर्यवादी है जो चारवाक है वों ईश्वर को मानते ही नहीं है तो सब धर्मों का मालिक एक नहीं बना. दूसरी ये है कि अगर आप उसका अर्थ मनुष्य लेते हैं तो सब में शिरडी का साईं बाबा था या नहीं था अगर वो भी मनुष्य था तो उसका मालिक कौन है. तो जिस मालिक की वो चर्चा करते हैं उस मालिक का कोई आकार नहीं है तो जब उसका आकार ही नहीं है तो उसके मंदिर कैसे बन रहे हैं?

 

संत साईं बाबा के मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का कहना है कि साईं बाबा के मंदिर के नाम पर केवल कमाई की जा रही है और इस कमाई का टीवी पर प्रदर्शन कर लोगों को आकर्षित करने की कोशिश की जाती है वो साईंभक्त पर हिंदू धर्म का स्वरुप बदलने का इल्जाम भी लगाते है.

 

लोगों के मन में ये भावना पैदा कर रहे हैं कि सारी दुनिया में हमारा ड़ंका बज रहा तुम भी हमारे पास आ जाओ इसको दूर करना बहुत आवश्यक है अन्यथा हिंदू धर्म का ये लोग स्वरूप ही बदल देंगें. शंकराचार्य का ये भी कहना है कि हिंदू धर्म में अवतार और गुरु की पूजा होती है और हिंदू धर्म में जो चौबीस अवतार हुए हैं उनमें कलियुग में केवल बुद्ध और कल्कि का अवतार हुआ है ऐसे में साईं की पूजा का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वो ना तो कोई अवतार हैं और ना ही उन्हें गुरु के रुप में माना जा सकता है क्योंकि गुरु एक आदर्शवादी शख्सियत होती है.

 

क्या साईं की पूजा मुसलमान करते हैं?

दरअसल शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने साईं बाबा के सबका मालिक एक यानी एकता के संदेश पर सवाल उठा कर साईं भक्तों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है. कौन थे साईं बाबा और क्या था उनका वो पैगाम. शिरडी यानी साईं बाबा का शहर. लेकिन आज साईं बाबा की शोहरत सात समंदर पार कर चुकी है. लेकिन साईं की पूजा और उनके धर्म को लेकर पिछले कुछ समय से सवाल खड़े हो रहे हैं. क्या वो कबीर, नामदेव, पांडुरंग जैसे संतों के अवतार थे. कुछ लोग कहते हैं कि वो शिव के अंश हैं और कुछ भक्तों को उनमें दत्तात्रेय का अंश नजर आता है. लेकिन आज भी लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि साईं बाबा हिंदू थे या फिर मुसलमान. साईं बाबा से जुड़ी ज्यादातर जानकारियां उनकी जिंदगी में ही उन पर लिखी किताब श्री सांई सच्चरित्र में दर्ज हैं. इस किताब की कसौटी पर ही हम साईं बाबा पर लगे इल्जामों को कसेंगे. और आपको बताएंगे साईं बाबा की जिंदगी का असली सच. लेकिन उससे पहले पढ़िए शिरडी से साईबाबा का कनेक्शन जुड़ने की ये कहानी. 

 

दिल्ली से करीब 12 सौ किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले की कोपरगांव तहसील में शिरडी शहर बसा हुआ है. और शिरडी में नीम का पेड हैं जो साईं भक्तों के लिए आस्था का सबसे अहम केंद्र है. 

 

दरअसल करीब 150 साल पहले साईं बाबा की कहानी नीम के इसी पेड से शुरु होती है. साईं सच्चरित्र में लिखा है कि साईं बाबा को शिरडी में पहली बार 1852 में नीम के इसी पेड के नीचे देखा गया था. उस वक्त साईं बाबा की उम्र करीब सोलह साल थी.

 

मंदिर के पूर्व ट्रस्टी शांताराम मिराने कहते हैं कि नीम के पेड के नीचे वो बैठा करते थे. और उन्होंने बताया था कि मेरे गुरु की समाधि यहां है.

 

साईं बाबा करीब 65 सालों तक शिरडी में ही रहे. लेकिन साईं बाबा को लेकर उस वक्त भी लोग यही कयास लगाते रहे कि वो हिंदू हैं या फिर मुसलमान. तो इसके पीछे सबसे बडी वजह ये है कि साईंबाबा ने कभी किसी के साथ धर्म के आधार पर व्यवहार नहीं किया. औऱ इसीलिए खुद साईंबाबा के मजहब को लेकर भी अलग-अलग तर्क दिए जाते हैं.

 

जो लोग साईं बाबा को हिंदू मानते हैं वों उनके हिंदू होने के लिए ये तर्क देते हैं कि साईं बाबा धूनी रमाते थे जबकि धूनी सिर्फ शैव औऱ नाथपंती संत ही जलाते हैं. साईं बाबा हर सप्ताह अपनी द्वारिकामाई मस्जिद में भजन- कीर्तन का आयोजन करते थे. वो खुद भी भजन गाते थे और मस्जिद में घंटानाद भी होता था. साईं बाबा कपाल पर चंदन औऱ कूकू का टीका लगाते थे.

 

जानकार मानते हैं कि वो नाथ संप्रदाय का पालन करते थे. हाथ में पानी का कमंडल रखना, धूनी रमाना, हुक्का पीना, कान बिंधवाना और भिक्षा पर ही निर्भर रहना. ये नाथ संप्रदाय के साधुओं की निशानी हैं. नाथों में धूनी जलाना जरूरी होता है जबकि इस्लाम में आग हराम मानी गई है.

 

कुछ लोग साईं बाबा को मुस्लिम फकीर मानते हैं उनका तर्क हैं कि ‘साईं’ फ़ारसी का शब्द है जिसका अर्थ संत होता है. उस दौर में आम तौर पर मुस्लिम संन्यासियों के लिए इस शब्द का प्रयोग होता था. शिरडी में मंदिर के पुजारी को वो एक मुस्लिम फकीर नजर आए थे इसीलिए उसने उन्हें पहली बार साईं कह कर पुकारा था यही नहीं साईं बाबा का पूरा पहनावा मुस्लिम फकीरों की तरह था. साईं सच्चरित्र में इस बात का उल्लेख है कि वे जिंदगी भर सिर्फ ‘अल्लाह मालिक है’ यही बोलते रहे.

 

साईं बाबा मस्जिद से बर्तन मंगवाकर मौलवी से फातिहा पढ़ने के लिए कहते थे. इसके बाद ही भोजन की शुरुआत होती थी.

 

साईं सच्चरित्र के अध्याय 28 में लिखा है की साईं बाबा के भक्तों ने उनकी पूजा उनके जीवन काल में ही शुरु कर दी थी. शिरडी की जिस द्वारिकामाई मस्जिद में साईं बाबा रहते थे वहां भक्त आरती करते औऱ साईं बाबा की पूजा किया करते थे. खास बात ये है कि साईं बाबा ने खुद को कभी भगवान नहीं कहा. साईं सच्चरित्र के अध्याय 34 में साईं बाबा ने अपने एक भक्त शामा से कहा कि तुम्हे ज्ञात होगा कि कर्मपथ अति रहस्यपूर्ण हैं. यद्धपि मैं कुछ भी नहीं करता, फिर भी लोग मुझे ही कर्मों के लिए दोषी ठहराते हैं. मैं तो एक दर्शक मात्र ही हूं. केवल ईश्वर ही एक सत्ताधारी और प्रेरणा देने वाले हैं. वे ही परम दयालु हैं. मैं न तो ईश्वर हूं और न मालिक. केवल उनका आज्ञाकारी सेवक ही हूं और सदैव उनका स्मरण किया करता हूं. जो निरभिमान होकर अपने को कृतज्ञ समझ कर उन पर पूर्ण विश्वास करेगा, उसके कष्ट दूर हो जाएंगे औऱ उसे मुक्ती की प्राप्ती होगी.

 

साईं सच्चरित्र में लिखी बातों पर अगर यकीन किया जाए तो साईं बाबा ने अपनी जिंदगी फकीरी में गुजार दी थी. साईं सच्चरित्र के अध्याय 23 में लिखा है कि मुक्ति का एकमात्र उपाय है – गुरु के श्रीचरणों में अटल प्रेम और भक्ति. सबसे महान अभियनकर्ता भगवान साईं ने भक्तों को पूर्ण आनंद पहुंचा कर उन्हें निज स्वरूप में परिवर्तित कर लिया है. उपर्युक्त कारणों से हम साईंबाबा को ईश्वर का ही अवतार मानते हैं. परन्तु वे सदा यही कहा करते थे कि मैं तो ईश्वर का दास हूं. अवतार होते हुए भी मनुष्य को किस प्रकार आचरण करना चाहिए तथा अपने वर्ण के कर्त्तवयों को किस प्रकार निबाहना चाहिए, इसका उदाहरण उन्होंने लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया. उन्होंने किसी की उपेक्षा या अनादर नहीं किया वो सब प्राणियों में भगवत दर्शन करते थे. उन्होने ये कभी नहीं कहा कि “मैं अनल हक (खुदा) हूं.“ वे सदा यही कहते थे कि मैं तो यादे हक हूं. “अल्लाह मालिक” सदा उनके होठों पर था.

 

लेकिन इस बात का आज भी कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि साईं बाबा हिंदू थे या मुसलमान. साईं सच्चरित्र के अध्याय 28 में इस बारे में विस्तार से लिखा है कि साईं बाबा सभी यौगिक क्रियाओं में पारंगत थे यदि कहा जाए की वो हिंदू थे तो आकृति से वे यवन से प्रतीत होते थे. कोई भी ये निश्चय पूर्वक नहीं कह सकता था कि वो हिंदू थे या यवन. वे हिंदुओं का रामनवमी उत्सव यथाविधि मनाते थे और ईद के दिन मुसलमानों को मस्जिद में नमाज पढने के लिए आमंत्रित किया करते थे. यदि कहें की वो यवन थे तो उनके कान हिंदुओं की रीति के मुताबिक छिदे हुए थे औऱ यदि कहे की वो हिंदू थे तो वे सुन्ता (खतना) कराने के पक्ष में थे. यदि कोई उन्हें हिंदू घोषित करे तो वो सदा मस्जिद में निवास करते थे और यदि यवन कहे तो वो सदा मस्जिद में धूनी प्रज्वलित रखते थे. तथा अन्य कर्म जो कि इस्लाम धर्म के विरुद्ध है जैसे – चक्की पीसना, शंख तथा घंटानाद, होम आदि कर्म करना, अन्न दान और अर्ध्य द्वारा पूजन वहां सदैव चलते रहते थे.

 

पुजारी बाला साहेब जोशी बताते हैं कि बाबा जब शिरडी में आए तो बाबा का करीब सात साल तक यहां वास रहा. अभी भी मस्जिद है और शुरु में भी मस्जिद थी. जीर्ण मस्जिद में रहकर बाबा अपना यहां रहन सहन करते थे. यहां रहते थे भक्तों का अनुभव करते थे. यहां बाबा खाना पकाते थे खाना खाते थे. बहुत सारी लीलाएं यहां द्वारका माई मस्जिद में यहां बाबा की हुई.

 

साई सच्चरित्र के अध्याय 43 में साईं बाबा की जिंदगी के अंतिम पलों का हाल भी बयान किया गया है. किताब में लिखा है कि लक्ष्मीबाई शिदें को 9 रुपये देने के बाद बाबा ने कहा कि मुझे मस्जिद में अब अच्छा नहीं लगता है इसलिए मुझे बूटी के पत्थऱ वाड़े में ले चलो जहां मैं सुखपूर्वक रहूंगा. ये ही आखिरी शब्द साईं बाबा के मुंह से निकले थे. साईं बाबा की इस आखिरी इच्छा के मुताबिक शिरडी में पत्थर-वाडे की उसी जगह पर उन्हें समाधि दी गई जहां आज ये भव्य समाधि मंदिर बना हुआ है. ये समाधि मंदिर साईं भक्तों के लिए आज आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है लेकिन साई भक्तों की आस्था पर सवाल उठाते हुए हिंदुओं के सबसे बड़े धर्मगुरु शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती ने एक बार फिर इस पोस्टर के जरिए साईभक्तों पर किया है जोरदार प्रहार.

 

देखें यहां वीडियो-

व्यक्ति विशेष: साईं बाबा हिन्दू या मुसलमान! 

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