मूवी रिव्यू: 'वजीर'

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समीक्षक : यासिर उस्मान

रेटिंग: 2.5 स्टार

 निर्देशक बिजॉय नांबियार की ‘वजीर’ में अमिताभ बच्चन और फरहान अख़्तर के साथ-साथ शतरंज का खेल भी अहम किरदार है. मगर ये फिल्म, शतरंज के उस गेम की तरह लगती हैं जहां चालों का अंदाज़ा दर्शकों को पहले से ही हो जाता है. एक बेहद दमदार शुरुआत के बाद ये फिल्म, सेकंड हाफ़ में बिखरती चली जाती है. फिल्म का बड़ा सस्पेंस बेहद फिल्मी और तर्क से परे लगता है.

एटीएस ऑफिसर दानिश अली (फरहान अख्तर) पत्नी रुहाना (अदिति राव हैदरी) और बेटी के साथ खुशी से जिंदगी बिता रहा है. मगर एक हादसा उनकी ज़िदगी को हिला कर रख देता है. दानिश खुद को इस हादसे का ज़िम्मेदार मानता है. उसे एटीएस की नौकरी से भी सस्पेंड कर दिया जाता है. ऐसे वक़्त में उसकी मुलाक़ात पंडित ओंकारनाथ धर (अमिताभ बच्चन) से होती है. पंडित जी चल नहीं सकते और व्हील चेयर पर हैं.

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अपना सारा वक़्त वो शतरंज खेलते हुए बिताते हैं. वो भी एक हादसे की याद से जूझ रहे हैं. उन्हें लगता है कि मंत्री यज़ाद क़ुरैशी (मानव कौल) ने उनकी बेटी को मार दिया, जिसका वो बदला लेना चाहते हैं. पंडित जी और दानिश क़रीबी दोस्त बन जाते हैं. दानिश उनसे वादा करता है कि पंडित जी को इंसाफ़ दिलाएगा. मगर इस कहानी में एक वज़ीर भी है, राजा भी और प्यादे भी. जो दिखता है, वो है नहीं. क़रीब 100 मिनट लंबी इस फिल्म का शुरुआत कसी हुई है. अच्छे सीक्वेंस के साथ कहानी तेज़ी से आगे बढ़ती है. फिल्म की जान हैं फरहान और अमिताभ बच्चन के साथ में सीन. किस तरह उनके किरदार एक-दूसरे दर्द में सहारा ढूंढ लेते हैं. ख़ास तौर पर वो सीन जहां आधी रात को दोनों साथ में शराब पीते हैं और शतरंज खेलते हैं, कमाल का है.

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इंटरवल तक ‘वजीर’ आपको बांधे रखती है और लगता है कि कहानी किसी ऐसे मोड़ पर जा रही है जो शायद हमें हैरान कर दे. मगर अफ़सोस, ऐसा क़तई नहीं होता. इंटरवल के बाद फिल्म अचानक गिर जाती है, इसमें घिसे-पिटे फिल्मी ट्विस्ट आ जाते हैं और आख़िर तक आते –आते ये मामूली बदले की कहानी बन कर रह जाती है. फिल्म का केन्द्र अमिताभ बच्चन ही हैं. उन्होंने एक मजबूर पिता और शतरंज के माहिर का किरदार बख़ूबी निभाया है. लेकिन एक बात की कमी खलती है. वो फिल्म में एक कश्मीरी पंडित के किरदार में हैं और फिल्म के लेखक और निर्माता विधु विनोद चोपड़ा भी कश्मीरी ही हैं, फिर भी अमिताभ के हाव-भाव और लहजा कश्मीरी नहीं लगता. वो अमिताभ बच्चन ही लगते हैं, ओंकारनाथ धर नहीं.

फरहान अख़्तर ने बहुत अच्छा अभिनय किया है. ख़ासतौर पर शुरुआत के सीन जहां वो हादसे के बाद परेशान है, वो बिलकुल लाउड नहीं लगते. विलेन के रोल में मानव कौल के पास करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं था मगर फ़राहान के साथ पहले सीन में वो असर छोड़ जाते हैं. नील नितिन मुकेश और अदिति राव हैदरी ने अपने रोल ठीकठाक निभाए हैं. फिल्म की स्क्रिप्ट के साथ विधु विनोद चोपड़ा-अभिजात जोशी जैसे बड़े नाम जुड़े हैं, फिर भी ‘वजीर’ इसी पक्ष में सबसे ज़्यादा मार खाती है. ट्विस्ट का अंदाज़ा पहले से ही हो जाता है, सस्पेंस बांध नहीं पाता और अंत निराश करता है.

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बिजॉय नांबियार अपने स्टाइलिश निर्देशन के लिए जाने जाते हैं, मगर यहां दूसरे हाफ़ में वो शायद कन्फ़्यूज़ थे कि वो एक थ्रिलर बना रहे हैं या फिर ड्रामा. जल्दबाज़ी से भरे एक्शन क्लाईमैक्स के बाद लेखक और निर्देशक दर्शकों को कहानी ज़बर्दस्ती सरल करके समझाने की कोशिश करते हैं. जैसे दर्शक तो बेचारे कुछ समझते ही नहीं. दर्शक सब समझते हैं. शतरंज भी और फिल्म भी.

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Web Title: movie review wazir
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